काले धन की बरामदगी में सरकार सख्त, विपक्ष बयान बाजी में मस्त

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आरटीओ के एक सिपाही की काली करतूत को लेकर कुछ लोगों ने अघोषित युद्ध जैसा छेड़ रखा है। हद तो यह है कि स्वयं को मीडिया का मार्गदर्शक और अत्यंत विद्वान समझने वाले कतिपय अखबार नवीस भी इस मामले को तूल देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। यही कारण है कि मामले में कोई तरक्की हो या ना हो, विवेचना सकारात्मक हो या नकारात्मक, कुछ लोगों ने इसे प्रथम पृष्ठ का समाचार बनाए रखा है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि बात पत्रकारिता की हो अथवा प्रबुद्ध वर्ग की, कोई भी निरपेक्ष रहना नहीं चाहता। सबके अपने व्यावसायिक हित और लक्ष्य निर्धारित हैं। जिन्हें प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार की कसर देखने में नहीं आ रही। सब जानते हैं कि आरटीओ के एक सिपाही के पास से अकूत धन संपदा बरामद हुई है। सोना, नगदी, स्थाई संपत्ति, कीमती वाहनों का जखीरा और लॉकरों मैं बंद रहस्यमई दस्तावेज बरामद होते चले जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि यह मध्य प्रदेश पुलिस और यहां की जांच एजेंसियों की जागरूकता का ही नतीजा है, जिसके चलते काली कमाई में लिप्त एक व्यक्ति को टारगेट पर लिया जा सका और उसके समूचे काले साम्राज्य को एक के बाद एक नष्ट किया जा रहा है‌। विपक्ष का आरोप है कि यह सब अभी तक सरकार की नाक के नीचे कैसे चलता रहा ? शक जाहिर किया जा रहा है कि आरटीओ के इस सिपाही को सत्ता पक्ष के लोगों का समर्थन प्राप्त था। दावे तो यहां तक किए जा रहे हैं कि उसकी नियुक्ति भी सत्ता में बैठे कुछ लोगों द्वारा इसीलिए की गई थी, ताकि वह खुद भी कमाए और कमा कर भर्ती दिलाने वालों के खजाने को भी भरता रहे। उस पर तुर्रा यह कि विपक्ष दावा कर रहा है, उसके पास इस बाबत प्रामाणिक दस्तावेज और सबूत मौजूद हैं। यहां सवाल उठता है कि जब विपक्ष के पास उक्त सिपाही को लेकर इतने सारे सबूत हैं तो फिर वह अपना समय बयान बाजी में क्यों बर्बाद कर रहा है? उसे चाहिए कि सारे प्रमाणिक दस्तावेज लेकर पुलिस के पास पहुंचे, जांच एजेंसियों के पास पहुंचे, सरकार के पास आमद दर्ज कराए। और यदि उसे इनमें से किसी पर भी भरोसा नहीं है तो फिर अदालत का दरवाजा तो खुला ही है। वहां जाकर सभी महत्वपूर्ण और विश्वसनीय कहे जाने वाले दस्तावेज प्रस्तुत किए जा सकते हैं। दावे के साथ कहा जा सकता है कि यदि विपक्ष सकारात्मक राजनीति करे, सत्ता पक्ष के केवल दोष ही ना गिनाए, बल्कि उसकी कमियों में सुधार के रास्ते भी दिखाए, तो प्रदेश की जनता का भला भी किया जा सकता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि ऐसा हो नहीं रहा है। एक बात तो विपक्ष को माननी ही पड़ेगी, देर से ही सही आखिर तो सिपाही द्वारा अर्जित सोना चांदी पैसा और जायदाद सरकार के विभिन्न विभागों उसके अधिकारियों द्वारा ही बरामद किए गए। हां विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि इस कार्रवाई में इतनी देर कैसे लगी। लेकिन इस मामले को लेकर सरकार की नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता। सबकी समझ में आ रहा है, विपक्ष और कुछ चुनिंदा बुद्धिजीवियों की रुचि इस चीज में बिल्कुल नहीं है की काली कमाई करने वाले उस सिपाही के संरक्षकों और साथियों को सजा मिले तथा उसके राज्य भर में फैले ठिकाने राजसात कर लिए जाएं। बल्कि इन लोगों की रुचि इस बात में ज्यादा है कि मामले को ज्यादा से ज्यादा हवा देकर सरकार को बदनाम कैसे किया जा सकता है। इसका प्रमाण यह है कि जब मामले का खुलासा हुआ तब पहले दिन एक समाचार पत्र विशेष में यह समाचार प्रथम पृष्ठ पर लीड न्यूज़ बनाकर छापा गया। तब लगा कि मामला बड़ा है, इसलिए इसे फ्रंट पेज की लीड न्यूज़ बनाने का मुद्दा तो बनता है। दूसरे दिन भी वही सब देखने को मिला तो यह सोचकर संतोष किया गया कि इस बार समाचार का व्यापक फॉलो अप प्रस्तुत है। इसलिए उक्त समाचार का फ्रंट पेज पर लीड न्यूज़ के रूप में प्रकाशित होना बनता है। लेकिन धीरे-धीरे जब समय व्यतीत होने लगा, अन्य बड़े-बड़े घटनाक्रम घटित होते रहे। लेकिन आरटीओ के इस अदने से सिपाही को छापने से कतिपय लोगों का मन नहीं भरा तो यह स्पष्ट होने लगा कि संभव है कुछ लोगों द्वारा एक सुनियोजित रणनीति के तहत सरकार को परेशान करने, उसकी छवि खराब करने का एक छुपा हुआ एजेंडा काम कर रहा है। इस आसन का को इस बात से भी बल मिलता है की अभी भी आरटीओ का उक्त सिपाही एक समाचार पत्र विशेष में प्रथम पृष्ठ के समकक्ष स्थान पर सम्मान प्राप्त किए हुए हैं। साथ में आधारहीन ऐसे में बयान तरजीह रहे हैं जो केवल और केवल सरकार के खिलाफ दिखाई देते हैं। इनमें कहीं मंत्री, कहीं विधायक तो कहीं सरकार की नीयत पर संदेह खड़े किए जा रहे हैं‌। दावे किए जा रहे हैं- हमारे पास सबूत हैं, समय आने पर सब उजागर करेंगे और उचित कार्रवाई करके ही दम लेंगे। अब जनमानस के बीच से भी सवाल उठने लगे हैं कि आखिर वह समय कब आएगा और विपक्ष को किस समय का इंतजार है? क्या उसको लग रहा है कि जल्दी ही वह राज्य की सत्ता में वापस लौटने वाला है और अपनी सरकार की आते ही वह काली कमाई के इस मामले को अंजाम तक पहुंचने वाला है? तो इसका जवाब यही बनता है कि यह दिन में देखे जाने वाले सपने से अधिक और कुछ नहीं है। विपक्ष हो अथवा मीडिया के कारपोरेट घराने, इन सबको वास्तविकता के धरातल पर खड़े होकर केवल और केवल जनता के हित के बारे में सोने की आवश्यकता है।

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