संदेश देगी मोहन सरकार

अब मंत्रालय के साथ मैदान से भी सुशासन का संदेश देगी मोहन सरकार

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अब मंत्रालय के साथ मैदान से भी सुशासन का संदेश देगी मोहन सरकार : लोकतंत्र की असली सार्थकता तब सिद्ध होती है जब सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति स्वयं को जनता का सेवक मानकर उनके द्वार तक पहुँचने का साहस और संकल्प दिखाए। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अशोकनगर जिले के मढ़ी महिदपुर गांव में जिस प्रकार बिना किसी पूर्व सूचना और तामझाम के औचक रूप से पहुँचकर जनसुनवाई में हिस्सा लिया, वह भारतीय प्रशासनिक ढांचे में सुशासन की एक नई और प्रेरक इबारत लिखता है। अक्सर देखा जाता है कि वीवीआईपी दौरों के नाम पर प्रशासन हफ्तों पहले से तैयारियों में जुट जाता है, सड़कों की धूल साफ की जाती है और चकाचौंध के बीच जनता की असली आवाज कहीं दबकर रह जाती है। परंतु, डॉ. यादव ने प्रोटोकॉल की इन दीवारों को तोड़कर सीधे ग्रामीणों की चौपाल पर बैठकर यह संदेश दिया कि जनहित की चिंता किसी औपचारिक कार्यक्रम या कागजी फाइलों की मोहताज नहीं होनी चाहिए। एक मुख्यमंत्री का सामान्य नागरिक की तरह जमीन पर बैठकर लोगों की समस्याओं को सुनना न केवल उनके व्यक्तित्व की सादगी को दर्शाता है, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की भावना को भी पुख्ता करता है जहाँ सत्ता का केंद्र मंत्रालय नहीं, बल्कि वह अंतिम गाँव है जहाँ सरकार की योजनाओं का पहुँचना अनिवार्य है।
​मुख्यमंत्री का यह कदम प्रशासनिक संवेदनशीलता का एक जीवंत उदाहरण है, क्योंकि जब राज्य का मुखिया खुद जमीन पर उतरता है, तो तंत्र की सुस्ती स्वतः ही सक्रियता में बदल जाती है। मढ़ी महिदपुर की उस चौपाल पर जब मुख्यमंत्री ने सीधे सवाल किए कि क्या राशन समय पर मिल रहा है या प्रशासन का कोई कर्मचारी परेशान तो नहीं कर रहा, तो यह केवल संवाद नहीं था, बल्कि व्यवस्था की शुद्धि का एक अनुष्ठान था। सुशासन की असली परिभाषा यही है कि जनता को अपने अधिकारों के लिए दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें, बल्कि सरकार खुद चलकर उनके पास आए। डॉ. मोहन यादव की यह कार्यशैली यह स्पष्ट करती है कि वे ‘मंत्रालय से शासन’ के बजाय ‘मैदान से सुशासन’ में विश्वास रखते हैं। जब उन्होंने अधिकारियों को मौके पर ही समस्याओं के निराकरण के निर्देश दिए, तो वह उन हजारों फाइलों के लिए एक चेतावनी थी जो लालफीताशाही के कारण धूल फांक रही होती हैं। त्वरित न्याय और मौके पर समाधान की यह पद्धति जनता के मन में सरकार के प्रति उस विश्वास को पुनर्जीवित करती है जो अक्सर नौकरशाही की जटिलताओं के कारण कम होने लगता है।
​डॉ. मोहन यादव की इस घोषणा ने कि वे अब पूरे प्रदेश में इसी तरह के औचक निरीक्षण करेंगे, प्रशासनिक हलकों में एक सकारात्मक दबाव और जवाबदेही की संस्कृति को जन्म दिया है। यह पहल केवल एक प्रतीकात्मक दौरा नहीं है, बल्कि यह भ्रष्टाचार और लापरवाही पर अंकुश लगाने का एक सशक्त हथियार है। जब अधिकारियों को यह ज्ञात होगा कि मुख्यमंत्री कभी भी, कहीं भी जमीनी हकीकत परखने पहुँच सकते हैं, तो योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और गति आना स्वाभाविक है। कागजी दावों और धरातल की सच्चाई के बीच जो खाई अक्सर बनी रहती है, उसे पाटने का इससे बेहतर तरीका और कोई नहीं हो सकता। ग्रामीण मध्य प्रदेश, जो विकास की मुख्यधारा में शामिल होने की बाट जोह रहा है, उसके लिए मुख्यमंत्री का यह व्यवहार एक नई सुबह की किरण के समान है। यह कदम न केवल जन-कल्याणकारी योजनाओं की स्थिति को सुधारेगा, बल्कि यह अधिकारियों को यह भी याद दिलाएगा कि वे जनता के स्वामी नहीं, अपितु सेवक हैं।
​इस औचक जनसुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘सीधा जुड़ाव’ है। आज के समय में जब राजनीति अक्सर विज्ञापनों और सोशल मीडिया के दौर से गुजर रही है, तब डॉ. यादव ने व्यक्तिगत उपस्थिति के पुराने और सबसे प्रभावी माध्यम को चुना है। जनता से सीधे आँखें मिलाकर बात करना और उनकी आँखों की नमी व चेहरों की उम्मीदों को महसूस करना ही एक राजनेता को जननायक बनाता है। मढ़ी महिदपुर की घटना ने यह सिद्ध कर दिया है कि मुख्यमंत्री केवल योजनाओं की घोषणा करने में विश्वास नहीं रखते, बल्कि वे यह सुनिश्चित करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं कि उन योजनाओं का स्वाद उस गरीब और वंचित व्यक्ति को मिले जिसे इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। बिना किसी सुरक्षा घेरे और औपचारिक सूचना के ग्रामीणों के बीच बैठकर विकास कार्यों की समीक्षा करना यह दर्शाता है कि सत्ता का असली उद्देश्य लोक-संग्रह और लोक-कल्याण ही है। यह शैली न केवल मध्य प्रदेश के लिए बल्कि देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक रोल मॉडल बन सकती है, जहाँ प्रशासनिक तंत्र को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाने की चुनौती हमेशा बनी रहती है।
​अंततः, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का यह साहसिक और संवेदनशील प्रयास मध्य प्रदेश की विकास यात्रा में एक क्रांतिकारी मोड़ है। यह सरकार और जनता के बीच की उस दूरी को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है जिसे सालों की प्रशासनिक औपचारिकता ने गहरा कर दिया था। लोकतंत्र में जब जनता यह देखती है कि उसका मुखिया उनके दुःख-दर्द बांटने के लिए उनके घर के पास की चौपाल पर बैठा है, तो राज्य के प्रति उसकी अपनत्व की भावना और अधिक प्रगाढ़ होती है। यह पारदर्शी प्रशासन, त्वरित न्याय और जमीनी जवाबदेही की वह त्रिवेणी है, जो आने वाले समय में मध्य प्रदेश को सुशासन के शिखर पर स्थापित करेगी। मुख्यमंत्री का यह ‘लोक-कनेक्ट’ न केवल वर्तमान की समस्याओं का समाधान है, बल्कि यह भविष्य के समृद्ध और सशक्त मध्य प्रदेश की नींव भी है, जहाँ हर नागरिक खुद को सरकार का हिस्सा महसूस कर सके। यह वाकई में एक ऐसी कार्यप्रणाली है जो कागजी राजनीति से ऊपर उठकर मानवीय संवेदनाओं और वास्तविक सेवा को केंद्र में रखती है।

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