
सोशल मीडिया को लेकर केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया में एक प्रकार से अफरा तफ़री का माहौल निर्मित हो गया है। शासन, प्रशासन, पुलिस और नागरिक, इनमें से कोई भी यह समझ ही नहीं पा रहा कि इसे नियंत्रित कैसे किया जाना है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बात जिम्मेदारी की आती है तो कोई स्वयं आगे आकर यह तय नहीं कर पा रहा कि इस मामले को अनुशासित करने के लिए निजी स्तर पर मैं क्या कर सकता हूं। यहां जो मैं शब्द किंकर्तव्य विमूढ़ है दरअसल यही अनिश्चितता के मकड़ जाल में उलझा हुआ है। जिसके चलते सोशल मीडिया पर नित नई समस्याएं खड़ी हो रही हैं। शासन में बैठे लोग एक समस्या का हल करते हैं तब तक चार नहीं समस्याएं सामने खड़ी हो जाती हैं। एक ओर साइबर क्राइम आम आदमी का जीना मुहाल किए हुए है, वहीं कतिपय लोगों की रील बनाने के जुनून ने जैसे मर्यादाओं को तहस-नहस करके रख दिया है। नतीजा यह है कि जो अवांछनीय है, अनापेक्षित है और अप्रत्याशित भी, वह सब देखने की बाध्यता बन गई है। फल स्वरुप अनेकों स्थान पर कानून व्यवस्था के लिए भी चुनौती पूर्ण हालत निर्मित होने लगे हैं। उदाहरण के लिए – एक व्यक्ति राजधानी में स्थापित रानी कमलापति की मूर्ति के सामने केवल इसलिए अश्लील डांस करता है क्योंकि उसे रील बनाकर सोशल मीडिया पर डालनी है और ढेर सारे लाइक इकट्ठे करने हैं। दो अन्य व्यक्ति यातायात को नियंत्रित करने की गरज से लगाए गए अस्थाई डिवाइडरों को बाइक पर घसीटते हुए इसलिए ले जाते हैं, क्योंकि उन्हें सोशल मीडिया पर चर्चित होना है। एक व्यक्ति द्वारा तो पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री की मूर्ति का अपमान किया जाना चर्चाओं में बना हुआ है। यदि सोशल मीडिया के आकर्षण से हटकर भी देखें तो लोगों के क्रियाकलाप ऐसे हैं, जिन्हें देखकर केवल और केवल शर्मिंदा ही हुआ जा सकता है। उदाहरण के लिए – एक व्यक्ति आता है और राजा भोज की प्रतिमा के सामने लघु शंका करके चलता बनता है। इस प्रकार के हालात यह बताते हैं कि सामाजिक स्तर पर हम, वर्तमान युवा और आने वाली पीढ़ी, कितनी तेजी से गलत दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। यह इसलिए लिखना पड़ा क्योंकि जितनी भी अवांछनीय हरकतें हो रही हैं, उन्हें करने वाले अंततः हैं तो समाज के ही लोग। जैसा समाज होता है, लोगों के क्रियाकलाप भी वैसे दृष्टव्य होने लगते हैं और वैसा देखने में भी आ रहा है। शासन और पुलिस प्रशासन की अपनी सीमाएं हैं। यह ठीक है की उनकी मुस्तैदी में अपेक्षित तत्परता की कमी रही होगी। लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं है कि सभ्य समाज में रहने वाले और स्वयं को जागरूक मानने वाले हम लोग अपने दायित्वों से मुंह चुराने में किसी भी प्रकार की शर्मिंदगी का अहसास तक नहीं कर रहे। क्योंकि सड़कों पर, तालाबों पर, मूर्तियों के सामने और मोहल्ले बाजारों में जो लोग अवांछनीय क्रियाकलाप कर रहे हैं, हम इनसे अनभिज्ञ नहीं हैं। कोई ना कोई तो इन्हें जानता पहचानता ही होगा! तो फिर क्या कारण है कि जब सोशल मीडिया पर इस तरह के कंटेंट्स वायरल होते हैं तो हम चुप्पी साध कर बैठ जाते हैं। हद तो यह है कि इस तरह की गलत सामग्रियों को हम तारीफ करके प्रोत्साहित करते दिखाई देते हैं। यही नहीं, अनेक लोग तो इन्हें बेहद उत्साह जनक कमेंट्स के साथ आगे फॉरवर्ड भी करते चले जाते हैं। इसे पश्चिमी सभ्यता का जाल कहें या बाजार बाद का शिकंजा, यही लाइक्स और फॉरवर्ड का खेल रील बनाने वालों को अधिकतम आय का जरिया उपलब्ध करा रहा है। जिसके चलते कम समय में धनपति बनने का ख्वाब रखने वाले लोग गलत तरीके से प्रोत्साहित हो रहे हैं। हमारी गलती यह है कि हम इन्हें देखकर चुप हैं, इन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं, इनका महिमा मंडल कर रहे हैं। जबकि होना तो यह चाहिए कि जब हमें लगता है सोशल मीडिया पर आया हुआ कमेंट्स गलत है तो फिर हम # के साथ उसे साइबर पुलिस अथवा साइबर क्राइम ब्रांच की ओर अग्रसर करके जागरूक नागरिक होने का दायित्व निभा सकते हैं। ऐसी आपत्तिजनक सामग्री को लेकर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियात्मक जागरूकता की भी आवश्यकता है। यदि हम लोगों को सोशल मीडिया पर बताएंगे कि अमुक चीज गलत है, यह समाज अथवा कानून व्यवस्था के लिए हानिकारक है। अतः इसका विरोध करें, आश्वस्त हुआ जा सकता है कि भले ही शत प्रतिशत लोग सक्रिय न हों, लेकिन समाज का एक बड़ा तबका सोशल मीडिया पर सक्रिय होगा और ऐसी आपत्तिजनक सामग्रियों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन खड़ा होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। इससे सोशल मीडिया पर अवांछनीय, आपत्ति जनक एवं नुकसान दायक सामग्रीय घाटेगी। इसके अलावा आभासी दुनिया से हटकर वास्तविक दुनिया में जो कुछ घटित हो रहा है, जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर अश्लील या फिर अपवित्र हरकतें करना, इन्हें भी हमें अपनी जागरूकता से रोकना होगा। यह तब संभव है जब हम अपने युवाओं और भावी पीढ़ी को यह समझने में सफल हो पाएं कि क्या गलत है जो उन्हें नहीं करना चाहिए और क्या सही है जिस राह पर उन्हें चलना है। यदि सामाजिक दायित्व इस ओर जागरूकता दिखाते हैं तो फिर क्या आभासी दुनिया और क्या वास्तविक दुनियादारी, हर जगह से वह सब नियंत्रित किया जा सकता है जो दृश्य श्रव्य और प्रकाशित अवस्था में समाज के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए, शासन, प्रशासन, पुलिस और समाज, ये सभी मिलकर सकारात्मक राह पर सहयोगात्मक कदम एक साथ आगे बढ़ाएंगे तो परिणाम भी अनुकूल ही प्राप्त होने वाले हैं। देश प्रदेश के जागरूक नागरिकों को इस बारे में गंभीरता के साथ चिंतन करने की आवश्यकता है।


