भारतीय राजनीति के भाग्य विधाता बनने की ओर अग्रसर नरेंद्र मोदी

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बिहार का व्यवहार
अविश्वसनीय! अकल्पनीय!
लेकिन यह है
जनता का यथार्थ!

बिहार चुनाव में एनडीए की जीत ने निस्संदेह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता और शक्ति को और मजबूत किया है। बिहार में एनडीए की रिकॉर्ड-तोड़ जीत केवल एक राज्य की जीत नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर जनता की मुहर है। यह एक ऐसा जनादेश है जो भारतीय राजनीति में उनके कद को अभूतपूर्व ऊँचाई देता है। चुनावी नतीजों में एनडीए का दोहरे शतक को स्पर्श कर जाना, वही विपक्ष का दहाई के आंकड़े में सिमट जाना बेहद आश्चर्यजनक है। यह जीत इसलिए भी अहम है क्योंकि यह एक मजबूत क्षेत्रीय गठबंधन (महागठबंधन) को हराकर प्राप्त हुई है। एक ऐसा महागठबंधन जिसमें राष्ट्रीय स्तर की कांग्रेस पार्टी भी शामिल थी। एनडीए की यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि इसने विभिन्न न्यूज़ चैनलों द्वारा दिखाए गए एग्जिट पोल्स को छोटा साबित कर दिखाया है।एक प्रकार से देखा जाए तो यह जीत ‘डबल इंजन’ सरकार की अवधारणा और पीएम मोदी की व्यक्तिगत अपील की सफलता का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने बिहार में व्यापक रैलियाँ कीं, जहाँ उन्होंने राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय विकास योजनाओं पर ज़ोर दिया। बिहार जैसे जाति-आधारित राजनीति वाले राज्य में भी मतदाताओं ने विकास, प्रशासन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मोदी-केंद्रित मुद्दों को वरीयता दी। यह परिणाम विपक्ष के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि मोदी की लोकप्रियता राष्ट्रीय सीमाओं से परे होती जा रही है। चुनाव परिणामों से स्पष्ट होता है कि महिलाओं ने एनडीए और विशेष रूप से नीतीश कुमार की महिला-केंद्रित योजनाओं (जैसे शराबबंदी, साइकिल योजना, जीविका) पर भरोसा जताया। केंद्र सरकार की मुफ्त राशन, आवास योजना, और पंचामृत गारंटी जैसे वादों ने भी इस ‘साइलेंट वोट’ को एनडीए के पक्ष में मजबूत किया। यह दिखाता है कि मोदी और नीतीश की जोड़ी ने एक ऐसा सामाजिक समीकरण साधा है जो पारंपरिक जातिगत समीकरणों से ऊपर है। विपक्ष ने बड़े पैमाने पर युवाओं को रोजगार के नाम पर आकर्षित करने की कोशिश की। लेकिन मोदी-नीतीश की संगठनात्मक क्षमता और विश्वसनीयता विपक्षी दलों के सभी प्रकार के दावों पर भारी पड़ी। विपक्षी गठबंधन की बात करें तो वहां सामंजस्य की कमी स्पष्ट रूप से देखने को मिली। भले ही विपक्षियों ने बिहार में भावी मुख्यमंत्री का चेहरा चुनाव से ठीक पहले घोषित कर दिया था, लेकिन महागठबंधन में नेतृत्व की अस्पष्टता और विश्वसनीयता के मुद्दे ने उनकी हार सुनिश्चित की। इस हार के बाद विपक्ष को अपनी राष्ट्रीय रणनीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। बिहार की जीत ने मोदी को 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए और मजबूत कर दिया है। यह जीत न केवल राजनीतिक, बल्कि मनोवैज्ञानिक तौर पर भी उन्हें और उनकी पार्टी को अजेयता की भावना प्रदान करती है। इस जीत का असर जल्द ही पश्चिम बंगाल जैसे चुनावी राज्यों पर भी देखने को मिल सकता है, जहाँ भाजपा अपना राजनीतिक ध्यान केंद्रित कर रही है। कुल मिलाकर बिहार के चुनावी नतीजों ने देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भाग्य विधाता के रूप में स्थापित कर दिखाया है। इस संदर्भ में ‘मोदी भाग्य विधाता’ का अर्थ किसी निरंकुश शासक से नहीं, बल्कि ऐसे नेता से है जिसका नेतृत्व और निर्णय देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक भविष्य की दिशा तय करने की शक्ति रखते हैं। इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से देखने को मिला कि नरेंद्र मोदी यहां थकावट की सारी सीमाओं को तोड़कर एक जीवन योद्धा की तरह मतदान की तारीखों तक प्रतिकूलताओं से जूझते नजर आए। यह जीत तब और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जब नीतीश कुमार का नाम आगे भी मुख्यमंत्री पद पर बने रहने को लेकर शंकाओं के घेरे में बना रहा। विपक्ष ने भी इस मामले को जोर शोर से हवा देने में कोई कसर शेष नहीं छोड़ी। लेकिन जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए की ओर से चुनावी कमान संभाली और विपक्ष पर ताबड़तोड़ हमले शुरू किये, वैसे ही वहां का चुनावी माहौल तेजी से बदलता चला गया। खासकर जब छठ पर्व के दिन मोदी समेत उनके सभी स्टार प्रचारकों ने छठ मैया की पूजा की और विपक्ष ने उस पर तंज कसा, तो फिर मानो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनावी ब्रह्मास्त्र प्राप्त हो गया। जैसा कि सभी जानते हैं, नरेंद्र मोदी विपक्ष की ओर से की जाने वाली टीका टिप्पणियों में से ही अपने मतलब का शब्दास्त्र छांट लेते हैं और फिर उसी से विपक्ष को तहस-नस करने में कामयाब हो जाते हैं। इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया। छठ पूजा पर तंज कसने की बात हो या फिर विपक्ष की ओर से की गई कुछ और निम्न स्तरीय टिप्पणियां, श्री मोदी ने उन्हें मतदान की तारीख तक मुद्दे के रूप में जीवंत बनाए रखा। उन्होंने दिल्ली से लेकर बिहार तक किए गए विकास कार्यों को भी पूरी ताकत के साथ सामने रखा। उसी का परिणाम रहा की विकास के साथ-साथ मतदाता नरेंद्र मोदी के मान सम्मान को लेकर भी एकजुट हुआ। बिहार ने एक बार फिर साबित किया है कि भारतीय राजनीति का केंद्र बिंदु अब राष्ट्रीय नेतृत्व और उसकी कल्याणकारी योजनाओं पर केंद्रित है, जिसका चेहरा नरेंद्र मोदी हैं।

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