एजेंसी, गुवाहाटी। Assam UCC bill passed : देश के पूर्वोत्तर राज्य असम से एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक राजनैतिक खबर सामने आ रही है। असम की विधानसभा ने बुधवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को पूर्ण बहुमत के साथ पारित कर दिया है। इस नए और ऐतिहासिक कानून का मुख्य उद्देश्य राज्य के भीतर विवाह, वैवाहिक विच्छेद (तलाक), संपत्ति के उत्तराधिकार और साथ रहने के संबंधों (लिव-इन रिलेशनशिप) को पूरी तरह से नियंत्रित और संचालित करना है। इसके तहत अब धर्म की परवाह किए बिना सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था और ढांचा स्थापित किया जाएगा। हालांकि, सदन की इस कार्यवाही के दौरान मुख्य विपक्षी दलों ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया और इसे गहन समीक्षा के लिए एक विशेष प्रवर समिति के पास भेजने की पुरजोर मांग की, जिसे स्वीकार नहीं किया गया।
A watershed moment in Assam’s history as we become the third Indian State to enact the UCC fulfilling the desire of the founding fathers of our nation.
It fulfils three important issues
✅Article 44 of Constitution
✅ @BJP4India‘s Founding Ideals
✅ @BJP4Assam electoral promise pic.twitter.com/GvCzAW5qVD— Himanta Biswa Sarma (@himantabiswa) May 27, 2026
देश में समान कानून लागू करने वाला बना तीसरा राज्य
इस नए और ऐतिहासिक विधेयक के विधानसभा से पारित होने के साथ ही असम अब देश का ऐसा तीसरा राज्य बन गया है, जिसने अपने यहां समान नागरिक संहिता को कानूनी रूप दिया है। इससे पूर्व उत्तराखंड और गुजरात की सरकारों ने अपने राज्यों में इस तरह के विधेयकों को कानूनी मंजूरी प्रदान की थी। उल्लेखनीय है कि इनके अतिरिक्त गोवा राज्य में भी एक समान नागरिक कानून बहुत पहले से ही प्रभावी है, परंतु वह पूर्ववर्ती पुर्तगाली औपनिवेशिक काल के समय से ही वहां निरंतर चला आ रहा है। असम में इस नए कानून के आने से राज्य की सामाजिक और कानूनी व्यवस्था में एक युगांतरकारी परिवर्तन आने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
विपक्षी सदस्यों का जोरदार हंगामा और नारेबाजी
‘समान नागरिक संहिता, असम, 2026 विधेयक’ पर राज्य की विधानसभा में दिन भर बहुत ही तीखी और लंबी बहस चली। चर्चा की समाप्ति के बाद विधानसभा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कराने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए सदन के पटल पर रखने की अनुमति दी। इस दौरान अध्यक्ष ने विपक्षी दलों की उस मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिसमें विधेयक को व्यापक जनहित और विचार-विमर्श के लिए प्रवर समिति को सौंपने की वकालत की जा रही थी। इस फैसले से नाराज होकर विपक्षी पार्टियों के विधायक और सदस्य सदन के बीचों-बीच (वेल में) आ गए और सरकार के खिलाफ लगातार नारेबाजी करते हुए विरोध प्रदर्शन करने लगे।
सदन में ध्वनि मत से पारित हुआ ऐतिहासिक प्रस्ताव
विधानसभा के भीतर जहां एक तरफ विपक्षी सदस्य अपनी मांगों को लेकर लगातार हंगामा कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के विधायकों ने ‘भारत माता की जय’ और ‘जय श्री राम’ के गगनभेदी नारे लगाने शुरू कर दिए। इसी भारी शोर-शराबे और गहमा-गहमी के बीच विधानसभा अध्यक्ष ने विधेयक को स्वीकृत करने के लिए ध्वनि मत की प्रक्रिया का सहारा लिया। सत्ता पक्ष के सभी सदस्यों ने एकजुट होकर इस विधेयक के पक्ष में अपना गुप्त और मुखर समर्थन दिया, जिसके बाद अध्यक्ष ने औपचारिक रूप से घोषणा करते हुए कहा, “मैं यह घोषणा करता हूँ कि यह महत्वपूर्ण विधेयक अब पूरी तरह से पारित हो चुका है।” इस घोषणा के होते ही पूरा सदन मेजों की थपथपाहट और जोरदार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध और कड़े दंडात्मक प्रावधान
असम सरकार द्वारा सोमवार को सदन में पेश किए गए इस कानून के प्रारूप में कई बेहद कड़े और सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं। इस नए कानून के लागू होने के बाद राज्य में बहुविवाह (एक से अधिक शादी करने) की प्रथा पर पूरी तरह से कानूनी रोक लग जाएगी। इसके साथ ही, बिना विवाह के साथ रहने वाले जोड़ों (लिव-इन रिलेशन) के लिए अपनी संस्था का सरकारी पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) कराना पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है। नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए कड़े दंड की व्यवस्था की गई है, जिसके तहत यदि कोई व्यक्ति द्विविवाह या बहुविवाह का दोषी पाया जाता है, तो उसे सात वर्ष तक के सश्रम कारावास की सजा भुगतनी होगी। इसके अलावा, लिव-इन संबंधों का पंजीकरण न कराने की स्थिति में तीन महीने तक की जेल की सजा का प्रावधान भी शामिल किया गया है।
जनजातीय समुदायों को कानून के दायरे से रखा गया बाहर
इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि असम सरकार ने राज्य की अनूठी सांस्कृतिक विविधता और परंपराओं का पूरा ध्यान रखा है। विधेयक के भीतर पूरी तरह से यह स्पष्ट किया गया है कि यह नया समान नागरिक कानून असम में निवास करने वाले किसी भी अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति या समुदाय पर प्रभावी नहीं होगा। उनकी पारंपरिक और सांस्कृतिक स्वायत्तता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उन्हें इस नए कानून के दायरे से पूरी तरह मुक्त रखा गया है, ताकि मूल निवासियों की परंपराओं पर कोई आंच न आए।
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