
मध्य प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र की शुरुआत धमाकेदार रही। सत्ता पर काबिज भाजपा ने जहां सदन के भीतर जबरदस्त मोर्चाबंदी की, वहीं विपक्षी कांग्रेस ने भी सदन से लेकर सड़क तक गर्मी बनाए रखी। इस दौरान किसानों के लिए डीएपी खाद की कमी, महिलाओं, बालिकाओं का शोषण और महंगाई आदि प्रमुख मुद्दे विपक्षी खेमे में छाए रहे। लिहाजा यह कहा जा सकता है कि विधानसभा का वर्तमान सत्र काफी हंगामा खेज रहने वाला है। बस ईश्वर से प्रार्थना यही है कि विधानसभा प्रशासन द्वारा तय की गईं सभी बैठकें पूर्णता को प्राप्त हों और प्रदेश भर के विधायक एवं मंत्रीगण इस कीमती समय का भरपूर उपयोग करें। यदि प्रस्तावित विधेयकों पर सार गर्भित चर्चा हो, इसके बाद इनके बारे में आधारभूत निर्णय लिए जाएं तो फिर विधानसभा के शीतकालीन सत्र को सफल माना जाना चाहिए। यह कामना इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि विधानसभा की बैठकों को लेकर लंबे समय से अच्छा माहौल देखने को नहीं मिल रहा। देखने में यह आ रहा है कि बहस और आरोप प्रत्यारोप सदन के भीतर कम और बाहर ज्यादा दिखाई देते हैं। फल स्वरुप राजनीतिक खींचातानी शुरू होती है और विधानसभा के विभिन्न सत्रों के कार्यकाल असमय ही अवसान को प्राप्त हो जाते हैं। इस बार भी यही सब ना हो, इसके लिए सरकारी पक्ष की ओर से खासकर भाजपा विधायकों और मंत्री गणों की ओर से चाक चौबंद तैयारी की गई है। लेकिन विपक्ष का भी यह दायित्व बनता है कि वह विधानसभा सत्र के दौरान सड़क से ज्यादा सदन पर ध्यान दे। क्योंकि सड़क पर हंगामा खड़ा करने के लिए एक साल में 365 दिन उपलब्ध बने रहते हैं। लेकिन सदन के भीतर महत्वपूर्ण विधेयकों, कानूनों,व्यवस्थाओं, विकास कार्यों और अन्य सवालों जवाबों के लिए जनप्रतिनिधियों को तयशुदा समय ही मिल पाता है। इस बेहद कीमती समय पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। जाहिर है यह पैसा जनता की गाड़ी कमाई से टैक्स के रूप में वसूला गया होता है। लिहाजा यह उम्मीद की जानी चाहिए कि जनता के पैसे से आयोजित विधानसभा सत्र को पक्ष और विपक्ष का सकारात्मक सहयोग मिलेगा। खासकर विपक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वह जब तक विधानसभा सत्र चल रहा है, तब तक तो सदन की भीतरी व्यवस्थाओं पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करे। क्योंकि यही वह समय होता है जब सरकार द्वारा प्रस्तुत उसके विकास संबंधी कार्यक्रमों पर सवाल जवाब किए जा सकते हैं और उनमें मौजूद कमियों पर सरकार का ध्यान आकर्षित किया जा सकता है। ताकि उम्मीद बंधे कि जिन कमियों पर सरकार का ध्यान आकर्षित कराया गया है वह दूर हो ही जाएंगी। वरना तो पिछले कई विधानसभा सत्रों में यह देखने में आता रहा है कि पूर्वाग्रह से ग्रसित विपक्ष बेसिर पैर के मुद्दों पर सदन का बहिष्कार करके विधानसभा से बाहर निकल जाता है और सरकार एक के बाद एक विधेयक प्रस्तुत कर उन्हें बहुमत के आधार पर मंजूर करती चली जाती है। परिस्थिति वश उपरोक्त विधेयकों पर ना तो कोई चर्चा हो पाती और ना ही इनमें रह गई कमियों पर टोका-टाकी हो पाती है। फल स्वरुप त्रुटि बस अथवा तकनीकी कारणों के चलते जो कमियां इनमें शेष रह जाती हैं फिर उन्हें वापस लिया जाना मुश्किल ही हो जाता है। इसके बाद यदि विपक्ष सड़कों पर उन विधेयकों, कानून व्यवस्थाओं और विकास कार्यों को लेकर अनर्गल आरोप प्रत्यारोप करता है तो फिर इसे अनुचित ही कहा जाएगा। क्योंकि जब बहस करने का समय है तब उससे मुंह चुराने और फिर कीमती समय निकल जाने के बाद सड़कों पर आरोप प्रत्यारोप लगाना राजनीतिक दृष्टि से भी उचित नहीं कहा जा सकता। इस बार भी सरकार में बैठी भाजपा के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और उनके मंत्रिमंडल ने 6 विधेयक तो विधानसभा पटल पर प्रस्तुत कर ही दिए हैं। इनमें विधानसभा अध्यक्ष उपाध्यक्ष का वेतन भत्ता संशोधन विधेयक, विधानसभा नेता प्रतिपक्ष वेतन भत्ता संशोधन विधेयक तो आसानी से पारित हो जाएंगे, इसमें कोई संशय नहीं है। क्योंकि इनमें जिन पदाधिकारियों को लेकर वेतन भत्ते केंद्रित हैं, उनसे संबंधितों को फायदा ही होने वाला है। रह गए नगर पालिका निगम, नगर पालिका और विश्वविद्यालय विधि संशोधन विधेयक, तो इन पर बहस होना अपेक्षित है। लेकिन यह तभी संभव है जब विपक्ष कमर कसकर सदन में डटा रहे। लेकिन देखने में यह आ रहा है कि सदन के भीतर विपक्ष से ज्यादा तो सत्ता पक्ष के विधायक और पूर्व मंत्री गण अधिक मुखर दिखाई दे रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि भाजपा के मंत्रीगण हों, पूर्व मंत्री गण हों अथवा विधायक गण, यह सभी पूरी तैयारी के साथ सदन में पहुंचे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि कांग्रेस भी विपक्ष में होने का अपना दायित्व पूरी निष्ठा के साथ निभाए और अपने आचरण से यह प्रमाणित करे कि उसने भी पूरी तैयारी और अध्ययन के बाद विधानसभा के शीतकालीन सत्र में कदम रखा है। जाहिर है यह तभी प्रमाणित होगा, जब कांग्रेस सड़कों पर हाय तौबा मचाने से ज्यादा सदन में अपेक्षित बहस पर ज्यादा ध्यान दे। बढ़-चढ़कर उसमें भाग ले और तार्किक रूप से हर विधेयक एवं आने वाले विषयों पर दमदारी के साथ अपना पक्ष रखे। यदि यह संभव हो पाया तो फिर विधानसभा के शीतकालीन सत्र की पूर्णता में संशय शेष नहीं रह जाता।


