रिजर्व बैंक की बैठक बुधवार से, आपके लोन की ईएमआई बढ़ेगी या मिलेगी राहत!
एजेंसी, मुंबई। दुनिया भर के बाजारों में मची उथल-पुथल, पश्चिम एशिया के देशों में जारी गंभीर तनाव और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन की कीमतों में आ रही लगातार तेजी के बीच भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बेहद महत्वपूर्ण बैठक आगामी बुधवार यानी तीन मई से शुरू होने जा रही है। देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर सीधा असर डालने वाली इस त्रैमासिक समीक्षा बैठक के नतीजों और महत्वपूर्ण फैसलों की आधिकारिक घोषणा शुक्रवार, पांच मई को रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा द्वारा की जाएगी। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति और माल ढुलाई से जुड़ी जो बड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं, उन्हें देखते हुए देश के बड़े आर्थिक विशेषज्ञों और वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक इस बार भी अपनी मुख्य ब्याज दर यानी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा और इसे 5.25 प्रतिशत के मौजूदा स्तर पर ही बरकरार रख सकता है। इसके साथ ही विशेषज्ञों ने यह संभावना भी जताई है कि रिजर्व बैंक बाजार में नकदी के प्रवाह को नियंत्रित करने और महंगाई को काबू में रखने के लिए अपने पुराने सतर्क और कड़े रुख को आगे भी जारी रखेगा, जिससे फिलहाल आम जनता को कर्ज सस्ता होने की उम्मीद कम ही दिखाई दे रही है।
आरबीआई एमपीसी बैठक, जीडीपी और अमेरिकी नॉन-फार्म पेरोल्स डेटा तय करेंगे शेयर बाजार की चाल
आरबीआई एमपीसी बैठक (3-5 जून), भारत की FY26 जीडीपी और अमेरिकी नॉन-फार्म पेरोल्स डेटा अगले हफ्ते शेयर बाजार की दिशा तय करेंगे।https://t.co/QrxJ6HOGUV pic.twitter.com/VvAsCWmfrJ
— राष्ट्र प्रेस (@rashtra_press) May 31, 2026
आर्थिक विकास दर के अनुमानों में आ सकती है कमी
हालांकि, आर्थिक जगत के कुछ दिग्गजों का यह भी मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के दामों में हो रही अनियंत्रित बढ़ोतरी, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में दर्ज की जा रही गिरावट और वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था में आए व्यवधानों के कारण रिजर्व बैंक के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इन विपरीत परिस्थितियों की वजह से केंद्रीय बैंक आने वाले समय के लिए देश में महंगाई बढ़ने के अपने पुराने अनुमानों को और ऊपर बढ़ा सकता है। इसके साथ ही, घरेलू उत्पादन और व्यापार पर पड़ने वाले इसके असर को देखते हुए सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृद्धि दर के अनुमानों में कुछ कटौती भी की जा सकती है। इससे पहले अप्रैल के महीने में हुई समीक्षा बैठक के दौरान भी रिजर्व बैंक ने पश्चिम एशिया के संकट से भारतीय बाजार, महंगाई और आर्थिक विकास पर पड़ने वाले प्रभावों का गहराई से आकलन करने के लिए स्थिति पर नजर बनाए रखने की रणनीति अपनाई थी और रेपो रेट को बिना किसी बदलाव के स्थिर छोड़ दिया था।
आने वाले महीनों में मध्यम वर्ग को सताएगी महंगाई
देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग द्वारा जारी की गई एक ताजा शोध रिपोर्ट में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि वर्तमान वैश्विक अस्थिरता को देखते हुए आगामी जून की मौद्रिक नीति में भी ब्याज दरों में किसी भी तरह की कटौती की उम्मीद बेहद कम है और रेपो रेट स्थिर ही रहेगा। इस आर्थिक रिपोर्ट के विस्तृत विश्लेषण के अनुसार, देश में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा महंगाई दर आने वाली अगली तीन तिमाहियों के दौरान 5 प्रतिशत के आंकड़े से ऊपर बनी रह सकती है, जबकि वर्तमान तिमाही के दौरान इसके 4 से 4.1 प्रतिशत के दायरे में रहने की संभावना जताई गई है। इसके अलावा, रिपोर्ट में पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में वास्तविक जीडीपी विकास दर 7.2 प्रतिशत रहने और पूरे वित्त वर्ष के दौरान कुल आर्थिक विकास दर 7.5 प्रतिशत के स्तर पर रहने का एक मजबूत अनुमान भी प्रस्तुत किया गया है।
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने भी जताया स्थिर नीति का अनुमान
रिजर्व बैंक ने हाल ही में जारी की गई अपनी वार्षिक रिपोर्ट में इस बात के साफ संकेत दिए थे कि वह चालू वित्त वर्ष के दौरान देश की विकास दर और मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान लगाने वाली अपनी पुरानी प्रणालियों की नए सिरे से समीक्षा करेगा और उनमें आवश्यक सुधार की प्रक्रिया शुरू करेगा। देश की जानी-मानी रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की मुख्य अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे ने भी आगामी नीति को लेकर अपनी महत्वपूर्ण राय साझा की है। उनका मानना है कि रिजर्व बैंक इस बार ब्याज दरों को स्थिर रखने के साथ-साथ अपनी नीतिगत सोच को पूरी तरह तटस्थ बनाए रखेगा। उन्होंने बाजार की स्थिति का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि इस समय देश में महंगाई का जो भी दबाव दिखाई दे रहा है, वह मुख्य रूप से आपूर्ति व्यवस्था में आ रही दिक्कतों से जुड़ा हुआ है। इसमें विदेशों से आने वाले महंगे ईंधन की लागत, उद्योगों के लिए कच्चे माल की बढ़ी हुई कीमतें और डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ता रुपया सबसे प्रमुख कारक हैं, जिन्हें केवल ब्याज दरें बढ़ाकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
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