
दो राज्यों के विधानसभा चुनाव और अनेक संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्र के उपचुनावों के दौरान कुछ राजनीतिक दृश्य इस तरह के सामने आए, जिन्हें देखकर यह धारणा और मजबूत हुई कि देश के नेताओं ने अपने अति विशिष्ट होने के अहम् को समय रहते नहीं त्यागा तो इसके परिणाम भारतीय लोकतंत्र के हित में तो बिल्कुल नहीं होंगे। उदाहरण के लिए कुछ घटनाओं का जिक्र करना उचित रहेगा। पहली घटना- विपक्ष की ओर से यह आपत्ति दर्ज कराई गई कि चुनाव आयोग केवल उनके वायुयानों और वाहनों की तलाशी क्यों ले रहा है? और फिर जब किसी विरोधी दल के नेता का वायुयान तकनीकी खराबी के चलते कुछ समय के लिए रोक देना पड़ गया, तो इसमें राजनीतिक षड्यंत्र होने की आशंकाएं तलाशी गईं ।सवाल उठता है कि इन दोनों ही तरह की परिस्थितियों में विपक्षी ही नहीं, किसी भी नेता अथवा दल को आपत्ति दर्ज करने की आवश्यकता ही क्यों है? चुनावी अभियान के दौरान कुछ विपक्षी नेताओं के वाहन और वायुयान तलाशी की प्रक्रिया से गुजरे तो इन नेताओं द्वारा तलाशी लेने वालों को अपने आभामंडल से दुष्प्रभावित करने के हर संभव प्रयास किए गए। राष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश भेजने की कोशिश हुई कि चुनाव आयोग केवल विपक्षी नेताओं के वाहनों और वायुयानों की ही तलाशी क्यों ले रहा है? जांच एजेंसियां केवल विपक्षी नेताओं की खाना तलाशी क्यों ले रही हैं? जाहिर है यह सब चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों को बदनाम करने की दृष्टि से किया जाता है। लेकिन जब अगले ही दिन से मीडिया में इस आशय के समाचार और चित्र सामने आने लगे कि सत्ता पक्ष के फलां मंत्री की गाड़ी चेक की गई। सत्ता पर काबिज विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल भाजपा के राष्ट्रीय पदाधिकारियों के वायुयान चेक किए गए, तो फिर विपक्षी नेताओं के मुंह में दही जमकर रह गया। इसलिए नहीं कि अब सत्ता पक्ष के मंत्रियों और सत्ता पर काबिज विश्व की सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेताओं की भी जांच पड़ताल होने लगी थी। बल्कि इसलिए, क्योंकि पहले मीडिया अपनी दृष्टिकोण से समाचार प्रकाशित कर रहा था कि उसे किस खबर को कहा स्थान देना है और किसे नहीं। लेकिन जब चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल उठे तो फिर मीडिया ने अपने व्यापक दृष्टिकोण का इस्तेमाल शुरू किया और पक्ष विपक्ष दोनों ही तरफ के नेताओं के वाहनों, उनके वायुयानों की तलाशी के चित्र एवं समाचार सामने आने लगे। यानि तलाशी तो पहले से ही सत्ता एवं विपक्ष, दोनों तरफ के नेताओं की हो रही थी। लेकिन सामने उतना ही आ रहा था जितने में समाचार पत्रों के पाठकों और विभिन्न समाचार चैनलों के दर्शकों की रुचि दिखाई दे रही थी। किंतु जब विपक्ष की ओर से अनावश्यक आपत्तियां और पक्षपात पूर्ण कार्रवाई के आरोप उछाले जाने लगे तो पल भर में यह स्पष्ट हो गया कि चुनाव आयोग हो या फिर जांच एजेंसियां, सब के सब अपना काम निष्पक्षता के साथ कर रहे हैं। विपक्षी की ओर से इसी प्रकार का नकारात्मक माहौल उस वक्त बनाने का प्रयास हुआ जब एक विपक्षी नेता का वायुयान तकनीकी कारणों से कुछ देर के लिए रोकना पड़ गया। तत्काल चीख पुकार मच गई कि यह सब राजनीतिक षड्यंत्र के तहत किया गया है। विपक्ष को प्रचार अभियान से रोका जा रहा है। जबकि चिल्ल-पों मचाने वालों को यह दिखा ही नहीं कि जब उक्त विपक्षी नेता का वायुयान कुछ देर के लिए बाधित रहा, तभी देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी पूरे 3 घंटे तक अपने वायुयान के उड़ने की प्रतीक्षा कर रहे थे। क्योंकि उनके विमान को भी तकनीकी कारणों के चलते रोककर रखा गया था। अब बात करते हैं कि जब स्वयं को विशिष्ट और अति विशिष्ट होने का मुगालता पाले हुए इन नेताओं को जांच जैसी सामान्य औपचारिकताओं का, तकनीकी अथवा सुरक्षात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है तो इनके अहम् को ठेस क्यों पहुंचती है? इन्हें उस वक्त क्यों बुरा लगता है जब कोई जांच एजेंसी सबके साथ उनकी भी तलाशी लेने लगती है? सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस मतदाता अर्थात भारतीय नागरिक को लोकतंत्र का भगवान कहा गया है, उसकी जहां देखो वहीं तलाशी होती रहती है। यहां तक कि छोटे-मोटे शॉपिंग सेंटरों और सिनेमा के थिएटरों में भी सुरक्षा की दृष्टि से इन्हें जांचा परखा जाता है। लेकिन जो नेता और जनप्रतिनिधि खुद को इस लोकतंत्र के भगवान का सेवक कहते हैं, और यह सेवक हैं भी। तो फिर इन्हें अपनी जांच पड़ताल को लेकर इतना असहज क्यों होना चाहिए? यह कहां की ईमानदारी है कि स्वामी जब चले तो उसकी पग पग पर जांच हो और जब स्वामी का सेवक जांच के दायरे में आ भर जाए तो उसका अहम आहत होने लगे। सवाल उठाए जाने लगते हैं कि मेरी जांच क्यों हो गई? जांच एजेंसियों की इस बारे में सोचने की हिम्मत हुई तो हुई कैसे? राजनेताओं के इसी लक्षण को स्वयं को अति विशिष्ट मान लिए जाने के रूप में पहचाना गया है। स्पष्ट तौर पर कहा जाए तो यह एक बड़ी बीमारी है जो भारतीय लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रही है। इसी घातक बीमारी को जड़ से समाप्त करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सरकार संभालते ही लाल बत्ती कल्चर को समाप्त कर किया। स्वयंभू अति विशिष्ट जनों के वाहनों से हूटर उतार दिए गए। ताकि जन सेवकों अर्थात जनप्रतिनिधियों के मन में लगातार बढ़ रहे अति विशिष्ट जन होने के अहम् को खत्म किया जा सके। किंतु अभी भी सामने आ रहे नेताओं के दंभपूर्ण कृत्यों से स्पष्ट हो रहा है कि बीमारी के समूल नाश के लिए और कड़े कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। इसे यूं समझते हैं- बीते दिनों तकनीकी और सुरक्षा कारणों के चलते देश के प्रधानमंत्री और एक विपक्षी नेता, दोनों के विमानों रोकना पड़ गया। इन घटनाओं को लेकर सत्ता पक्ष की ओर से भले ही किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं आई, लेकिन विपक्ष ने अपने नेता का विमान रोके जाने पर जमीन आसमान हिला दिया। आरोप लगाए गए कि विपक्ष को चुनाव प्रचार से रोकने के लिए ऐसा किया गया है। जबकि उक्त नेता की अपेक्षा प्रधानमंत्री के विमान को और अधिक समय के लिए रोका गया था। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है- यदि इस प्रकार की एहतियात कांग्रेसी सत्ता के रहते उनके दल से संबंधित स्वयंभू अति विशिष्ट जन को लेकर बरती गई होती तो ऐसा करने वाले अधिकारियों की किस हद तक दुर्गति बना दी गई होती। वैसे भी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा पारित एक अध्यादेश की प्रतिलिपि को उन्हीं की पार्टी के नेता राहुल गांधी द्वारा सार्वजनिक रूप से फाड़े जाने की घटना अनुभव में बनी हुई है। लिखने का आशय यह कि आम आदमी की अपेक्षा जनप्रतिनिधियों में एवं उनसे भी अधिक स्वयंभू नेताओं के मन में स्वयं के अति विशिष्ट होने का अहम् गहरे तक बैठा हुआ है। इसे जड़ से उखाड़ फेंकना आवश्यक है। क्योंकि यह लक्षण भारतीय लोकतंत्र के हित में तो कतई नहीं है।


