
श्री रामचरितमानस के लंका कांड में एक प्रसंग आता है, जब भगवान श्री राम समुद्र पर पुल बांधने के लिए उससे जल में रास्ता देने की प्रार्थना करते हैं। इसके लिए वे योग आसन लगाकर पूरे तीन दिन तक समुद्र के हठ की सीमाओं को टटोलते हैं और अपने धैर्य की परीक्षा भी देते हैं। लेकिन जब अनुनय विनय से काम नहीं चलता तब धनुष पर बाण का संधान कर लेते हैं। फल स्वरुप समुद्र को हाथ बांधे अपने सामने पाते हैं और समुद्र भगवान श्री राम को अपने ऊपर पुल बांधने का रास्ता बता देता है।
ऐसा ही कुछ प्रसंग बीते रोज राजधानी के कलेक्टर कार्यालय में देखने को मिला। बता दें कि यहां पर विभिन्न शासकीय विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को एक महत्वपूर्ण बैठक के लिए बुलाया गया। उनके कार्यों की विवेचना की गई। दायित्वों के निर्वहन में अच्छा प्रदर्शन न होने पर अधिकांश अधिकारियों को देर रात तक कार्यालय में बिठाया गया और निर्णायक कार्रवाई की चेतावनी दी गई। उन्हें यह समझा कर अपने-अपने घर रवाना किया गया कि यदि शासकीय कार्य पर पूरे मनोयोग से ध्यान केंद्रित नहीं किया गया एवं परिणाम मूलक कार्य नहीं किए गए तो किसी की भी खैर नहीं। अब सरकारी गलियारों में यह कानाफूसी देखने सुनने को मिल रही है कि भयवश ही सही, विभिन्न विभागों के अधिकारी पेंडिंग पड़ी फाइलों और अधर में लटके विकास कार्यों को अंतिम रूप देने के कार्यों में जुट जाने की मनस्थिति बनाने लगे हैं। उम्मीद व्यक्ति की जा रही है कि निकट भविष्य में इसके बेहतर परिणाम देखने को मिलेंगे। अंततः जिसका लाभ आम जनता को होने वाला है। अब सवाल उठता है कि भोपाल के कलेक्टर को इतना गुस्सा क्यों आया कि उन्होंने अधिकारियों को बैठक में बुलाकर न केवल उनके कार्यों की विवेचना करी, बल्कि गलती, लेट लतीफी, उदासीनता को लेकर उन्हें बुरी तरह फटकार भी लगाई तथा देर रात तक कार्यालय में ही रोके रखा। तो सब समझ लें कि मामला सीएम हेल्पलाइन में दर्ज शिकायतों के निपटारे में आ रहे शर्मनाक अवरोधों का था। हाल ही में जब शिकायतों के निपटारों को लेकर रैंक निर्धारित की गईं तो भोपाल जिले के ढेर सारे विभाग डी ग्रेड सूची में जा गिरे। जाहिर है इससे मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव, मुख्यमंत्री निवास में बैठे वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार के आला अफसरों को गुस्सा आना ही था सो वह आया और उन्होंने चेतावनी के साथ इस बात से जिला अधिकारियों को अवगत भी करा दिया। साथ में चेतावनी दे दी कि हालात नहीं सुधरे तो जिम्मेदार लोग अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें।
जब इस आशय की कड़ी चेतावनी कलेक्टरों के माध्यम से विभागीय दफ्तरों तक पहुंची तो सरकारी अमले में एक प्रकार से अफरा तफरी मच गई। जो अधिकारी कार्यालयीन समय पर भी अपनी कुर्सी पर टिकने को तैयार नहीं रहते थे, वह देर रात तक कलेक्टर के समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज करने को मजबूर रहे। जाहिर है यह स्थिति तब बनी जब शासन ने प्रशासन पर और प्रशासन ने पदाधिकारियों पर भृकुटी टेढ़ी की। वैसे भी हमारे धर्म ग्रंथ यह सिखाते हैं कि जब सामना कर्तव्यों से कन्नी काटने, विधि विरुद्ध, अधर्म सम्मत कार्य करने वालों से हो तो उनसे भय बिन प्रीत संभव हो ही नहीं पाती। संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस में लिखा भी है –
विनय न मानत जलधि जड़, दिवस तीन गए बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीत।।
यानि हमारे धर्म ग्रंथ पूर्व में ही सिखा गए हैं कि जब जवाब देह व्यक्ति को अपने दायित्वों के निर्वहन में परेशानियां सम्मुख आने लग जाएं तब उसे सामने अवरोध उत्पन्न करने वालों से किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। यदि शास्त्र सम्मत कार्य पद्धति अपनाई जाए तो फिर सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगते हैं। जिसकी बानगी बीते रोज भोपाल के कलेक्टर कार्यालय में देखने को मिली।
अधिकारियों को भी यह समझना होगा कि सीएम हेल्पलाइन तक वहीं आवेदक अथवा शिकायत कर्ता पहुंचते हैं जिनकी सुनवाई किसी भी विभाग में अधिकारियों का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पाती। एक प्रकार से सीएम हेल्पलाइन उनकी अंतिम आस का केंद्र बिंदु होती है। जब यहां भी बात नहीं बनती तब जनता शासन और खासकर मुख्यमंत्री के बारे में नकारात्मक धारणा बनाने लगती है। इसका परिणाम देर सवेर सरकार में स्थापित राजनीतिक दल और उनके नेताओं को भुगतना होता है। और कुछ हो या ना हो, लेकिन जनता के लिए अधिकारियों कर्मचारियों का उदासीन रवैया नुकसान देह साबित तो होता ही है। ऐसे में शासकीय पदों पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों को अपनी जवाबदेही स्वयं तय करने और अपने द्वारा किए गए कार्यों की विवेचना करने की पद्धति अपनाने पर विचार करना चाहिए।


