एजेंसी, भोपाल। प्रांतीय राजधानी : मध्यप्रदेश की प्रशासनिक राजधानी में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण चौराहे के निकट वर्षों पुरानी रिहायशी बसावट को ध्वस्त किए जाने की प्रशासनिक मुहिम ने साप्ताहिक अवकाश के प्रथम दिन अर्थात शनिवार को एक बहुत बड़े राजनैतिक और सामाजिक संग्राम का रूप धारण कर लिया। जनपद प्रशासन और नगर निगम के संयुक्त अमले द्वारा शुक्रवार की निशा से ही संपूर्ण प्रभावित क्षेत्र को चारों ओर से घेरकर सुरक्षा घेरा तैयार कर दिया गया था और शनिवार की भोर होते ही लोहे के अवरोधक लगाकर सामान्य जनमानस तथा वाहनों का आवागमन पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रातः लगभग सात बजे प्रारंभ की गई इस बेदखली और ध्वस्तीकरण की दंडात्मक कार्रवाई को दोपहर तीन बजे तक निरंतर अंजाम दिया गया। इस पूरी समयावधि के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी अप्रिय स्थिति का सामना करने के लिए अत्यंत भारी संख्या में सशस्त्र पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारियों की टुकड़ियां घटना स्थल पर मुस्तैद रहीं। इसके साथ ही, प्राधिकारी वर्ग द्वारा सूचना तंत्र को नियंत्रित करने के उद्देश्य से समाचार संकलन करने वाले पत्रकारों के भी घटना स्थल पर जाने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी। इस पूरी निषेधात्मक कार्रवाई के मध्य उस समय विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गईं, जब विस्थापन से क्षुब्ध एक स्थानीय युवा ने विरोध प्रदर्शित करने के लिए चौराहे पर स्थित एक ऊंचे टावर पर छलांग लगा दी और शीर्ष पर जाकर बैठ गया। युवक के इस अप्रत्याशित कदम से संपूर्ण क्षेत्र में भारी अफरा-तफरी का माहौल बन गया और वहां उपस्थित जनसमुदाय में हाहाकार मच गया। प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों ने अत्यंत सूझबूझ और कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद उस विक्षुब्ध युवक को समझा-बुझाकर सकुशल नीचे उतारा, जिसके पश्चात ही प्रशासन ने राहत की सांस ली। इस अकेली घटना ने संपूर्ण विवाद को और अधिक संवेदनशील तथा उग्र बना दिया।
हमारा सौभाग्य है कि वाराणसी स्थित बाबा विश्वनाथ जी के धाम में सम्राट विक्रमादित्य काल की वैदिक घड़ी स्थापित हुई है। यह वैदिक घड़ी सनातन संस्कृति में विद्यमान चेतना, ज्ञान और वैज्ञानिकता की प्रतीक है।
अयोध्या में श्री राम मंदिर से लेकर शेष सभी ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसरों में भी… pic.twitter.com/HGsBm0Mpy1
— Dr Mohan Yadav (@DrMohanYadav51) April 30, 2026
जनप्रतितिधियों का तीखा विरोध और पुलिस के साथ हिंसक झड़प
प्रशासनिक बेदखली की भनक लगते ही मुख्य विपक्षी दल के अनेक शीर्ष और वरिष्ठ राजनेता अपने सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ घटना स्थल पर पहुंच गए और शासकीय कार्रवाई को पूरी तरह से जनविरोधी बताते हुए मुख्य मार्ग पर ही धरने पर बैठ गए। विरोध प्रदर्शन की कमान संभाल रहे प्रांतीय दल के अध्यक्ष जीतू पटवारी, पूर्व कैबिनेट मंत्री पीसी शर्मा, स्थानीय नगर सरकार में विपक्ष की मुख्य नेता शबिस्ता जकी तथा आसिफ जकी सहित अनेक जनप्रतितिधियों ने शासन और प्रशासन के विरुद्ध अत्यंत उग्र नारेबाजी प्रारंभ कर दी। प्रदर्शनकारी राजनेताओं का मुख्य रूप से यह आरोप था कि यह पूरी दंडात्मक कार्रवाई निर्धन और जनजातीय परिवारों के मौलिक अधिकारों का क्रूर हनन है और बिना किसी सुदृढ़ तथा सर्वमान्य पुनर्वास नीति के इन नागरिकों को कड़कड़ाती धूप में बेघर करना सर्वथा अन्यायपूर्ण और अमानवीय कृत्य है। मार्ग पर चल रहे इस धरने के कारण कुछ ही समय में वहां आम नागरिकों की विशाल भीड़ एकत्रित हो गई, जिससे कानून व्यवस्था की स्थिति अत्यंत नियंत्रण से बाहर होने लगी। कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने प्रारंभ में प्रदर्शनकारियों को समझाने और मार्ग खाली करने का आग्रह किया, परंतु जब हंगामा और उत्तेजना लगातार बढ़ती गई, तो पुलिस बल ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल प्रयोग अर्थात लाठीचार्ज कर दिया। इस दमनकारी कार्रवाई के पश्चात भी जब कुछ प्रमुख नेता अपने स्थान से हटने को तैयार नहीं हुए, तो पुलिस प्रशासन ने शबिस्ता जकी तथा आसिफ जकी सहित कई सक्रिय कार्यकर्ताओं को बलपूर्वक अपनी अभिरक्षा में ले लिया, जिन्हें स्थिति सामान्य होने के उपरांत संध्या समय मुक्त किया गया।
बंद आवासों की सुरक्षा और अमूल्य संपत्तियों की क्षति का गंभीर प्रश्न
इस संपूर्ण उग्र घटनाक्रम और शासकीय तोड़फोड़ के मध्य विस्थापित किए जा रहे परिवारों की निजी संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर भी अत्यंत गंभीर विधिक सवाल खड़े किए गए। विपक्षी दल की वरिष्ठ नेत्री शबिस्ता जकी ने मुख्य पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट को एक अत्यंत कड़ा पत्र प्रेषित कर आधिकारिक रूप से सचेत किया कि जिन पीड़ित परिवारों के पुरुष सदस्य आजीविका के लिए बाहर गए हुए हैं और जिनके घरों में ताले लटके हुए हैं, उन बंद मकानों के भीतर नागरिकों की जीवन भर की गाढ़ी कमाई, बहुमूल्य घरेलू सामग्रियां, नकद धनराशि और स्वर्ण आभूषण रखे हुए हैं। उन्होंने अपने पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी कि इन बंद मकानों को बिना गृहस्वामियों की उपस्थिति के ढहाए जाने की स्थिति में वहां रखी प्रत्येक वस्तु की सुरक्षा की संपूर्ण और सीधी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी। यदि इस प्रक्रिया के दौरान किसी भी प्रकार की चोरी, डकैती अथवा व्यक्तिगत संपत्ति की क्षति होती है, तो उत्तरदायी प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध सुसंगत धाराओं के अंतर्गत वैधानिक और आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।
सात पीढ़ियों के आशियाने पर चला शासकीय बुलडोजर, विधिक खसरा नंबर का विवाद
वास्तव में, इस चिन्हित भवन के पिछले हिस्से में स्थापित इस प्राचीन वस्ती के भीतर लगभग सत्ताईस परिवार पिछले सत्तर से अधिक वर्षों से निरंतर निवास करते आ रहे हैं, जिनमें वर्तमान में दो सौ से अधिक स्त्री, पुरुष और बच्चे शामिल हैं। इसके विपरीत, जिला प्रशासन के भू-अभिलेख विभाग का यह तर्क है कि यह संपूर्ण कार्रवाई शासकीय खसरा क्रमांक 1413/1 की भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के विधिक आदेश के तहत संपादित की गई है, जिसके अंतर्गत लगभग 5613 वर्ग फीट के भूखंड पर अनधिकृत कब्जे की बात कही गई है। इस अत्यंत संवेदनशील और विशाल अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई को संपन्न कराने के लिए अपर जिला दंडाधिकारी सुमित कुमार पांडेय के मुख्य नेतृत्व में चार उप-खंडीय दंडाधिकारियों सहित कुल पंचानवे वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों के विशेष कार्यदल का गठन किया गया था। प्रशासनिक अमले ने न्यायालयी दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया है कि बेघर हुए इन परिवारों को समाज की मुख्य धारा में बनाए रखने के लिए भौंरी, कलखेड़ा और मालीखेड़ी जैसे क्षेत्रों में सर्वसुविधायुक्त पक्के आवास आवंटित किए जा रहे हैं। शासकीय आंकड़ों के अनुसार, प्रत्येक प्रभावित परिवार के लिए लगभग दो लाख रुपये की वित्तीय लागत से नए आवासों का निर्माण कराया गया है, जिसकी संपूर्ण धनराशि संबंधित भवन प्रबंधन द्वारा शासकीय कोष में जमा कराई जा चुकी है।
संस्थागत आधिपत्य का दावा बनाम जनभावनाओं का प्राचीन संघर्ष
इस संपूर्ण भूमि विवाद पर अपना पक्ष रखते हुए संबंधित भवन के प्रबंधन तंत्र का कहना है कि यह संपूर्ण विवादित भूमि विधिक रूप से उनकी संस्था के स्वामित्व के अधीन आती है और इस पर पिछले कई दशकों से कुछ लोगों द्वारा अनाधिकृत रूप से कब्जा जमाया गया था, जिसे संस्था के विकास कार्यों के लिए रिक्त कराया जाना अत्यंत अनिवार्य हो चुका था। इसके सर्वथा विपरीत, विस्थापित किए गए वस्तीवासियों का यह अत्यंत करुण आरोप है कि उन्हें बिना उनकी पूर्व सहमति, लिखित सूचना और बिना किसी पर्याप्त एवं सम्मानजनक वैकल्पिक व्यवस्था के केवल लाठी के बल पर जबरन बेघर कर दिया गया है। पीड़ितों का कहना है कि उनकी तीन पीढ़ियां इसी माटी में पली-बढ़ी हैं और यह स्थान उनका एकमात्र स्थायी ठिकाना बन चुका था। उल्लेखनीय है कि पूर्व के वर्षों में भी इस भूमि को खाली कराने के प्रशासनिक प्रयासों के विरुद्ध स्थानीय स्तर पर अत्यंत उग्र जन-आंदोलन हो चुके हैं और एक अवसर पर देश के उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश जारी किए जाने के कारण यह शासकीय कार्रवाई टल गई थी। बहरहाल, वर्तमान समय में इस पूरे मानवीय मुद्दे ने एक अत्यंत उग्र राजनैतिक रूप धारण कर लिया है, जहां एक ओर विपक्षी दल इसे गरीबों और आदिवासियों के दमन की संज्ञा दे रहा है, वहीं दूसरी ओर शासन इसे कानून के राज की स्थापना और शासकीय भूमि को मुक्त कराने की एक अनिवार्य वैधानिक प्रक्रिया मान रहा है।
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