एजेंसी, नई दिल्ली। Shiv Sena UBT 6 MPs Merger : महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (यूबीटी) और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट के बीच जारी खींचतान अब देश की शीर्ष अदालत की चौखट पर पहुंच गई है। शिवसेना (यूबीटी) द्वारा अपने 6 बागी सांसदों के शिंदे नीत दल में विलय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने अहम कदम उठाया है। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की दो सदस्यीय पीठ ने मामले पर विचार करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, लोकसभा सचिवालय के सचिव तथा शिंदे गुट में शामिल हुए सभी 6 सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने उद्धव ठाकरे गुट को तत्काल कोई अंतरिम राहत न देते हुए सांसदों के विलय के फैसले पर फिलहाल रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है।
The Supreme Court has issued notices to the Lok Sabha Speaker’s office and six rebel Shiv Sena (UBT) MPs on a petition challenging Speaker Om Birla’s decision approving their merger into the Eknath Shinde-led Shiv Sena faction. The court refused to stay the Speaker’s decision for… pic.twitter.com/keD5E6p05x
— IANS (@ians_india) July 22, 2026
विलय के फैसले पर अंतरिम रोक से इनकार, 2 सप्ताह बाद होगी अगली सुनवाई
उच्चतम न्यायालय की पीठ ने याचिका में शामिल संवैधानिक और कानूनी पहलुओं की गंभीरता को देखते हुए सभी प्रतिवादियों से उनका रुख स्पष्ट करने को कहा है। अदालत ने प्रतिवादियों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए समय सीमा निर्धारित करते हुए मामले की अगली सुनवाई 2 सप्ताह के बाद तय की है। अदालत द्वारा विलय के आदेश पर किसी भी प्रकार की रोक न लगाए जाने के कारण फिलहाल इन 6 सांसदों की लोकसभा में नई स्थिति बरकरार रहेगी, जिससे शिंदे गुट को अस्थायी राहत मिली है।
उद्धव गुट की दलील: संवैधानिक नैतिकता और मर्यादा का हुआ उल्लंघन
अदालत की कार्यवाही के दौरान शिवसेना (यूबीटी) की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने जोरदार पैरवी की। उन्होंने पीठ के समक्ष तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह मामला पूरी तरह से संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक सिद्धांतों से जुड़ा हुआ है। कामत ने दलील दी कि ये सभी 6 सांसद उनकी मूल पार्टी के अधिकृत चुनाव चिह्न पर जीतकर आए थे और उनके खिलाफ कोई भी अयोग्यता संबंधी मामला लंबित नहीं था। ऐसे में बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के उनके विलय को स्वीकृति देने पर गंभीर सवाल उठते हैं। वरिष्ठ वकील ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि जिस प्रशासनिक परिपत्र के जरिए इस विलय को मान्यता प्रदान की गई है, उस पर केवल एक संयुक्त सचिव के हस्ताक्षर हैं, जिससे यह स्पष्ट नहीं होता कि अध्यक्ष महोदय का कोई विधिवत आदेश है या नहीं।
मानसून सत्र से ठीक पहले लोकसभा अध्यक्ष ने दी थी विलय को मंजूरी
उल्लेखनीय है कि संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले 18 जुलाई को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एक अहम प्रशासनिक निर्णय लेते हुए शिवसेना (यूबीटी) के 6 बागी सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने के प्रस्ताव को हरी झंडी दी थी। इस विलय की आधिकारिक मान्यता मिलने के बाद निचले सदन में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी के सांसदों की संख्या घटकर मात्र 3 रह गई है।
क्या है संसदीय समीकरण और कौन हैं बागी सांसद?
लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों और परिपत्र के अनुसार, इस मान्यता के बाद निचले सदन में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के सदस्यों की कुल संख्या 7 से बढ़कर 13 तक पहुंच गई है। शिंदे गुट में शामिल होने वाले 6 प्रमुख सांसदों में संजय जाधव, संजय पाटिल, संजय देशमुख, ओमराजे निंबालकर, नागेश पाटिल अष्टीकर और भाऊसाहेब वाकचौरे के नाम दर्ज हैं। इस फेरबदल ने न केवल संसद के भीतर दलीय समीकरणों को प्रभावित किया है, बल्कि आगामी राजनीतिक रणनीतियों के लिहाज से भी दोनों धड़ों के लिए बड़े निहितार्थ पैदा कर दिए हैं।
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