MP Sand Mining

चंबल नदी में अवैध रेत खनन पर मध्य प्रदेश सरकार का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा : कहा- ड्रोन से रखी जा रही है कड़ी नजर, अभयारण्य में नहीं हुआ कोई नया उत्खनन

ग्वालियर देश/प्रदेश प्रादेशिक मध्‍य प्रदेश

एजेंसी, चंबल। MP Sand Mining : राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के भीतर हो रहे कथित अवैध रेत उत्खनन के मामले में मध्य प्रदेश सरकार ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के समक्ष अपना विस्तृत जवाब पेश कर दिया है। राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत को दिए अपने आधिकारिक हलफनामे में पूरी तरह साफ किया है कि हाल ही में की गई प्रशासनिक जांच और जमीनी स्तर पर हुई पड़ताल में क्षेत्र के भीतर किसी भी प्रकार के नए या ताजा अवैध खनन के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। चंबल नदी के प्रतिबंधित क्षेत्रों में अवैध उत्खनन को लेकर पूर्व में खड़े हुए बड़े सवालों के बीच सरकारी पक्ष ने अदालत को आश्वस्त किया कि जिन विशिष्ट स्थलों और गड्ढों की चर्चा समाचार माध्यमों की रिपोर्ट में की गई थी, वे सभी काफी पुराने खनन के कारण बने थे। सुप्रीम कोर्ट के पुराने सख्त निर्देशों के लागू होने के बाद से उन चिन्हित स्थानों पर किसी भी प्रकार की नई अवैध गतिविधि का संचालन नहीं पाया गया है। यह पूरा मामला शुक्रवार 29 मई को सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ के समक्ष अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था, जहां राज्य शासन द्वारा यह महत्वपूर्ण शपथपत्र दाखिल किया गया।

ड्रोन कैमरों से लगातार की जा रही है संवेदनशील इलाकों की निगरानी

अदालत की कार्रवाई के दौरान सरकारी वकीलों ने पीठ को सूचित किया कि ग्वालियर वन वृत्त के वन संरक्षक द्वारा जो शपथपत्र प्रस्तुत किया गया है, उसमें जमीनी हकीकत का पूरा ब्योरा दिया गया है। वन विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की संयुक्त टीम ने समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर प्रभावित स्थानों का मौके पर जाकर सघन भौतिक निरीक्षण किया था। इसके अलावा इंसानी पहुंच से दूर वाले बीहड़ इलाकों में आधुनिक ड्रोन कैमरों की मदद से लगातार हवाई निगरानी (सर्विलांस) भी की गई। इस सघन जांच-पड़ताल के बाद ही प्रशासन इस अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा है कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों का क्षेत्र में कड़ाई से पालन हो रहा है और अभयारण्य के भीतर नया अवैध खनन पूरी तरह ठप है। सरकार ने न्यायालय को यह भी बताया कि अप्रैल 2026 के दूसरे सप्ताह से ही चंबल वन्यजीव अभयारण्य और उसके आसपास के सभी संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में ड्रोन सर्विलांस को पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि की भनक तुरंत लग सके।

अवैध भंडारण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई, 12 आरोपी गिरफ्तार और 44 वाहन जब्त

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने इस बात को भी स्पष्ट किया कि वन विभाग की गश्त के दौरान कुछ ट्रैक्टरों को रेत का अवैध परिवहन करते हुए जरूर पकड़ा गया था, लेकिन वह रेत ताजा खनन से नहीं निकाली गई थी। यह आशंका जताई गई है कि वह सामग्री रेत माफियाओं और स्थानीय व्यापारियों द्वारा कोर्ट के आदेश से काफी पहले डंप करके छुपाए गए पुराने अवैध भंडारण का हिस्सा हो सकती है। हालांकि, सरकार ने अदालत के सामने यह पूरी तरह स्वीकार किया कि अवैध रेत को छुपाकर रखने और बिना वैध परमिट के उसका परिवहन करने वालों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की प्रक्रिया बहुत तेजी से चल रही है। ऐसे सभी अवैध कारोबारियों के खिलाफ कड़े कानूनी कदम उठाए जा रहे हैं। चंबल क्षेत्र में कानून का शिकंजा कसने के दावों के साथ सरकार ने बताया कि इस अभियान के तहत अब तक 12 मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। इसके साथ ही अवैध कार्यों में लिप्त 44 वाहनों को वन विभाग ने अपने कब्जे में ले लिया है, जिनमें से 8 बड़े वाहनों को पूरी तरह से राजसात (सरकारी संपत्ति घोषित) करने की विधिक कार्रवाई भी पूरी की जा चुकी है। यह सभी आंकड़े सरकारी जवाब के मुख्य अंश रहे।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को दिलाया सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने का भरोसा

मामले की पैरवी करते हुए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से उपस्थित हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ को पूरा भरोसा दिलाया कि चंबल घड़ियाल अभयारण्य जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पर्यावरणीय क्षेत्र में सुरक्षा और गश्त की व्यवस्था को आने वाले दिनों में और ज्यादा अभेद्य बनाया जा रहा है। उन्होंने दृढ़ता से कहा कि भविष्य में किसी भी विपरीत परिस्थिति में इस प्रतिबंधित क्षेत्र के भीतर अवैध उत्खनन को दोबारा सिर उठाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने बताया कि संपूर्ण वन विभाग और जिला प्रशासन की विशेष टीमों को 24 घंटे पूरी तरह से अलर्ट मोड पर रखा गया है। ड्रोन कैमरों की हवाई निगरानी के साथ-साथ नदी के किनारों पर जमीन पर भी पैदल और वाहनों से गश्त काफी बढ़ा दी गई है। सरकार ने अदालत से कहा कि आने वाले समय में पर्यावरण को होने वाले नुकसान को पूरी तरह से रोकने और अदालत के सभी पुराने और नए दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी प्रशासनिक और सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया था संज्ञान, 22 जुलाई को अगली सुनवाई

इस मामले की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो सुप्रीम कोर्ट ने बीते 26 मई को अंग्रेजी समाचार पत्र हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया था। उस मीडिया रिपोर्ट में गंभीर आरोप लगाए गए थे कि सर्वोच्च न्यायालय के सख्त रुख के बाद भी चंबल अभयारण्य के मुख्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अवैध रेत का खनन और उसकी तस्करी बदस्तूर जारी है। अदालत ने अपने पुराने आदेशों में बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि चंबल घाटी में सक्रिय अवैध खनन का यह पूरा नेटवर्क अब एक बेहद संगठित और खूंखार गिरोह का रूप ले चुका है, जिसे केवल एक स्थानीय प्रशासनिक समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने सख्त हिदायत दी थी कि बिना वैध पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) वाले सभी वाहनों की चंबल क्षेत्र में आवाजाही को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए और वन विभाग के नाकों को आधुनिक हथियारों और संचार साधनों से लैस किया जाए। इस मामले में अब सर्वोच्च न्यायालय ने तीन राज्यों की सीमाओं से जुड़े इस मुद्दे पर मध्य प्रदेश के साथ-साथ राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकार को भी संयुक्त रूप से निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) को भी आदेश दिया गया है कि वे अगली सुनवाई से पहले इस पूरे मामले की एक नई और निष्पक्ष तथ्यात्मक रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मामले की अगली सुनवाई की तिथि 22 जुलाई 2026 तय की है, जिसमें सरकार द्वारा जमीन पर उठाए गए कदमों की समीक्षा की जाएगी।

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