मुख्यमंत्री का बच्चों से संवाद, शिक्षा के क्षेत्र में आत्मविश्वास का सूर्योदय : शिक्षा केवल किताबों के पन्नों को पलटने या परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं को भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तित्व के निर्माण और आत्मविश्वास के प्रकटीकरण की एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसी भाव को आत्मसात करते हुए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का ‘परीक्षा पर संवाद’ कार्यक्रम मात्र एक सरकारी आयोजन न रहकर, भावी पीढ़ी के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव का जीवंत उदाहरण बन गया। शिवाजी नगर स्थित सुभाष एक्सीलेंस स्कूल में जब प्रदेश के मुखिया ने विद्यार्थियों के बीच बैठकर उनके मन की शंकाओं को सुना, तो वहां का वातावरण किसी राजनीतिक मंच जैसा नहीं, बल्कि एक परिवार के मुखिया और उसके बच्चों के बीच होने वाली आत्मीय चर्चा जैसा प्रतीत हुआ। यह संवाद इस बात का प्रमाण है कि नेतृत्व जब संवेदनशील होता है, तो वह केवल नीतियां ही नहीं बनाता, बल्कि उन लोगों के सपनों को भी संवारता है जिनकी कंधों पर भविष्य की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री ने जिस अंदाज में विद्यार्थियों से बातचीत की, वह यह दर्शाता है कि वे केवल प्रदेश के प्रशासनिक प्रमुख ही नहीं, बल्कि उन हजारों विद्यार्थियों के लिए एक गार्जियन और मार्गदर्शक की भूमिका भी निभा रहे हैं जो अपने घरों से दूर हॉस्टलों में रहकर संघर्ष कर रहे हैं। परीक्षा के दौर में विद्यार्थियों के भीतर उठने वाला भय स्वाभाविक है, लेकिन डॉ. यादव ने इस भय को आत्मविश्वास और अनुशासन की पहचान बताकर एक नई दृष्टि प्रदान की। उन्होंने स्पष्ट किया कि परीक्षा जीवन की अंतिम कसौटी नहीं है, बल्कि यह स्वयं को पहचानने और अनुशासित जीवन जीने की एक पद्धति है। अक्सर देखा जाता है कि परीक्षा के नाम से ही विद्यार्थियों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं, परंतु मुख्यमंत्री ने उन्हें तनावमुक्त होकर मेहनत करने की जो सलाह दी, वह उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए किसी रामबाण से कम नहीं है।
मुख्यमंत्री का यह कहना कि वे अपना वादा निभाने आए हैं, उनके व्यक्तित्व की प्रामाणिकता को दर्शाता है। व्यस्तताओं के बावजूद विद्यार्थियों के बीच पहुंचना यह संदेश देता है कि राज्य सरकार के लिए शिक्षा और युवा शक्ति की प्राथमिकता सर्वोपरि है। उन्होंने विद्यार्थियों को लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने और कड़ी मेहनत के साथ-साथ खुद पर भरोसा रखने का जो मंत्र दिया, वह किसी भी क्षेत्र में सफलता की पहली शर्त है। परीक्षा के दौरान एकाग्रता का महत्व समझाते हुए उन्होंने चिंतन-मनन को पढ़ाई का हिस्सा बनाने की बात कही, जो आधुनिक शिक्षा पद्धति में अक्सर ओझल हो जाती है। रटने की प्रवृत्ति के बजाय विषयों को समझने और उन पर गहराई से विचार करने का आह्वान विद्यार्थियों को मानसिक रूप से अधिक सशक्त बनाता है। डॉ. यादव ने बहुत ही सहजता से यह संदेश दिया कि यदि पहली बार में सफलता नहीं मिलती, तो उसे हार मानने के बजाय और अधिक ऊर्जा के साथ प्रयास करने का अवसर समझना चाहिए। सफलता की राह में आने वाली बाधाएं हमें कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि हमारे संकल्प को और मजबूत करने के लिए आती हैं। निरंतरता ही वह कुंजी है जो किसी भी बंद दरवाजे को खोल सकती है। संवाद के दौरान जब विद्यार्थियों ने डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और राजनेता बनने के अपने सपने साझा किए, तो मुख्यमंत्री ने उन्हें स्पष्ट लक्ष्य रखने और उसे हासिल करने के लिए निरंतर श्रम करने के लिए प्रेरित किया। यह प्रेरणा केवल शाब्दिक नहीं थी, बल्कि इसमें उस अनुभव की मिठास थी जो स्वयं मुख्यमंत्री ने अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों से अर्जित की है।
इस कार्यक्रम में केवल मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने भी परीक्षा को एक उत्सव के रूप में देखने का आह्वान किया। यह विचार कि परीक्षा कोई बोझ नहीं बल्कि एक अवसर है, विद्यार्थियों के मन से भय को समाप्त करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। जब हम किसी कार्य को उत्सव की तरह मनाते हैं, तो उसमें आनंद का समावेश हो जाता है और जहां आनंद होता है, वहां तनाव के लिए कोई स्थान नहीं रहता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए ‘परीक्षा पर चर्चा’ अभियान की प्रासंगिकता को मध्य प्रदेश के संदर्भ में और विस्तार देते हुए मुख्यमंत्री ने उनकी कार्यशैली और अनुशासन से सीखने की बात कही। प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता और देश को प्रगति पथ पर ले जाने का उनका संकल्प आज के युवाओं के लिए एक आदर्श है। मुख्यमंत्री ने युवाओं को यह अहसास कराया कि वे देश के निर्माण की महत्वपूर्ण इकाई हैं। जब एक विद्यार्थी अनुशासित होकर अपनी पढ़ाई करता है, तो वह केवल अपना भविष्य ही नहीं बनाता, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी योगदान देता है। स्कूल शिक्षा विभाग का यह प्रयास सराहनीय है कि उसने विद्यार्थियों की शंकाओं के समाधान के लिए ऐसा मंच तैयार किया जहां वे निडर होकर अपनी बात रख सकें। सचिव डॉ. संजय गोयल और आयुक्त शिल्पा गुप्ता सहित अन्य अधिकारियों की उपस्थिति यह बताती है कि पूरा प्रशासनिक तंत्र विद्यार्थियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
मुख्यमंत्री के इस संवाद का सबसे सकारात्मक पक्ष यह रहा कि उन्होंने सफलता और विफलता के सामाजिक मानदंडों को चुनौती दी। उन्होंने विद्यार्थियों को यह समझाया कि परीक्षा केवल मूल्यांकन का एक माध्यम है, यह आपके संपूर्ण व्यक्तित्व या आपकी योग्यता का अंतिम प्रमाण पत्र नहीं है। सकारात्मक सोच और सही समय प्रबंधन वह औजार हैं जिनका उपयोग करके किसी भी कठिन परीक्षा को पार किया जा सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपील की कि वे अपने भीतर के डर को आत्मविश्वास में बदलें और परीक्षा हॉल में एक विजेता की मानसिकता के साथ प्रवेश करें। यह संवाद सत्र इस बात की पुष्टि करता है कि राज्य सरकार युवाओं के समग्र विकास के प्रति प्रतिबद्ध है। शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहे, बल्कि वह जीवन जीने की कला सिखाए, यही इस संवाद का मूल उद्देश्य नजर आया। भोपाल के एक्सीलेंस स्कूल से उठी यह विश्वास की लहर निश्चित रूप से पूरे प्रदेश के विद्यार्थियों तक पहुंचेगी और उन्हें आने वाली बोर्ड परीक्षाओं के लिए एक नई ऊर्जा प्रदान करेगी। जब प्रदेश का मुख्यमंत्री स्वयं विद्यार्थियों का गार्जियन बनकर उनके साथ खड़ा हो, तो विद्यार्थियों का आत्मविश्वास दोगुना होना स्वाभाविक है। डॉ. मोहन यादव ने जिस तरह से विद्यार्थियों की शंकाओं को सुना और उनके उत्तर दिए, उससे यह स्पष्ट है कि वे युवाओं की नब्ज पहचानते हैं।
अंतिम रूप से, यह ‘परीक्षा पर संवाद’ केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सतत प्रेरणा का स्रोत है। यह समाज को भी संदेश देता है कि हमें अपने बच्चों पर अंकों का दबाव बनाने के बजाय उन्हें सीखने और विकसित होने का माहौल देना चाहिए। अभिभावकों को भी मुख्यमंत्री की इस पहल से सीखना चाहिए कि बच्चों को परीक्षा के दौरान मानसिक संबल की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। डॉ. मोहन यादव द्वारा दी गई शुभकामनाएं केवल औपचारिक शब्द नहीं थे, बल्कि उनमें प्रदेश के हर विद्यार्थी के प्रति एक पितातुल्य स्नेह और विश्वास झलकता था। अनुशासन, कड़ी मेहनत और अटूट आत्मविश्वास के साथ जब मध्य प्रदेश के विद्यार्थी परीक्षा के मैदान में उतरेंगे, तो सफलता निश्चित रूप से उनके कदम चूमेगी। यह संवाद प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय जोड़ता है, जहां संवाद और सहानुभूति को प्रशासनिक कार्यों का अभिन्न हिस्सा बनाया गया है। आने वाले समय में, यह सकारात्मक दृष्टिकोण न केवल परीक्षा परिणामों में सुधार लाएगा, बल्कि एक ऐसे सशक्त और जागरूक युवा वर्ग का निर्माण करेगा जो मध्य प्रदेश और भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में सक्षम होगा। परीक्षा को डर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की पहचान मानकर आगे बढ़ने का यह मंत्र अब हर विद्यार्थी के जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत बनेगा।
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