किसान की समृद्धि साथ-साथ

मध्य प्रदेश में विकास को गति और किसान की समृद्धि साथ-साथ

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मध्य प्रदेश में विकास को गति और किसान की समृद्धि साथ-साथ

मध्य प्रदेश की राजनीति और लोक कल्याणकारी शासन के इतिहास में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का हालिया निर्णय एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। लोकतन्त्र में सरकार की सफलता का पैमाना उसकी योजनाओं की व्यापकता नहीं, बल्कि उन योजनाओं के केंद्र में रहने वाले व्यक्ति की संतुष्टि और खुशहाली होती है। डॉ. यादव ने किसानों की भूमि अधिग्रहण के बदले मुआवजे की जो नई व्यवस्था लागू करने का साहस दिखाया है, वह न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से क्रांतिकारी है, बल्कि यह सामाजिक न्याय के उस सिद्धांत को भी पुष्ट करती है जहाँ विकास की वेदी पर किसी निर्दोष के हितों की बलि नहीं दी जाती। विकास और कृषि के बीच अक्सर एक विरोधाभास देखा जाता रहा है, जहाँ औद्योगिक कॉरिडोर या बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए किसानों से जमीनें ली जाती थीं और उन्हें मिलने वाला मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरे के समान होता था। इस विसंगति को दूर करते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह विकास की गति को बढ़ाना तो चाहती है, लेकिन किसानों के आंसू बहाकर नहीं। मुख्यमंत्री द्वारा कैबिनेट के माध्यम से लिए गए निर्णय के अनुसार नगरीय क्षेत्रों में कलेक्टर गाइडलाइन से दोगुना और ग्रामीण क्षेत्रों में चार गुना मुआवजा देने की घोषणा एक ऐसी सकारात्मक पहल है, जो आने वाले समय में प्रदेश की आर्थिक तस्वीर बदल देगी।
​इस नीति की सबसे बड़ी खूबी इसकी पारदर्शिता और तकनीकी सुदृढ़ता है। जब भी बड़े मुआवजे की बात आती है, तो बिचौलियों और भू-माफियाओं का साया मंडराने लगता है। मुख्यमंत्री ने इस आशंका को जड़ से समाप्त करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि भुगतान केवल और केवल दस्तावेजों के आधार पर सीधे किसान के बैंक खाते में ही किया जाएगा। नकद लेनदेन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर सरकार ने भ्रष्टाचार के उन तमाम झरोखों को बंद कर दिया है, जिनसे अक्सर गरीब किसानों की गाढ़ी कमाई रिस जाया करती थी। यह व्यवस्था यह भी सुनिश्चित करती है कि यदि किसी भूमि पर अनधिकृत कब्जा भी है, तो भी न्याय की तराजू पर हक केवल वास्तविक खातेदार का होगा। इससे किसानों में एक सुरक्षा का भाव पैदा हुआ है। डॉ. मोहन यादव का यह दृष्टिकोण कि विकास की योजनाओं में देरी न हो और न ही किसानों को अदालतों के चक्कर लगाने पड़ें, उनकी प्रशासनिक दक्षता को दर्शाता है। राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की सफल नीतियों का अध्ययन कर उन्हें मध्य प्रदेश की मिट्टी की जरूरतों के हिसाब से ढालना एक परिपक्व नेतृत्व की पहचान है। यह सहकारी संघवाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ हम अन्य राज्यों के श्रेष्ठ प्रयोगों से सीखते हैं ताकि अपने प्रदेश के नागरिकों का जीवन सुगम बना सकें।
​मुख्यमंत्री का यह कदम केवल भूमि अधिग्रहण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों के प्रति उनकी उस गहरी संवेदना को भी प्रकट करता है जो संकट के समय ढाल बनकर खड़ी होती है। गेहूं खरीदी के दौरान जूट के बारदानों की कमी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी थी, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण उत्पन्न हुई थी। ऐसी स्थिति में सरकार हाथ पर हाथ धरकर बैठ सकती थी या केंद्र का बहाना बनाकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकती थी, लेकिन डॉ. यादव ने व्यावहारिक रास्ता चुना। प्लास्टिक के बारदानों में गेहूं खरीदी की अनुमति देना यह बताता है कि सरकार नियमों की जकड़न से ज्यादा किसान की उपज को सुरक्षित रखने और उसे समय पर पैसा दिलाने को प्राथमिकता देती है। यह एक ‘संकटमोचक’ सरकार की छवि को पुष्ट करता है। किसान के लिए उसकी फसल सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि उसके साल भर के सपने और मेहनत का परिणाम होती है। सरकार ने उस मेहनत को मंडियों में सड़ने से बचा लिया, यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। इसके साथ ही गेहूं खरीदी का लक्ष्य बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से निरंतर संवाद करना यह दर्शाता है कि राज्य सरकार किसानों के लाभ के लिए हर संभव प्रयास करने को तत्पर है।
​राजनीतिक परिदृश्य में अक्सर विकास कार्यों का विरोध महज विरोध के लिए किया जाता है। डॉ. मोहन यादव ने जिस आश्चर्य के साथ विपक्षी दल कांग्रेस के विरोध पर सवाल उठाए हैं, वह जायज लगते हैं। जब सरकार किसानों को बाजार दर से कई गुना अधिक पैसा दे रही है, उनके बैंक खातों को सुरक्षित कर रही है और उनकी उपज खरीदने के लिए नियमों में ढील दे रही है, तो विरोध का कोई तर्कसंगत आधार शेष नहीं रह जाता। एक सकारात्मक और प्रगतिशील समाज में लोक कल्याणकारी निर्णयों का स्वागत दलगत राजनीति से ऊपर उठकर किया जाना चाहिए। किसान इस समय प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और यदि यह रीढ़ मजबूत होती है, तो मध्य प्रदेश को ‘स्वर्णिम मध्य प्रदेश’ बनने से कोई नहीं रोक सकता। मु ख्यमंत्री का यह अटूट विश्वास कि ‘हम किसान के साथ खड़े हैं’, केवल एक नारा नहीं बल्कि उनकी कार्यशैली में दिखाई देता है। विकास की बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन की आव श्यकता होती है, लेकिन जब किसान को यह पता होता है कि उसकी जमीन का उसे सही मूल्य मिल रहा है, तो वह भी राष्ट्र निर्माण के इस यज्ञ में अपनी आहुति खुशी-खुशी देता है।
​अंततः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार ने ग्रामीण और शहरी विकास के बीच एक ऐसा सेतु तैयार किया है, जिसकी बुनियाद भरोसे और न्याय पर टिकी है। मुआवजा बढ़ाने का यह निर्णय न केवल विस्थापन के दर्द को कम करेगा, बल्कि किसानों को आर्थिक रूप से इतना सशक्त बना देगा कि वे उस मुआवजे की राशि से अपने परिवार का भविष्य संवार सकें या अन्यत्र और बेहतर भूमि खरीद सकें। यह नीति ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मूल मंत्र को जमीनी धरातल पर उतारने वाली है। आने वाले वर्षों में जब मध्य प्रदेश की बुनियादी ढांचागत योजनाएं समय पर पूरी होंगी और किसान भी समृद्धि के नए शिखर छुएंगे, तब इस ऐतिहासिक निर्णय को बड़े आदर के साथ याद किया जाएगा। सरकार की यह संवेदनशीलता और दूरदर्शिता निश्चित रूप से राज्य के कृषि क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात करेगी, जहाँ विकास का लाभ समाज के अंतिम छोर पर खड़े अन्नदाता तक पूरी ईमानदारी के साथ पहुँचेगा। यह एक ऐसी व्यवस्था है जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी एक मिसाल बनेगी कि किस प्रकार औद्योगिक उन्नति और कृषक कल्याण साथ-साथ चल सकते हैं। मध्य प्रदेश का किसान आज खुद को उपेक्षित नहीं, बल्कि शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता में महसूस कर रहा है और यही किसी भी जनप्रिय सरकार की सबसे बड़ी जीत है।

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