Retail Inflation June

आम आदमी की जेब पर दोहरी मार : जून में 4.38% पर पहुंची खुदरा महंगाई दर, रिजर्व बैंक के तय लक्ष्य के पार निकले आंकड़े

नई दिल्ली राष्ट्रीय व्यापार

एजेंसी, नई दिल्ली। Retail Inflation June 2026 : देश में खाने-पीने की वस्तुओं, विशेषकर आलू और अदरक जैसी रोजमर्रा की चीजों की कीमतों में आई भारी तेजी के कारण खुदरा महंगाई दर में लगातार छठे महीने बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 2026 के जून महीने में देश की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38% के स्तर पर पहुंच गई है, जो इससे पिछले महीने यानी मई में 3.93% दर्ज की गई थी। इसके साथ ही वर्ष 2025 के जनवरी महीने के बाद यह पहला ऐसा मौका है जब देश की महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक के 4% के मध्यकालीन निर्धारित लक्ष्य को पार कर गई है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा सोमवार 13 जुलाई को जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस साल की शुरुआत यानी जनवरी में यह दर महज 2.74% के स्तर पर थी।

खाद्य पदार्थों की महंगाई दर में भारी वृद्धि

जून महीने के दौरान केवल आम उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में ही नहीं, बल्कि खाने-पीने के सामानों की खाद्य महंगाई दर में भी एक बड़ा उछाल देखा गया है। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, जून में खाद्य महंगाई दर बढ़कर 5.32% के स्तर पर पहुंच गई है, जो कि मई के महीने में 4.38% के स्तर पर दर्ज की गई थी। हालांकि, राहत की बात यह है कि इस दौरान जहां बाजार में आलू और अदरक जैसी आवश्यक सब्जियां काफी महंगी बिकीं, वहीं दूसरी ओर बहुमूल्य धातुओं जैसे सोना और चांदी की कीमतों में मामूली गिरावट दर्ज की गई है।

ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका से सहमा बाजार

वर्तमान समय में देश की खुदरा महंगाई दर भले ही भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित 2% से 6% के सुरक्षित दायरे के भीतर बनी हुई है, लेकिन कीमतों में आ रही इस निरंतर तेजी ने वित्तीय विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में इसी प्रकार बढ़ोतरी जारी रही, तो केंद्रीय बैंक बाजार में नकदी कम करने और महंगाई पर काबू पाने के लिए आने वाले समय में ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने जैसा कड़ा कदम उठा सकता है। यदि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि की जाती है, तो इसका सीधा नकारात्मक असर आने वाली तिमाहियों में देश की आर्थिक विकास दर पर पड़ सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने पहले ही बढ़ा दिया था महंगाई का अनुमान

उल्लेखनीय है कि देश में अल नीनो की सक्रिय परिस्थितियों के चलते इस वर्ष मानसून के सामान्य से कम रहने की आशंका जताई गई है। इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के दोहरे जोखिम को ध्यान में रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने जून महीने की शुरुआत में ही देश की अनुमानित महंगाई दर के आंकड़ों में संशोधन किया था। केंद्रीय बैंक ने अपने पुराने महंगाई अनुमान को 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया था, ताकि आने वाले समय में बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटा जा सके।

नए सूचकांक के कारण पिछले साल से तुलना संभव नहीं

इस वर्ष जारी किए गए महंगाई के आंकड़ों की तुलना पिछले वर्ष की समान अवधि के आंकड़ों से नहीं की जा सकती है, क्योंकि इसी साल जनवरी में इस पूरे सूचकांक को रीसेट किया गया था। सरकार द्वारा साल 2024 को आधार वर्ष बनाकर एक बिल्कुल नई श्रृंखला की शुरुआत की गई थी, जिसके तहत इस साल जनवरी में संशोधित खुदरा महंगाई दर 2.74% दर्ज की गई थी। इसके बाद से देश में कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का सिलसिला देखा गया, जहां फरवरी में यह दर 3.21%, मार्च में 3.4%, अप्रैल में 3.48% और मई में 3.93% दर्ज की गई। यदि हम पुरानी श्रृंखला के आधार पर तुलना करें, जिसका आधार वर्ष 2012 था, तो उसके तहत महंगाई दर पिछले वर्ष नवंबर में 0.71% रही थी।

नए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खर्च के तौर-तरीकों में बदलाव

सरकार द्वारा तैयार किया गया यह नया महंगाई सूचकांक वर्ष 2023-24 में देश में किए गए घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण से प्राप्त खर्च के तौर-तरीकों पर आधारित है। इस नए सूचकांक के विभिन्न घटकों को दिए गए नए भारांक की वजह से ही महंगाई के मौजूदा आंकड़ों में यह मामूली बढ़ोतरी दिखाई दे रही है। इस संशोधित व्यवस्था में देश की मुख्य और आवश्यक वस्तुओं की हिस्सेदारी को करीब 10% तक बढ़ा दिया गया है, जबकि बाजार में तेजी से उतार-चढ़ाव का सामना करने वाले खाद्य पदार्थों की भूमिका और उनके प्रभाव को पहले की तुलना में कम किया गया है।

जानिए कैसे काम करता है महंगाई का घटना और बढ़ना

अर्थशास्त्र के नियमों के अनुसार, किसी भी उत्पाद की महंगाई का बढ़ना या घटना पूरी तरह से बाजार में उसकी मांग और आपूर्ति के संतुलन पर निर्भर करता है। जब देश के नागरिकों के पास धन की उपलब्धता अधिक होती है, तो उनकी क्रय शक्ति बढ़ती है और वे बाजार से अधिक सामान खरीदने लगते हैं। इस स्थिति में वस्तुओं की मांग अचानक बढ़ जाती है और यदि बाजार में उसकी पर्याप्त आपूर्ति नहीं होती है, तो उत्पाद की कीमतें बढ़ने लगती हैं। इसके विपरीत, यदि बाजार में किसी सामान की मांग कम हो और उसकी आपूर्ति बहुत अधिक हो, तो प्रतिस्पर्धा के कारण कीमतें घटने लगती हैं और महंगाई दर में कमी आती है।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और 4.38% महंगाई दर का वास्तविक गणित

जब सरकार यह घोषणा करती है कि जून 2026 में देश की खुदरा महंगाई दर 4.38% दर्ज की गई है, तो इसका सीधा अर्थ यह होता है कि इस अवधि की तुलना पिछले वर्ष यानी जून 2025 की समान अवधि से की जा रही है। यह आंकड़ा पूरे 1 वर्ष के दौरान बाजार में आए मूल्य परिवर्तन को दर्शाता है। 4.38% की यह दर वास्तव में एक औसत संख्या होती है जिसे तकनीकी भाषा में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक कहा जाता है। इस सूचकांक में आम आदमी के जीवन से जुड़ी सैकड़ों छोटी-बड़ी चीजों को शामिल किया जाता है, जिनमें से कुछ वस्तुओं के दाम बहुत अधिक बढ़े होते हैं और कुछ के दाम घटे भी होते हैं। इन सभी को मिलाकर जब एक औसत निकाला जाता है, तो खर्च में 4.38% की वृद्धि दिखाई देती है। इसे सरल शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है कि यदि जून 2025 में आपने कोई घरेलू राशन या सामान 100 रुपये में खरीदा था, तो वही सामान जून 2026 में बढ़कर 104.38 रुपये का हो गया है।

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