Dalai Lama Tibet

दलाई लामा के उत्तराधिकार मामले में चीन की भारत को नसीहत, तिब्बत मुद्दे को बताया अपना आंतरिक विषय

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एजेंसी, बीजिंग। Dalai Lama Tibet : पड़ोसी देश चीन ने एक बार फिर भारत को दलाई लामा के उत्तराधिकार और उनके पुनर्जन्म से जुड़े संवेदनशील मामले से पूरी तरह दूर रहने की सख्त हिदायत दी है। चीनी सरकार के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, बीजिंग प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अगले दलाई लामा और उनके उत्तराधिकारी को चुनने की पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से चीन का आंतरिक विषय है। चीनी सरकार ने कड़े शब्दों में कहा है कि इस मामले में किसी भी तीसरे देश या बाहरी शक्ति के हस्तक्षेप को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। भारत में स्थित चीनी दूतावास की मुख्य प्रवक्ता यू जिंग ने रविवार को एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि बौद्ध धर्म के सर्वोच्च गुरु दलाई लामा का पुनर्जन्म सदियों पुराने धार्मिक रीति-रिवाजों, कड़े बौद्ध नियमों और ऐतिहासिक रूप से चली आ रही परंपराओं के आधार पर तय किया जाता है, जिसमें किसी भी बाहरी देश की कोई भूमिका नहीं हो सकती।

तिब्बती निर्वासित सरकार की सक्रियता से उपजा विवाद

चीन की तरफ से यह तीखा और आक्रामक बयान बेहद रणनीतिक समय पर सामने आया है। भारत के हिमाचल प्रदेश में स्थित धर्मशाला शहर में सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (सीटीए) यानी भारत से संचालित होने वाली निर्वासित तिब्बती सरकार के नवनिर्वाचित प्रमुख पेनपा त्सेरिंग दूसरी बार अपने पद की गोपनीयता की शपथ ग्रहण करने जा रहे हैं। इस खास और बड़े शपथ ग्रहण समारोह में स्वयं वर्तमान दलाई लामा के भी व्यक्तिगत रूप से शामिल होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। इसी राजनीतिक हलचल को देखते हुए चीनी दूतावास ने भारत सरकार को तिब्बत मामले पर उसके पुराने और आधिकारिक कूटनीतिक रुख की याद दिलाई है। चीनी प्रवक्ता ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि भारत को अपनी सरजमीं का इस्तेमाल तिब्बत की आजादी या उससे जुड़ी किसी भी प्रकार की अलगाववादी गतिविधियों के लिए मंच के रूप में नहीं करने देना चाहिए। चीन का मानना है कि दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय स्थिरता और बेहतर द्विपक्षीय संबंधों को बनाए रखने के लिए इस नियम का पालन किया जाना बेहद आवश्यक है।

बीजिंग प्रशासन को असल में इस बात का गहरा डर सता रहा है कि भारत में सक्रिय निर्वासित तिब्बती नेतृत्व भविष्य में चीन की कम्युनिस्ट सरकार की अनुमति और मर्जी के बिना ही अपनी तरफ से नए दलाई लामा के नाम की घोषणा कर सकता है। सीटीए के राजनीतिक प्रमुख पेनपा त्सेरिंग ने फरवरी में हुए चुनावों में इकसठ प्रतिशत से भी अधिक मत हासिल कर एकतरफा जीत दर्ज की थी। कर्नाटक के शरणार्थी शिविर में जन्मे और मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त त्सेरिंग का तिब्बती समाज में बहुत बड़ा प्रभाव है और वे वर्तमान दलाई लामा के भी बेहद करीबी माने जाते हैं, जिसने चीन की चिंताओं को और अधिक बढ़ा दिया है।

दलाई लामा के चयन की पारंपरिक प्रक्रिया

बौद्ध धर्म की सर्वोच्च परंपराओं के अनुसार, दलाई लामा की मृत्यु हो जाने के बाद जब पूरे समुदाय का तय शोक काल समाप्त हो जाता है, तब नए आध्यात्मिक गुरु की खोज का बेहद जटिल कार्य प्रारंभ किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, दलाई लामा अपने महापरिनिर्वाण से पूर्व ही अपने नए जन्म स्थान या उत्तराधिकारी से जुड़ी कुछ गुप्त निशानियां और संकेत छोड़ जाते हैं। इसके अतिरिक्त, वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं का एक विशेष दल अपनी तपस्या और गहन ध्यान के माध्यम से कुछ अन्य पवित्र लक्षणों की पहचान करता है। गुरु की मृत्यु के समय उनके पार्थिव शरीर की दिशा और वरिष्ठ भिक्षुओं को आने वाले आध्यात्मिक सपनों के आधार पर ही नए दलाई लामा को खोजने की भौगोलिक दिशा निर्धारित की जाती है। इस पूरी रहस्यमयी प्रक्रिया में बड़े ज्योतिषियों की गणनाओं की भी विशेष मदद ली जाती है।

यह खोजी दल मुख्य रूप से दलाई लामा के निधन के समय या उसके बिल्कुल आस-पास की तिथियों में पैदा हुए नवजात बच्चों की सघन तलाश करता है। जब किसी बच्चे में अलौकिक और विशेष लक्षण दिखाई देते हैं, तो उसकी बेहद कठिन धार्मिक परीक्षाएं ली जाती हैं। उस छोटे बच्चे के सामने पिछले दलाई लामा के उपयोग की वस्तुएं जैसे चश्मा, पवित्र घंटी और छड़ी रखी जाती हैं। यदि बच्चा बिना किसी गलती के अपने पूर्व जन्म की सही चीजों को पहचान लेता है, तो भिक्षुओं का दल उसे दलाई लामा का असली पुनर्जन्म स्वीकार कर लेता है और फिर उसे मठों में ले जाकर गूढ़ बौद्ध दर्शन की शिक्षा दी जाती है।

तिब्बत पर चीनी कब्जा और दलाई लामा का पलायन

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, तिब्बत हमेशा से चीन का हिस्सा नहीं था बल्कि एक स्वतंत्र और शांत क्षेत्र था। साल 1949 में जब चीन में कम्युनिस्ट पार्टी पूर्ण सत्ता में आई, तो उसके ठीक एक साल बाद यानी 1950 में चीनी सेना ने तिब्बत पर अचानक हमला करके उस पर अपना बलपूर्वक अधिकार जमा लिया। इसके बाद दोनों सरकारों के बीच एक संधि हुई जिसमें तिब्बत की स्वायत्तता बरकरार रखने का वादा किया गया था, परंतु चीनी सेना ने लगातार वहां के नागरिकों पर भीषण अत्याचार जारी रखे। वर्तमान चौदहवें दलाई लामा की आत्मकथा के पन्नों के अनुसार, मार्च 1959 में जब चीनी सेना ने उनके महल को चारों तरफ से घेर लिया, तो वे अपने प्राणों की रक्षा के लिए एक साधारण सैनिक की पोशाक पहनकर अत्यंत गोपनीय तरीके से तिब्बत से बाहर निकल भागे।

लगभग दो हफ्तों तक दुर्गम रास्तों और विभिन्न बौद्ध मठों में शरण लेते हुए, 31 मार्च 1959 को वे अपने परिवार और अंगरक्षकों के साथ भारत के अरुणाचल प्रदेश की सीमा में दाखिल हुए। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने चीन के साथ रिश्तों में आने वाली कड़वाहट की परवाह न करते हुए 3 अप्रैल 1959 को दलाई लामा को भारत में राजनीतिक शरण देने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। भारत सरकार ने शुरुआत में उन्हें असम के तेजपुर और बाद में मसूरी में ठहराया, जिसके बाद साल 1960 से वे स्थाई रूप से हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहने लगे, जिसे आज पूरी दुनिया में निर्वासित तिब्बत की राजधानी के रूप में जाना जाता है।

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