प्रकृति संरक्षण की राह में मोहन सरकार का निर्णायक कदम, एक पेड़ मां के नाम

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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित कुशा भाऊ ठाकरे सभागार में मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने एक पेड़ मां के नाम लगाने का केवल आवाहन ही नहीं किया, बल्कि इसे अभियान बनाकर सफल बनाने की मंशा भी जाहिर कर दी। अनुमान लगाया जा रहा है कि जिस जोश और उत्साह के साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने पर्यावरण दिवस के अवसर पर इस अभियान की शुरुआत की है, वही जोश और उत्साह बाकी के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारी एवं कार्यकर्ताओं में बना रहा तो एक अच्छी पहल होने की भूमिका रची जा चुकी है। हम सभी जानते हैं कि विकास के नाम पर केवल मध्य प्रदेश अथवा संपूर्ण भारत में ही नहीं, दुनिया भर में पर्यावरण को अनदेखा किया जा रहा है। जब कभी भी कोई विकास कार्य शुरू करना हो तो सबसे पहले हजारों हरे-भरे पेड़ जड़ से काटकर नष्ट कर दिए जाते हैं। अनेक क्षेत्रों में हालात ये हैं कि कुछ दशक पहले ही जहां पर हरे-भरे बगीचे, छोटे-बड़े जंगल, नदियां, कुए, तालाब हुआ करते थे, अब वहां पर सीमेंट कंक्रीट से बनी सड़कें इमारतें दुकानें आकार लेती जा रही हैं । नतीजतन प्राण वायु लगातार प्रदूषित हो रही है। क्योंकि आम आदमी जितना प्रदूषण प्रकृति को दे रहा है, उसकी तुलना में पेड़ काम होते जा रहे हैं। चूंकि पेड़ों द्वारा हमारे जीवन के लिए अत्यावश्यक प्राणवायु को साफ करके उसमें सम्मिलित कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर ऑक्सीजन हमारी सांसों तक पहुंचाया जाता है। अब जब पेड़ ही घट रहे हैं तो फिर वायु साफ नहीं हो पा रही। जिसके चलते हमारी सांसों तक प्रदूषित ऑक्सीजन पहुंच रही है। इससे अनेक बीमारियां पैदा होती हैं और हो भी रही हैं । नतीजा यह है कि अनेक लोग रोग ग्रस्त जीवन जीने को मजबूर हैं और ढेर सारे लोग मौत की भेंट भी चढ़ रहे हैं। यह पेड़ों की कमी का ही परिणाम है। इसके चलते समूचा पर्यावरण बिगड़ रहा है। समय पर बारिश नहीं होती, कहीं पर इतनी कम होती है की पीने के पानी के लाले पड़ जाते हैं। कहीं कहीं पर बारिश इतनी ज्यादा हो जाती है कि अनेक गांव शहर बाढ़ से पीड़ित हो जाते हैं। लिखने का आशय यह कि पर्यावरण बिगड़ने से कहीं सूखे के हालात हैं तो कहीं बाढ़ लोगों को बर्बाद कर रही है। इसके बावजूद भी हम लोग समझने को तैयार नहीं है कि विकास के नाम पर पर्यावरण से छेड़छाड़ बंद करनी होगी। इसके लिए आवश्यक हो जाता है कि शासन और प्रशासन कोई भी विकास की परियोजना शुरू करें तो सबसे पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि एक भी पेड़ काटना ना पड़ जाए। यदि परिस्थिति बस पेड़ काटना बेहद आवश्यक हो जाता है तो प्राथमिकता इस बात को दी जानी चाहिए कि किसी भी विकास संबंधी परियोजना को पूरा करने के लिए जहां तक हो सके पेड़ कम ही काटने पड़ें। आम आदमी को भी चाहिए कि वह अपने पूर्वजों की भावनाओं का सम्मान करना शुरू करे। क्योंकि हमारे पूर्वज ऋषि मुनि और महात्मा प्रकृति के प्रति सदैव ही मित्र भाव लिए हुए रहे हैं। उदाहरण के लिए, सनातन धर्म में सदैव ही पर्यावरण को पूजने की परंपरा रही है। हमारे यहां अनेक प्रकार के पेड़ पौधों और वृक्षों की पूजा होती है। नदियों को भी हमने माता के समान पूज्य माना है। यहां तक कि पर्यावरण के संरक्षण में रहकर उसे बचाए रखने में संलग्न बने रहने वाले जीव जंतुओं को भी हमारे पूर्वज पूजते चले आ रहे हैं। संभवत उनकी मंशा यही रही होगी कि जब मनुष्य पर्यावरण का सम्मान करेगा और उसकी पूजा करते रहेगा तो वह विनाश की ओर कभी भी उन्मुख नहीं होगा। लेकिन दुख के साथ लिखना पड़ रहा है कि हम पश्चिमी सभ्यता और वहीं से आयातित विकास की अवधारणा के ऐसे अंधभक्त हुए जो पर्यावरण विरोधी आचरण के आदी बन बैठे। आवश्यकता इस बात की है कि हम मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की बात को गंभीरता से लें और कुछ नहीं तो कम से कम एक पेड़ अपनी माता, अपने पिता या फिर अपने पूर्वजों के नाम लगाने का संकल्प लें। हम अनेक शुभ अवसरों पर भी पेड़ पौधे रोपने को रिवाज बना सकते हैं । यदि ऐसा करने लगे तो फिर वह दिन दूर नहीं जब हम नष्ट होते जा रहे जंगलों को दोबारा से संरक्षित और संवर्धित कर पाएंगे। इसी के साथ मुख्यमंत्री ने पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्लास्टिक से बचने की पुरजोर अपील की। उनके इस आवाहन को भी गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। क्योंकि जितना नुकसान पेड़ों को काटने से हमारा हो रहा है, उतना ही जहर हमारे जीवन में प्लास्टिक फैला रही है। प्लास्टिक से पैदा होने वाला कचरा नालियों, नदियों, नालों को जाम कर रहा है। यहां तक कि अब समुद्री पानी पर भी विपरीत प्रभाव दिखाई देने लगे हैं । प्लास्टिक का दुष्प्रभाव इतना ज्यादा हो चुका है कि अब उसके सूक्ष्म कण कृषि, फल, सब्जी आदि में ही नहीं बल्कि माताओं के दूध में भी पाए जाने लगे हैं। मतलब साफ है, अभी तक केवल मां का दूध ही ऐसा तत्व था जो बच्चों को अनेक बीमारियों से बचाने में सक्षम हुआ करता था। लेकिन अब पैदा हो रहे बच्चे मां के दूध से भी कुपोषित होने के हालातो का शिकार बनने लगे हैं। क्योंकि प्लास्टिक हमारे जीवन में बुरी तरह घुल मिल गया है। यही बजे है कि उसके सूक्ष्म कण हवा, पानी, खाद्य पदार्थों में जगह बना चुके हैं। यदि जल्दी ही इससे पीछा ना छुड़ाया गया तो प्लास्टिक प्रकृति के लिए विनाश का कारण बनने जा रहा है। अतः आवश्यक हो जाता है कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश से ही पर्यावरण संरक्षण की जोरदार शुरुआत की जानी चाहिए।

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