स्मरण : स्व. ज्ञानप्रकाश बाली….
एक यथार्थ का सारांश !
अपने तरह के अलग मिजाज, सम-विषम परिस्थितियों से अनुकूल कदमताल और सामाजिक-पारिवारिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन में सतत् संघर्ष की सहज भूमिका के लिये स्व. ज्ञानप्रकाश बाली बेशक अविस्मरणीय रहेंगे। कभी खुश-मिजाज, तो कभी सख्त तल्ख के साथ उनकी भाव-भंगिमा की प्राकृतिक अभिव्यक्ति के आभास को कुदरत ने ऐसी नेमत बख्शी थी कि वे हर अपने-परायों के लिये अजीज शख्सियत के रूप में पहचान के पर्याय माने जाते थे।
दैनिक सतपुड़ा वाणी के नाम से आज जिस प्रतिष्ठान की आकृति वर्तमान की सनद के रूप में जानी जाती है, उसे मजबूत, लोकोपयोगी, सार्थक तथा सदाबहार आयाम देने में स्वः ज्ञानप्रकाश बाली की दूरदर्शी भूमिका को नजरअंदाज करना उनके जीवन-विश्लेषण की इबारत के साथ अन्याय ही होगा। समाचार पत्रों के अरण्य में सतपुड़ा वाणी के नाम से पहचान रखने वाला यह विशाल वट वृक्ष उस तपस्वी की संधर्ष तपस्या की बानगी है जिसने सीमित संसाधनों के अवलम्व पर विशाल परिकल्पना को प्रतिष्ठित करने का भागीरथी प्रयास किया था।
यह कहना अतिश्योक्ति के प्रचलित शब्दार्थ के प्रभाव से परे ही माना जायेगा कि दैनिक सतपुड़ा वाणी प्रतिष्ठान पत्रकारिता की ऐसी प्रयोगशाला रहा है, जहाँ रहकर कई सहाफियों ने इस मित्रान का ककहरा सीखा है और बहुतों ने इस नाम के सहारे स्वयं को जिन्दादिल पत्रकार के रूप में राजधानी भोपाल के सहाफी-फलक पर अपना खास मुकाम बनाया है।
दैनिक सतपुड़ा वाणी ने अपने शैशव-काल से ही अपनी अलग पहचान बना ली थी। इससे करीबी वास्ता रखने वाले सहाकियों ने उसके तेवरों की अपने कलम की धार से अगर पैना बनाया था, तो राष्ट्रीय, राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों की तात्कालिक परिस्थितियों की फेहरिस्त के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को बेहतर और सर्वमान्य लिहाज से परिष्कृत भी किया था।
ज्ञान प्रकाश बाली, जो इस समाचार पत्र के संस्थापक थे, की सदारत में सहाफियों को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन और मिशन के उन्नयन में व्यक्तिगत योगदान के भरपूर अवसर प्रदान करने की वजह से प्रतिधान में टीम वर्क की भावना पनपी जो इसकी बुनियाद का मजबूत आधार भी बना। हालांकि यह निर्विवाद सूत्र-वाक्य है कि जीवन में सफलता या असफलता कर्मन्ये वाधिकारस्ते… की निर्धारित नियति पर आश्रित है। व्यवहारिक जीवन की कठिनाईयों की अपरिहार्य संसर्गता में मनुष्य की वृत्ति और प्रवृत्ति निर्णायक भूमिका में रहती है जिससे व्यक्तिगत चरित्र के विश्लेषण में कई बार विरोधाम प्रधान पक्ष बनकर उभर जाता है। ज्ञान प्रकाश बाली इस मायने में अपवाद नहीं थे, प्रकृति की नेमत की इसी पगडंडी से होकर गुजरने के अलावा उनके पास भी कोई विकल्प नहीं था। लेकिन वे परिस्थितियों के हिसाब से संतुलन बना सकने वाले सिद्धहस्त-नट थे और यही उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष था जिसे सदा-सदा स्मरित किया जाता रहेगा। यही यथार्थ भी है और यही उन्हें स्मरण करने की वजह का सारांश भी !
प्रवीण शुक्ला
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