भारतीय जन संघ के संस्थापक और देश की एकता के सर्वश्रेष्ठ पैरोकार स्वर्गीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का वक्तव्य सुनने को मिला। तो महसूस हुआ कि उनका प्रत्येक शब्द मानो हृदय से निकल रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि डॉक्टर मोहन यादव मंच पर पूरी तैयारी के साथ आते हैं, या फिर उन्होंने डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन दर्शन पर व्यापक रूप से अध्ययन कर रखा है। यह बात इसलिए लिखना आवश्यक लगी, क्योंकि डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर जितनी मुखरता के साथ उन्होंने भाषण दिया वह काफी प्रमाणिक लगा और लोगों ने पूरे सुकून के साथ उसे सुना भी। उनकी सबसे रोचक बात यह लगी कि डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश की एकता को सर्वोपरि रखते हुए राजनीति को दूसरे क्रम पर रखा । यही कारण रहा कि जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लगा कि कांग्रेस में रहकर भारतीय एकता की बात नहीं की जा सकती तो उन्होंने केवल पार्टी ही नहीं छोड़ी, बल्कि वह मंत्री पद भी त्याग दिया जो उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में मिला हुआ था। यह बात सही है कि सब कुछ त्याग कर डॉक्टर मुखर्जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रमुख सदाशिव राव गोलवलकर जी से मिले और उनके सामने यह प्रस्ताव रखा कि संघ को राष्ट्रीय हित की बात को संसद तक पहुंचाने के लिए एक राजनीतिक दल का गठन अवश्य करना चाहिए। तब दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेई जैसे वरिष्ठ नेताओं के प्रयासों से भारतीय जनसंघ का उदय हुआ, जो आज भारतीय जनता पार्टी के नाम से विख्यात है। जब डॉक्टर मोहन यादव एक विधान एक निशान और एक प्रधान विषय पर बोल रहे थे तब श्रोताओं की एकाग्रता देखने लायक थी। उन्होंने बताया कि डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर को लेकर एकदम स्पष्ट वादी थे। वहां अलग झंडा, अलग विधान और अलग प्रधानमंत्री हो, यह बात उन्हें कतई मंजूर नहीं थी। यही कारण रहा कि उन्होंने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया। सत्ता पक्ष की ओर से उन पर अनेक अत्याचार हुए। लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपने संकल्प से डगमगाए नहीं। सबसे बड़ी बात तो यह रही की उन्होंने भारत की इसी एकता को साकार रूप देने के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। उल्लेखनीय है कि डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु कश्मीर में एकता आंदोलन करने के दौरान ही हुई थी। तब से लेकर धारा 370 हटने तक भाजपा का यह प्रमुख नारा बन रहा –
जहां हुए बलिदान मुखर्जी
वह कश्मीर हमारा है।
मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने श्रोताओं को यह स्मरण कराया कि जो लोग भारतीय जनता पार्टी पर यह तोहमत लगते हैं कि इस पार्टी के नेताओं ने देश के लिए कुछ नहीं किया, उन्हें डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे महा पुरुषों के बलिदान को नहीं भूलना चाहिए। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा को जब डॉक्टर मुखर्जी जैसे महान बलिदानी अपने हाथों से गढ़ते हैं तब वह पार्टी देश और देश की जनता के प्रति वचनबद्ध रहती है। यही कारण है कि हमने अनेक सालों तक, दशकों तक संघर्ष किया लेकिन कश्मीर को नहीं भूले। नेताओं ने बाद में शिगूफे छोड़े कि अब भाजपा सरकार में आ गई है तो कश्मीर की बात ठंडे बस्ते में चली जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जब स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेई सरकार में आए तब उन्होंने भी अपने स्तर पर डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने को साकार करने हेतु पूरी ताकत लगाई। लेकिन 24 दलों की खिचड़ी सरकार होने के चलते भाजपा तब देश का सपना साकार ना कर सकी। लेकिन जैसे ही देशवासियों ने श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पूर्ण बहुमत प्रदान किया, वैसे ही भाजपा की केंद्र सरकार ने कश्मीर से धारा 370 हटाकर स्वर्गीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने को साकार कर दिखाया। अब कश्मीर और शेष भारत के बीच ना कोई फर्क है और ना ही कोई व्यवधान। ऐसा करके हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी ने सही मायने में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि ही दी है। मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के इस संपूर्ण भाषण को एकाग्रता के साथ सुना जाना यह दर्शाता है कि उनकी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दर्शन पर गहरी समझ है।


