पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं, एक तपस्या है। इस तपस्या को निभाने वाले कुछ विरले लोग होते हैं, जो सीमित संसाधनों, विषम परिस्थितियों और अनगिनत चुनौतियों के बावजूद, अपने दृढ़ संकल्प से एक ऐसी संस्था की नींव रखते हैं जो समाज को दिशा दे सके। स्व. श्री ज्ञान प्रकाश बाली ऐसी ही एक शख्सियत थे, जिन्होंने अपनी अनूठी शैली और अथक संघर्ष से ‘दैनिक सतपुड़ा वाणी’ को भोपाल के पत्रकारिता फलक पर एक विशिष्ट मुकाम दिलाया।
उनका जीवन-विश्लेषण, वस्तुतः, विपरीत परिस्थितियों में भी एक विशाल परिकल्पना को साकार करने की एक प्रेरणादायक इबारत है। ज्ञानप्रकाश बाली का व्यक्तित्व किसी एक सांचे में बंधा हुआ नहीं था। वे अपने तरह के अलग मिजाज के धनी थे। उनके स्वभाव में कभी खुश-मिजाजी की सहजता झलकती थी, तो कभी किसी मुद्दे पर सख्त तल्ख होने का साहस। यह द्वैत, यह सम-विषम परिस्थितियों से अनुकूल कदमताल, उनके चरित्र को और भी अधिक मानवीय और सजीव बनाता था। प्रकृति ने उन्हें ऐसी नेमत बख्शी थी कि उनकी भाव-भंगिमा की प्राकृतिक अभिव्यक्ति उन्हें हर अपने-परायों के लिए अजीज शख्सियत के रूप में पहचान दिलाती थी।
वे केवल एक संस्थापक नहीं, बल्कि सामाजिक-पारिवारिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन में सतत् संघर्ष की सहज भूमिका निभाने वाले एक कर्मठ इंसान थे। जीवन के व्यावहारिक मोर्चों पर उनका निरंतर संघर्ष ही वह कसौटी थी जिसने उनके नेतृत्व को प्रामाणिकता प्रदान की। उनकी यह क्षमता कि वे परिस्थितियों के हिसाब से तुरंत संतुलन बना सकने वाले सिद्धहस्त-नट थे, उनके व्यक्तित्व का वह प्रधान पक्ष है जिसे सदा-सदा स्मरित किया जाता रहेगा। यह यथार्थ भी है और यही उन्हें स्मरण करने की वजह का सारांश भी। ‘दैनिक सतपुड़ा वाणी’ जिस प्रतिष्ठान के रूप में जाना जाता है, उसकी मजबूत, लोकोपयोगी, सार्थक और सदाबहार आयाम देने में स्व. ज्ञानप्रकाश बाली की दूरदर्शी भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह समाचार पत्र, पत्रकारिता के विशाल अरण्य में, एक विशाल वट वृक्ष की तरह खड़ा है, और यह वट वृक्ष उस तपस्वी की संघर्ष तपस्या की बानगी है।
बाली जी ने यह सब सीमित संसाधनों के अवलम्व पर हासिल किया। यह किसी भागीरथी प्रयास से कम नहीं था कि उन्होंने एक विशाल परिकल्पना को यथार्थ के धरातल पर प्रतिष्ठित किया। यह दिखाता है कि साधन नहीं, बल्कि साध्य के प्रति निष्ठा और उसे प्राप्त करने की अदम्य इच्छाशक्ति ही किसी बड़े प्रतिष्ठान की सच्ची पूंजी होती है। यह कहना किसी भी अतिश्योक्ति से परे होगा कि ‘दैनिक सतपुड़ा वाणी’ प्रतिष्ठान पत्रकारिता की एक उत्कृष्ट प्रयोगशाला रहा है। ज्ञानप्रकाश बाली जी के मार्गदर्शन में इस संस्थान ने अनगिनत पत्रकारों को न केवल आश्रय दिया, बल्कि उन्हें तराशने का कार्य भी किया। यहीं रहकर कई अखबार नवीसों ने पत्रकारिता का मूल ज्ञान सीखा।
’सतपुड़ा वाणी’ ने अपने शैशव-काल से ही अपनी अलग पहचान बना ली थी। इससे करीबी वास्ता रखने वाले पत्रकार साथियों ने स्वर्गीय बाली साहब की देख-देख में सतपुड़ा वाणी के तेवरों को अपनी कलम की धार से पैना बनाया। लेकिन यह पैनापन केवल आलोचना या सनसनीखेज रिपोर्टिंग के लिए नहीं था। इस संस्थान ने राष्ट्रीय, राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों की तात्कालिक परिस्थितियों की फेहरिस्त के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को बेहतर और सर्वमान्य लिहाज से परिष्कृत भी किया था।
बाली जी ने सहाफियों को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन और ‘मिशन’ के उन्नयन में व्यक्तिगत योगदान के भरपूर अवसर प्रदान किए। इसी वजह से प्रतिष्ठान में एक मजबूत टीम वर्क की भावना पनपी, जो इसकी बुनियाद का सबसे मजबूत आधार बनी। यह एक ऐसी नेतृत्व शैली थी जिसने लोगों को केवल निर्देश नहीं दिए, बल्कि उन्हें सशक्त बनाया। यह निर्विवाद है कि जीवन में सफलता या असफलता “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनम” के निर्धारित नियति पर आश्रित होती है। ज्ञानप्रकाश बाली का जीवन इस सूत्र-वाक्य का एक सजीव उदाहरण था। व्यावहारिक जीवन की कठिनाइयाँ और अपरिहार्य संघर्ष उनके मार्ग में थे, लेकिन उनकी वृत्ति और प्रवृत्ति ने हमेशा उन्हें निर्णायक भूमिका में रखा।
यह सत्य है कि मनुष्य की वृत्ति और प्रवृत्ति के विश्लेषण में कई बार विरोधाभास प्रधान पक्ष बनकर उभर आता है। ज्ञानप्रकाश बाली भी इस मायने में अपवाद नहीं थे। प्रकृति की नेमत की इसी पगडंडी से होकर गुजरने के अलावा उनके पास भी कोई विकल्प नहीं था। यह विरोधाभास उनके मानवीय होने का प्रमाण था, लेकिन इन सभी मानवीय दुर्बलताओं और मजबूतियों के बीच, जो पक्ष हमेशा विजयी रहा, वह था- परिस्थितियों के हिसाब से संतुलन बनाने की उनकी असाधारण क्षमता। स्व. ज्ञानप्रकाश बाली आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन ‘दैनिक सतपुड़ा वाणी’ के रूप में उनका संघर्ष, उनकी दूरदृष्टि और उनके द्वारा स्थापित पत्रकारिता के उच्च मूल्य आज भी जीवंत हैं। उन्होंने एक ऐसा संस्थान खड़ा किया जो पत्रकारिता को केवल सूचना संप्रेषण नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन मानता है। उनका जीवन सिखाता है कि संघर्ष, संतुलन और समर्पण ही किसी भी महान कार्य की नींव होते हैं। ज्ञानप्रकाश बाली बेशक अविस्मरणीय रहेंगे – एक ऐसे शख्स के रूप में, जिन्होंने अपनी अनूठी शख्सियत, विषम परिस्थितियों से अनुकूल कदमताल और समाज तथा सहकर्मियों के प्रति अपनी निष्ठा के साथ, पत्रकारिता के फलक पर एक अमिट छाप छोड़ी।
यह वट वृक्ष आज भी उन सभी पुराने और नए साथियों को प्रेरणा देता है, जो मानते हैं कि अच्छी पत्रकारिता के लिए संसाधन नहीं बल्कि सच्चाई और साहस आवश्यक है। बाली जी की स्मृति, ‘सतपुड़ा वाणी’ के हर अंक में, हर सफल पत्रकार की कहानी में, और भोपाल की पत्रकारिता के इतिहास में, सदा-सदा के लिए स्मरित की जाती रहेगी।
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