
किसी भी पार्टी का सदस्यता अभियान उसका अपना निजी और बेहद निजी मामला होता है। इसमें किसी दूसरे विरोधी दल को टीका टिप्पणी करने की गुंजाइश ही कहां रह जाती है। लेकिन देखने में यह आ रहा है कि जैसे-जैसे भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता नए कीर्तिमान स्थापित करती चली जा रही है, वैसे-वैसे विरोधी दलों और विरोधी मानसिकता रखने वाले लोगों के पेट में मरोड़ पैदा होने लगी है। अभी हाल ही में कुछ कांग्रेसी नेताओं ने भाजपा के सदस्यता अभियान को दिखावा, फर्जीवाड़ा और न जाने क्या-क्या कहा है। यह आचरण ठीक वैसा है जैसे कोई आराम पसंद व्यक्ति श्रम करना नहीं चाहे, और यदि कोई दूसरा व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से नए आयाम स्थापित करने का प्रयास करे तो आराम पसंद व्यक्ति को अपनी लकीर बड़ी करने की बजाय सामने वाले की लकीर को छोटा प्रदर्शित करने का उद्यम करने के लिए बाध्य हो जाना पड़ता है। लगभग ऐसी ही हालत कांग्रेस की है। सदस्यता अभियान हो अथवा जन आंदोलन, इन दोनों ही मामलों में कांग्रेस लंबे समय से मुंह की खाती चली आ रही है। यही वजह है कि उसका जमीनी प्रभाव लगातार कम हो रहा है। सत्ता तो सत्ता, वह विपक्षी दल के नाते भी सम्मानजनक स्थिति से वंचित होती चली जा रही है। इसका कारण केवल इतना सा है कि जो कांग्रेस खुद को देश आजाद करने वाली पार्टी होने का दावा करती है, अब वह आराम पसंद हो चली है। सत्ता उसे मिलती नहीं है और विपक्षी धर्म निभाना वह कब का भूल चुकी है। नतीजा यह है कि विधानसभा तो विधानसभा, लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का मध्य प्रदेश स्तर पर तो फट्टा साफ होता चला जा रहा है। पूरी पार्टी गुटबाजी में उलझी हुई है। जिसे देखो वही केवल बयान बाजी करके चर्चाओं में बने रहना चाहता है। इस चक्कर में कभी-कभी ऐसी बातें भी अति उत्साह में मुंह से निकल जाती हैं, जिसके कारण पार्टी और नेता दोनों को कई बार हंसी का पात्र भी बन जाना पड़ता है। लेकिन क्या मजाल है जो कांग्रेसजन अपनी सदस्यता पर भी गौर कर लें और थोड़ी बहुत जनसाधारण की खबर भी ले लें। इन सब बातों से बेफिक्र होकर भारतीय जनता पार्टी एवं उसके नेता अपने सदस्यता अभियान को नई ऊंचाइयां देने के उद्यम में जुटे हुए हैं। यह अपने आप में बेहद बड़ी कामयाबी है कि इस पार्टी ने केवल मध्य प्रदेश में ही एक करोड़ से अधिक सदस्य बना लिए हैं। पोलिंग बूथ पर सक्रिय साधारण कार्यकर्ता से लेकर प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री तक, सब के सब मानो एक दूसरे को प्रतिस्पर्धा देकर अधिक से अधिक सदस्य खड़े करने की मुहिम में जुट गए हैं। विभिन्न जिलों तहसीलों और छोटे बड़े गांव शहरों से यह खबरें बड़ी मात्रा में प्राप्त हो रही हैं कि अधिकांश भाजपा कार्यकर्ता और पदाधिकारी जोर-जोर से सदस्यता अभियान में जुटे हुए हैं। ऐसा भी नहीं है कि यह सब कुछ मनमर्जी के आधार पर चल रहा हो। बाकायदा भाजपा के सदस्यता अभियान प्रभारियों द्वारा मॉनिटरिंग की जा रही है।व्यक्तिगत रूप से संपर्क करते हुए यह जानकारी नियमित एकत्रित की जा रही है कि किस व्यक्ति ने, किस क्षेत्र में, एक दिन में कितने कार्यकर्ता बना लिए हैं, और कौन-कौन लोग इस महत्वपूर्ण मामले में उदासीन रवैया अपना रहे हैं। यानि जो इमानदारी से कार्य में जुटे हैं उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है और जो लोग अपने दायित्वों के प्रति लापरवाह हैं उन्हें उनके भविष्य को लेकर कड़ी चेतावनी दी जा रही है। जाहिर है जब कोई काम पूरी तैयारी के साथ होता है तो फिर उसके परिणाम भी सकारात्मक ही आते हैं। यही मनचाहा फल भारतीय जनता पार्टी को सदस्यता अभियान के माध्यम से प्राप्त हो रहा है। इसमें कोई बहुत ज्यादा ज्ञान वाली बात नहीं है कि जिस पार्टी के जितने अधिक कार्यकर्ता खड़े होते हैं, वह विभिन्न चुनावों में उतनी ही ताकत से विरोधी दलों से जूझ पाती है और आम जनता के सामने अपनी बात रखने में उतनी ही मजबूती से सफलता प्राप्त कर लेती है। जब एक राजनीतिक दल इन सभी सफलताओं को अर्जित करता चला जाता है तो फिर विरोधी दलों को चिंता होना स्वाभाविक है। लेकिन चिंता का मतलब यह भी नहीं होता कि जो मेहनत कर रहा है उसकी निंदा करके जनसाधारण का ध्यान भड़काया जाए। अच्छा तो यह है कि भाजपा का विरोध करने वाले दलों और व्यक्तियों को अपनी लकीर बड़ी खींचने के उद्यम में जुटना चाहिए। अभी हाल ही में खबर मिली कि भाजपा के कार्यकर्ता सदस्यता अभियान में जनसंपर्क कर रहे थे तो मालवा क्षेत्र के एक शहर में कुछ असामाजिक तत्वों ने इस कार्य में अड़ंगा डालने का प्रयास किया और जब सफलता नहीं मिली तो फिर कानून व्यवस्था को चुनौती देने की स्थिति पैदा करने में लग गए। मजबूरन पुलिस को आंशिक बल प्रयोग करना पड़ा। लोकतांत्रिक लिहाज से यह तस्वीर अच्छी नहीं है। यदि कोई राजनीतिक दल अपना सदस्यता अभियान चला रहा है तो विरोधी मानसिकता के व्यक्तियों और नेताओं को वहां फालतू व्यवधान पैदा करने की आवश्यकता भी क्या है। अरे भाई आपके लिए भी खुला मैदान पड़ा हुआ है। आप क्यों नहीं अपने वरिष्ठ अधिकारियों से कहकर इसी प्रकार के कार्यक्रम अपने दल के भीतर प्रारंभ करवा लेते? लिखने का आशय केवल इतना भर है कि सदस्यता अभियान भाजपा का अपना निजी मामला है यदि वह इस कार्य में नई सफलताएं अर्जित कर रही है तो विरोधी मानसिकता वाले दलों और व्यक्तियों को पेट में मरोड़ नहीं उठनी चाहिए


