एजेंसी, लखनऊ, नई दिल्ली। देश में बढ़ते डूबे हुए कर्ज और बैंकों के फंसे धन को वापस लाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने एक बड़ा और सख्त प्रस्ताव सामने रखा है। यदि किसी व्यक्ति ने बैंक या वित्तीय संस्था से कर्ज लिया है और लंबे समय तक उसे नहीं चुका पाया, तो आने वाले समय में उसकी गिरवी रखी गई संपत्ति पर सीधे बैंक का कब्जा हो सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए नए मसौदे में बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थानों को कर्ज वसूली के लिए अधिक अधिकार देने की बात कही गई है।
The RBI plans to tighten how banks handle assets seized during loan recovery and reduce NPAs.
Read here :https://t.co/6hqIQ055lr#DNAUpdates | #RBI | #Economy | #NPA pic.twitter.com/AkdpznYXSB
— DNA (@dna) May 6, 2026
यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब देश के बैंक लंबे समय से फंसे हुए कर्ज की समस्या से जूझ रहे हैं। कई मामलों में बैंक कानूनी प्रक्रियाओं और अदालतों के चक्कर में वर्षों तक उलझे रहते हैं, जिससे उनका पैसा वापस नहीं आ पाता। अब केंद्रीय बैंक ने इस पूरी व्यवस्था को अधिक प्रभावी और तेज बनाने के उद्देश्य से नए नियमों का खाका तैयार किया है।
डूबे कर्ज पर बैंक उठा सकेंगे बड़ा कदम
प्रस्तावित नियमों के अनुसार यदि किसी उधारकर्ता का कर्ज लंबे समय तक नहीं चुकाया जाता और वह डूबे हुए कर्ज की श्रेणी में पहुंच जाता है, तो बैंक उस व्यक्ति की गिरवी रखी गई अचल संपत्ति को अपने कब्जे में ले सकेंगे। इसमें जमीन, मकान, दुकान या अन्य स्थायी संपत्तियां शामिल हो सकती हैं।
अब तक बैंकों को इस प्रक्रिया में काफी कानूनी अड़चनों और लंबी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता था, लेकिन नए नियम लागू होने के बाद वसूली की प्रक्रिया को तेज और अधिक व्यवस्थित बनाया जा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक का मानना है कि इससे बैंकों को फंसा हुआ पैसा वापस पाने में मदद मिलेगी और वित्तीय व्यवस्था अधिक मजबूत बनेगी।
सात वर्षों के भीतर बेचना होगी संपत्ति
हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को अधिक अधिकार देने के साथ-साथ कुछ सख्त शर्तें भी तय की हैं। नए मसौदे के मुताबिक बैंक किसी भी जब्त की गई संपत्ति को अनिश्चित समय तक अपने पास नहीं रख सकेंगे।
केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि कब्जे में ली गई संपत्ति को सात वर्षों के भीतर हर हाल में बेचना होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बैंक संपत्तियों का उपयोग केवल कर्ज वसूली के लिए करें, न कि उन्हें अपने नियंत्रण में रखकर लाभ कमाने के लिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय सीमा तय होने से संपत्तियों की बिक्री प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और तेज होगी। इससे बाजार में भी संतुलन बना रहेगा और बैंकों को समय पर धन वापसी मिल सकेगी।
पारदर्शिता बढ़ाने पर जोर
भारतीय रिजर्व बैंक ने इस मसौदे में पारदर्शिता को सबसे अधिक महत्व दिया है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि संपत्तियों की बिक्री खुली और निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से होनी चाहिए ताकि किसी प्रकार की धांधली या पक्षपात की संभावना न रहे।
नियमों में यह भी कहा गया है कि जब्त की गई संपत्ति को उचित बाजार मूल्य पर बेचना जरूरी होगा। इससे बैंक को अधिकतम धन वापसी मिल सकेगी और वित्तीय नुकसान कम होगा।
डिफॉल्टर नहीं खरीद पाएंगे अपनी संपत्ति
नए प्रस्ताव में एक बेहद महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी रखा गया है कि जिस व्यक्ति का कर्ज डूबा हुआ घोषित किया गया है, वह अपनी जब्त की गई संपत्ति को दोबारा नहीं खरीद सकेगा। इसके अलावा उससे जुड़े लोग या सहयोगी भी उस संपत्ति को खरीदने के पात्र नहीं होंगे।
भारतीय रिजर्व बैंक का मानना है कि इस नियम से उन मामलों पर रोक लगेगी जिनमें कुछ लोग कम कीमत पर अपनी ही संपत्ति दोबारा हासिल कर लेते थे। इससे पूरी प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष और भरोसेमंद बन सकेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने और गलत तरीकों से होने वाले लेनदेन को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
केवल अंतिम विकल्प के रूप में होगा इस्तेमाल
केंद्रीय बैंक ने साफ किया है कि यह प्रक्रिया तभी अपनाई जाएगी जब कर्ज वसूली के बाकी सभी रास्ते पूरी तरह समाप्त हो चुके हों। यानी बैंक सीधे किसी व्यक्ति की संपत्ति पर कब्जा नहीं करेंगे, बल्कि पहले सभी वैधानिक और सामान्य उपाय अपनाए जाएंगे।
यदि उसके बाद भी कर्ज की वसूली संभव नहीं हो पाती, तभी संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इससे आम ग्राहकों के हितों की रक्षा भी हो सकेगी और बैंकिंग व्यवस्था में संतुलन बना रहेगा।
जनता और विशेषज्ञों से मांगे गए सुझाव
भारतीय रिजर्व बैंक ने इस मसौदे को अंतिम रूप देने से पहले आम लोगों, बैंकिंग विशेषज्ञों और संबंधित संस्थाओं से सुझाव मांगे हैं। इसके लिए 26 मई तक का समय निर्धारित किया गया है।
सुझाव मिलने के बाद केंद्रीय बैंक नियमों में आवश्यक बदलाव कर सकता है। माना जा रहा है कि अंतिम नियम लागू होने के बाद देश की बैंकिंग व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत करने की तैयारी
देश में बढ़ते डूबे कर्ज लंबे समय से बैंकों के लिए बड़ी चिंता बने हुए हैं। हजारों करोड़ रुपये ऐसे कर्ज के रूप में फंसे हैं जिनकी वापसी नहीं हो पा रही। इससे बैंकिंग व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है और नए ग्राहकों को ऋण देने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक का यह कदम वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नियम सही तरीके से लागू हुए तो इससे बैंकों को राहत मिलेगी और कर्ज लेने वाले लोगों में भी जिम्मेदारी की भावना बढ़ेगी।
आम लोगों के लिए क्या है संदेश
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रस्ताव आम लोगों के लिए भी एक चेतावनी की तरह है कि कर्ज लेने के बाद समय पर उसकी अदायगी बेहद जरूरी है। यदि कोई व्यक्ति लगातार भुगतान नहीं करता और उसका खाता डूबे हुए कर्ज की श्रेणी में पहुंच जाता है, तो भविष्य में उसकी संपत्ति खतरे में पड़ सकती है।
हालांकि नियमों में ग्राहकों के अधिकारों और कानूनी सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया है, लेकिन इसके बावजूद यह साफ संकेत है कि आने वाले समय में बैंक कर्ज वसूली के मामलों में पहले से अधिक सख्त रुख अपना सकते हैं।


