स्वागत वंदन अभिनंदन पंच दिवस हल्दी अरु चंदन

Blog

दीपोत्सव, दीपावली, दिवाली, ऐसे अनेक नामों से पुकारा जाने वाला पांच दिवसीय महोत्सव शुरू होते ही ब्रह्मांड में उत्साह का वातावरण व्याप्त है। यहां ब्रह्मांड शब्द का इसलिए इस्तेमाल किया गया है कि हमारे वेद पुराण शास्त्र और अनेक धार्मिक ग्रंथ यह बताते हैं कि इस पांच दिवसीय महा उत्सव के उपलक्ष में ब्रह्मांड में व्याप्त सभी धर्मनिष्ठ निवासी उत्साह और उमंग में डूब जाते हैं। इनके द्वारा विभिन्न प्रकार से परमपिता परमात्मा की पूजा अर्चना की जाती है। इन 5 दिनों में मुख्य रूप से भगवान धन्वंतरि, धन के देवता कुबेर, यमराज, महालक्ष्मी, गणेश जी, सरस्वती जी, श्री हनुमंत लाल जी के साथ और सीता जी के दाहिने विराजित श्री रामचंद्र जी तथा उनके प्रिय भाइयों भरत जी लक्ष्मण जी और शत्रुघ्न जी के अलावा भगवान कृष्ण और गौ माता की पूजा का विधान है। इसे हमें विस्तार से समझने की आवश्यकता है। किंतु बेहद व्यस्त समय के चलते हम यहां संक्षिप्त में ही वार्ता करेंगे। इस पांच दिवसीय महोत्सव की शुरुआत धन्वंतरि त्रयोदशी अर्थात धनतेरस से होती है। इस उत्सव का प्रमुख कारण समुद्र मंथन माना जाता है। बताया जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि की उत्पत्ति हुई थी। वह हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। विद्वान धन्वंतरी भगवान को श्री हरि विष्णु जी का अंश भी मानते हैं। क्योंकि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी उनका प्राकट्य दिवस है, इसलिए मान्यता है कि उनकी पूजा अर्चना करने से मनुष्य सदैव ही स्वस्थ और प्रसन्न चित्त बना रहता है। कलयुग की प्रधानता के चलते यह पर्व भगवान धन्वंतरि से अधिक धन के देवता कुबेर के पूजन का बन गया है। अधिकांश लोग इसे अब धनतेरस के रूप में पुकारने लगे हैं। धर्म ग्रंथ बताते हैं कि पूर्व जन्म में वर्जित कार्यों में संलग्न व्यक्ति गुणनिधि द्वारा अज्ञानतावश बार-बार शिवलिंग के समक्ष दीप जलाए जाने से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने अगले जन्म में उसे धन देवता के रूप में जन्म लेने का आशीर्वाद दिया। बताया जाता है कि इसी दिन कुबेर को मां लक्ष्मी की अपार कृपा प्राप्त हुई। अतः इस दिन भगवान धन्वंतरि और लक्ष्मी जी के साथ धन के देवता कुबेर को पूजने का विधान है। इस पांच दिवसीय महोत्सव के दूसरे दिन नरक चौदस मनाई जाती है। इस पर्व के बारे में कहा जाता है कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन भगवान के परम भक्त राजा रांति देव को बैकुंठ लोक की प्राप्ति हुई थी। उनके बारे में कथा है कि राजा रंति देव ने जीवन भर कोई धर्म विरुद्ध कार्य नहीं किया। किंतु अंत समय जब यमदूत लेने आए तब उन्हें आभास हो गया कि उनसे कोई अधर्म अवश्य हुआ है। पूछे जाने पर यमराज ने बताया सर्व साधन संपन्न होने के बाद भी राजा रंति देव के द्वारा से एक भूखा भिक्षुक निराश होकर वापस लौटा है। इसलिए उन्हें नर्क का दर्शन तो करना ही होगा। अनुनय विनय करने पर राजा रंति देव को एक वर्ष का समय दिया गया। ताकि वे पाप का प्रायश्चित कर सकें‌। उस एक वर्ष में राजा ने दीनों असहायों की सेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर करके समस्त पापों का प्रायश्चित किया। फल स्वरुप बैकुंठ लोक को प्राप्त हुए। यह वह दिन भी है जब भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। उसकी कैद से 16000 स्त्रियों को मुक्ति दिलाई थी। उन सभी ने 16 श्रृंगार करके भगवान की स्तुति की और उन्हें पति रूप में स्वीकार किया। तभी से इसे रूप चौदस भी कहा जाने लगा। इस महापर्व का केंद्र बिंदु दीपावली है जो इस महोत्सव के दो दिन पहले और दो दिन बाद यानी कि महोत्सव के बीचो-बीच मनाई जाती है। इस महापर्व की भी कई कथाएं हैं। सबसे अधिक मान्यता यह है कि कार्तिक माह की अमावस्या को भगवान राम ने वनवास से लौटकर अपना राज पाट संभाला था। इस प्रसंग के चलते अयोध्या सहित समस्त ब्रह्मांड में दीप जलाकर खुशियां मनाई गई थीं।उस रोज अयोध्या बैकुंठ धाम और ब्रह्मलोक से भी अधिक सुहावनी प्रतीत हुई तो देवी लक्ष्मी एवं मां सरस्वती भ्रमण करने हेतु पृथ्वी पर आ पहुंचीं और श्री राम की भक्ति में दीप जलने वालों पर अपनी पूर्ण कृपा बरसने लगीं। इस पर लोगों ने श्री राम दरबार के साथ माता लक्ष्मी और माता सरस्वती का भी पूजन किया। दोनों देवियों ने जब यह स्मरण दिलाया कि हमने मां गौरी और भगवान भोलेनाथ को यह वचन दिया है कि जहां भी हमारी पूजा होगी पुत्र गणेश भी हमारे साथ पूजित किए जाएंगे। अतः भक्तगणों ने श्री गणेश महालक्ष्मी और महा सरस्वती जी का पूजन किया, जो परंपरा अभी तक बनी हुई है। दीपावली महापर्व का चौथा दिन गोवर्धन पूजा का है। यह त्यौहार द्वापर युग से प्रचलन में है। जब भगवान कृष्ण ने इंद्र की बजाय प्रकृति पूजन और गौ पूजन को प्राथमिकता दी। तो इंद्र ने क्रोधित होकर गोकुलधाम को बारिश के पानी में डुबोने की ठान ली। तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को कनिष्ठ उंगली पर धारण करके सभी की रक्षा की। तभी से दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है और गाय के गोबर से प्रतीक स्वरूप गोवर्धन पर्वत बनाकर उसकी परिक्रमा किए जाने का प्रावधान है। इस महापर्व को पूर्णता यम द्वितीया मना कर प्राप्त होती है। इस त्यौहार के बारे में भी एक कथा सनातन काल से प्रचलन में है। कहा जाता है कि एक दिन यमराज को अपनी बहन यमुना की याद आई तो भवे सारे दायित्वों का त्वरित त्याग कर यमुना के यहां पहुंच गए। वहां यमुना जी ने उनका आत्मीय आदर सत्कार किया। मस्तिष्क पर तिलक लगाकर उनका स्वागत किया। जिससे यमराज बेहद प्रसन्न हुए तो उन्होंने यमुना से इच्छित वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने तत्समय नर्क भोग रहे लोगों के उद्धार का वरदान मांगा और उन्हें क्षमा कर देने की इच्छा यमराज से जताई। प्रसन्न होकर यमराज ने अपनी बहन के आग्रह पर पापात्माओं को मुक्त किया। तभी से यम द्वितीया के दिन बहनों द्वारा भाई के मस्तक पर तिलक लगाने का प्रावधान है। बदले में भाई बहन की इच्छाओं को पूर्ण करने का संकल्प लेते हैं और उनकी रक्षा हेतु प्रतिबद्ध बने रहते हैं। दीपावली का यह पांच दिवसीय महापर्व सभी के जीवन में खुशहाली आरोग्य धन-धान्य प्रदान करे। ……….यही शुभकामना

Leave a Reply