डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी : राष्ट्रवाद और आधुनिक भारत की आधारशिला
भारतीय राजनीति, शिक्षा और राष्ट्रचिंतन के इतिहास में कुछ ऐसी महान विभूतियाँ हुई हैं, जिनका प्रभाव उनके समकालीन युग तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली अनेक पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करता है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक ऐसे ही अद्वितीय राष्ट्रनायक, दूरदर्शी राजनेता और प्रखर शिक्षाविद् थे, जिन्होंने भारत की संप्रभुता, सांस्कृतिक चेतना और औद्योगिक प्रगति की एक मजबूत आधारशिला रखी। शिक्षा, संस्कृति, उद्योग और राष्ट्रीय अखंडता के प्रति उनका दृष्टिकोण इतना व्यापक और दूरदर्शी था कि उसकी प्रासंगिकता आज इक्कीसवीं सदी के बदलते भारत में भी उतनी ही सटीक दिखाई देती है। उनका पूरा जीवन केवल राजनीतिक सत्ता या संघर्ष का पर्याय नहीं था, बल्कि वह एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे जो पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो, जिसका अपना आत्मसम्मान हो और जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़ा हो।
प्रारंभिक जीवन और उच्च शैक्षणिक आदर्श
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता के एक अत्यंत प्रतिष्ठित, सुशिक्षित और सुविज्ञ परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही असाधारण प्रतिभा के धनी थे और उन्होंने एक कुशल विधिवेत्ता व शिक्षाविद् के रूप में अपनी पहचान बनाई। उनकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ इतनी उज्ज्वल थीं कि उनके पास व्यक्तिगत सफलता, धन और ऐश्वर्य के अनेक सुलभ अवसर उपलब्ध थे। किंतु, उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के स्थान पर राष्ट्र सेवा और सार्वजनिक जीवन के अत्यंत कठिन व चुनौतीपूर्ण मार्ग का चयन किया। युवावस्था से ही उनके भीतर भारतीय भाषाओं, सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रति गहरा अनुराग था। अंग्रेजी हुकूमत और उनके भाषाई प्रभुत्व के उस दौर में, डॉ. मुखर्जी द्वारा बंगाली (बंगला) भाषा में स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) की उपाधि प्राप्त करना केवल एक शैक्षणिक निर्णय नहीं था, बल्कि वह औपनिवेशिक मानसिकता के सामने भारतीय सांस्कृतिक आत्मविश्वास का एक जीवंत प्रतीक था।
अखंड भारत के अमर बलिदानी: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को जयंती पर कोटि-कोटि नमन! 🇮🇳🙏🏻
6 जुलाई, 1901 को बंगाल की धरती पर जन्मे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। मात्र 33 वर्ष की आयु में कोलकाता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने और स्वतंत्रता के… pic.twitter.com/iNRRoxKK63
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डॉ. मुखर्जी की योग्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मात्र 33 वर्ष की अल्पायु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति नियुक्त किए गए। अपने इस महत्वपूर्ण कार्यकाल के दौरान उन्होंने विश्वविद्यालय की औपनिवेशिक परंपराओं को बदलते हुए उसमें ‘भारतीयता’ और राष्ट्रीय चेतना को प्रतिष्ठित करने के भगीरथ प्रयास किए। उन्होंने विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गान से कराने की एक नई और गौरवशाली परंपरा को जन्म दिया। तत्कालीन पराधीन भारत के माहौल में यह कदम महज एक सांस्कृतिक बदलाव नहीं था, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत की आँखों में आँखें डालकर भारतीय स्वाभिमान की एक सशक्त और निर्भीक अभिव्यक्ति थी। इसके साथ ही, उन्होंने विश्वविद्यालय के प्रतीकों का पूरी तरह से भारतीयकरण किया। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व क्रांति लाते हुए विश्वकवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से बंगाली भाषा में दीक्षांत भाषण देने का ऐतिहासिक अनुरोध किया और इस नई परंपरा की शुरुआत कराई। डॉ. मुखर्जी का दृढ़ विश्वास था कि आधुनिक शिक्षा तभी वास्तविक रूप से सार्थक हो सकती है, जब वह देश की सांस्कृतिक जड़ों से कटी हुई न हो। उन्होंने मातृभाषा आधारित शिक्षा, महिला शिक्षा, उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक कृषि और व्यावहारिक व व्यावसायिक शिक्षा को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया। शिक्षा को लेकर उनका यही दूरदर्शी दृष्टिकोण आज स्वतंत्र भारत की ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ के मूल सिद्धांतों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, जहाँ मातृभाषा में शिक्षा, भारतीय ज्ञान परंपरा और कौशल विकास पर विशेष बल दिया जा रहा है। आधुनिकता और भारतीयता के बीच एक सुंदर संतुलन बनाने की उनकी यह अनूठी अवधारणा आज देश को एक ‘विकसित भारत’ की दिशा में ले जाने के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर रही है।
राजनीतिक जीवन में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हमेशा उच्च आदर्शों और अडिग सिद्धांतों को सर्वोच्च स्थान दिया। बंगाल विधान परिषद के सदस्य से लेकर वित्त मंत्री पद तक के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने बार-बार यह साबित किया कि उनके लिए व्यक्तिगत पद या सत्ता से कहीं ऊपर राष्ट्रहित सर्वोपरि है। जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बने पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया गया। इस महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए उन्होंने युद्ध स्तर पर देश की मजबूत औद्योगिक नींव रखने का ऐतिहासिक कार्य किया। वर्ष 1948 की देश की पहली ऐतिहासिक औद्योगिक नीति को तैयार करने का श्रेय डॉ. मुखर्जी को ही जाता है। उन्होंने देश को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए भारी उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति अपनाई। उनके ही कार्यकाल और कुशल मार्गदर्शन में चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स, सिंदरी उर्वरक संयंत्र, बहुउद्देशीय दामोदर घाटी परियोजना, विशाल हीराकुंड बांध और हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट जैसी भारत की ऐतिहासिक और विशाल परियोजनाओं की आधारशिला रखी गई। उनका यह स्पष्ट और अटूट विश्वास था कि जब तक भारत औद्योगिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बनेगा, तब तक एक आर्थिक और सामरिक दृष्टि से सशक्त भारत का सपना साकार नहीं हो सकता। आज भारत जिस ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत वैश्विक पटल पर अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का लोहा मनवा रहा है, उसकी वास्तविक शुरुआत डॉ. मुखर्जी के उसी विजन का परिणाम थी।
स्वतंत्रता के पश्चात देश की आंतरिक और बाह्य राजनीतिक दिशा को लेकर डॉ. मुखर्जी के विचार तत्कालीन सरकार से भिन्न होने लगे। विशेष रूप से नेहरू-लियाकत समझौते और जम्मू-कश्मीर के विषय में सरकार द्वारा लिए जा रहे ढुलमुल निर्णयों पर उन्होंने कड़ा विरोध दर्ज कराया। जब उन्होंने देखा कि देश के नागरिकों की सुरक्षा और राष्ट्रीय अखंडता से समझौते किए जा रहे हैं, तब उन्होंने बिना किसी मोह के 1950 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपना त्यागपत्र दे दिया। यह कदम यह दर्शाता है कि उनके लिए सत्ता का सुख कभी भी राष्ट्रहित से बड़ा नहीं हो सकता था।
मंत्रिमंडल से अलग होने के बाद, देश को एक राष्ट्रवादी और मजबूत वैचारिक विकल्प देने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 1951 में ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की। भारतीय जनसंघ ने देश की राजनीति में राष्ट्रवाद पर आधारित एक वैकल्पिक और सुदृढ़ राजनीतिक धारा को संगठित स्वरूप प्रदान किया, जो आज भी भारतीय राजनीति के केंद्र में है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे प्रखर, चर्चित और ऐतिहासिक संघर्ष जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने और वहाँ लागू विशेष रियायतों व अलग व्यवस्थाओं के विरोध से जुड़ा रहा। उनका यह तार्किक व स्पष्ट मानना था कि एक ही संप्रभु राष्ट्र के भीतर दो अलग-अलग संविधान, दो अलग-अलग ध्वज (प्रधान) और दो अलग-अलग व्यवस्थाएं कभी भी राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना के अनुकूल नहीं हो सकतीं। उस समय जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने के लिए भारत के ही नागरिकों को एक विशेष अनुमति लेनी पड़ती थी। इस भेदभावपूर्ण परमिट व्यवस्था को देश की संप्रभुता पर चोट मानते हुए उन्होंने इसके विरोध का शंखनाद किया।
वर्ष 1953 में, ‘एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान नहीं चलेंगे’ के बुलंद नारे के साथ उन्होंने बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश किया, जहाँ उन्हें तत्कालीन व्यवस्था द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। इसी नजरबंदी और हिरासत के दौरान 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी इस असमय मृत्यु ने देश को झकझोर कर रख दिया और उनकी पूजनीय माता जोगमाया देवी सहित देश के करोड़ों नागरिकों ने इस पूरे घटनाक्रम की एक निष्पक्ष जांच कराने की पुरजोर मांग की। यद्यपि उस समय की सरकार ने इस विषय में संवेदनशीलता नहीं दिखाई, परंतु डॉ. मुखर्जी का वह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया। वह राष्ट्र की आत्मा में एक अमिट मशाल बनकर जलता रहा। दशकों बाद, 5 अगस्त 2019 को वर्तमान मोदी सरकार द्वारा एक साहसिक और ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में भी पूरी तरह से ‘एक देश, एक संविधान और एक ध्वज’ की वह व्यवस्था लागू हुई, जिसके लिए डॉ. मुखर्जी ने सात दशक पहले अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। इस युगांतकारी निर्णय को संपूर्ण राष्ट्र ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उस पवित्र वैचारिक संघर्ष की एक सच्ची और ऐतिहासिक परिणति के रूप में स्वीकार किया। परंतु, डॉ. मुखर्जी का योगदान केवल अनुच्छेद 370 या कश्मीर तक ही सीमित नहीं था। विभाजन के उस विभीषिका भरे दौर में पश्चिम बंगाल को भारत का हिस्सा बनाए रखने के लिए उनका दृढ़ हस्तक्षेप, शिक्षा व्यवस्था में भारतीय और गौरवशाली दृष्टि का समावेश, औद्योगिक आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव, सांस्कृतिक स्वाभिमान का जागरण और सिद्धांतों पर आधारित राजनीति—ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जो स्वतंत्र भारत के वैचारिक और भौतिक विकास का अटूट हिस्सा हैं।
आज जब भारत वर्ष 2047 तक एक पूर्णतः ‘विकसित भारत’ बनने के महान संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तब आत्मनिर्भरता, नई शिक्षा नीति, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय एकीकरण जैसे सभी मुख्य विषयों पर डॉ. मुखर्जी के विचारों की गूँज साफ सुनाई देती है। उनका सार्वजनिक जीवन हमें यह अमर संदेश देता है कि एक सशक्त और समर्थ राष्ट्र का निर्माण केवल क्षणिक राजनीतिक निर्णयों या सत्ता के समीकरणों से नहीं होता, बल्कि वह शिक्षा, समृद्ध संस्कृति, अटूट राष्ट्रीय एकता और देश के नागरिकों के भीतर छिपे असीम आत्मविश्वास पर आधारित एक दीर्घकालिक और दूरदर्शी सोच का परिणाम होता है। विकसित भारत की इस गौरवशाली और ऐतिहासिक यात्रा में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचार, उनका राष्ट्रप्रेम और उनका विजन आज भी देश के प्रत्येक नागरिक के लिए प्रेरणा, ऊर्जा और मार्गदर्शन का सबसे मजबूत प्रकाश स्तंभ बना हुआ है।
लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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लेख सह-संपादक श्री मोहनलाल मोदी द्वारा प्रेषित……


