राष्ट्रीय अस्मिता पर गौरव के साथ विकास के पथ पर मोहन सरकार
मध्यप्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का नेपानगर संबोधन केवल एक राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि भविष्य की समावेशी और सशक्त जनजातीय नीति का एक स्पष्ट खाका बनकर उभरा है। नेपानगर के विशाल जनजातीय सम्मेलन में मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणाएं इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार अब केवल नारों तक सीमित न रहकर धरातल पर उन जटिल समस्याओं का समाधान कर रही है, जो दशकों से जनजातीय समाज के विकास में बाधक बनी हुई थीं। वनाधिकार पट्टों की रजिस्ट्री का निर्णय इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम कहा जा सकता है। आदिवासियों को उनकी भूमि का कानूनी अधिकार दिलाना और उस रजिस्ट्री का संपूर्ण व्यय राज्य सरकार द्वारा वहन करना, न केवल उनके आर्थिक सशक्तिकरण की नींव रखेगा, बल्कि उन्हें उन तमाम शासकीय पेचीदगियों और भूमि रिकॉर्ड संबंधी विसंगतियों से भी मुक्ति दिलाएगा, जिनसे वे पीढ़ियों से जूझते आए हैं। यह निर्णय यह रेखांकित करता है कि सत्ता का केंद्र अब वह अंतिम व्यक्ति है, जिसे विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का संकल्प लिया गया है।
मुख्यमंत्री का संबोधन विकास के साथ-साथ राष्ट्रीय अस्मिता और गौरव के उन पहलुओं को भी स्पर्श करता है, जो आज भारत को वैश्विक पटल पर एक नई पहचान दिला रहे हैं। जब वे रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारतीय तिरंगे की शक्ति और संकट के समय भी देश में संसाधनों की निर्बाध उपलब्धता का जिक्र करते हैं, तो वे असल में देश के भीतर आत्मविश्वास के उस भाव को जगाते हैं, जो किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की बढ़ती कूटनीतिक साख का उल्लेख करना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विरोधी देशों तक के द्वारा भारत की प्रशंसा का हवाला देना, यह दर्शाता है कि आज का भारत अपनी आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह सक्षम है। डॉ. यादव ने बड़ी ही कुशलता से वैश्विक परिस्थितियों को स्थानीय संदर्भों से जोड़ते हुए यह स्पष्ट किया कि एक मजबूत नेतृत्व ही संकट के समय अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।
राजनीतिक परिदृश्य पर मुख्यमंत्री का प्रहार कटाक्ष से अधिक एक वैचारिक विमर्श की तरह दिखाई देता है। उन्होंने लोकतंत्र में विपक्ष की गरिमा और उसकी जिम्मेदारी को लेकर जो सवाल उठाए, वे आज के राजनीतिक माहौल में अत्यंत प्रासंगिक हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दूरदर्शी नेताओं का उदाहरण देकर उन्होंने यह समझाने का प्रयास किया कि विरोध केवल विरोध के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रहित के लिए होना चाहिए। कांग्रेस और राहुल गांधी की कार्यशैली पर उनकी टिप्पणी दरअसल उस राजनीतिक शून्यता की ओर संकेत करती है, जो रचनात्मक विपक्ष के अभाव में पैदा होती है। मुख्यमंत्री ने विकास योजनाओं, विशेषकर लाड़ली बहना योजना के प्रति कांग्रेस के संदेहास्पद रुख की आलोचना करते हुए इसे नारी शक्ति के अपमान से जोड़ा। यह उनके उस भरोसे को दर्शाता है कि जनता अब केवल आश्वासनों पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष लाभ और सम्मान पर विश्वास करती है।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ‘सांदीपनि स्कूल’ की परिकल्पना और प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को दूध वितरण की योजना मुख्यमंत्री के उस विजन को दर्शाती है, जहाँ वे आने वाली पीढ़ी को मानसिक और शारीरिक रूप से सुदृढ़ देखना चाहते हैं। ‘हर घर में गोपाल’ का विचार केवल पोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान और भारतीय मूल्यों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली में पिरोने का एक गंभीर प्रयास है। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा के स्तर को सुधारना और बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता दिखाना यह सिद्ध करता है कि मध्यप्रदेश सरकार सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को अक्षरशः लागू करने की दिशा में अग्रसर है। नेपानगर का यह सम्मेलन इस बात का उद्घोष है कि प्रदेश में अब नीतियों का केंद्र केवल शहर नहीं, बल्कि वे सुदूर वनांचल भी हैं जहाँ विकास की किरण को पूरी प्रखरता के साथ पहुँचना बाकी था। मुख्यमंत्री का यह दृष्टिकोण निश्चित रूप से मध्यप्रदेश को स्वर्णिम भविष्य की ओर ले जाने वाला है।
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