Mohan Bhagwat RSS

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का पाकिस्तान पर बड़ा बयान, कहा- भारत की सोच हिटलर जैसी नहीं, भविष्य में शांति के लिए बातचीत के रास्ते रखने होंगे खुले

केरल देश/प्रदेश

एजेंसी, तिरुवनंतपुरम। Mohan Bhagwat RSS : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर्वोच्च नेता मोहन भागवत ने पड़ोसी देश पाकिस्तान के संदर्भ में संगठन के दृष्टिकोण को पूरी तरह से स्पष्ट किया है। उन्होंने संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबोले द्वारा पूर्व में दिए गए उस बयान का पुरजोर समर्थन किया है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के साथ संवाद के रास्ते खुले रखने की वकालत की थी। स्वयंसेवक संघ प्रमुख ने इस विचार की गहराई से व्याख्या करते हुए कहा कि उनके संगठन का यह दृष्टिकोण किसी राजनीतिक स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि मानवता और शांति की स्थापना के लिए है। केरल के तिरुवनंतपुरम में आयोजित एक महत्वपूर्ण वैचारिक सत्र के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और देश की सुरक्षा के मामलों में उनका संगठन हमेशा भारत की लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई केंद्र सरकार की नीतियों और निर्णयों के साथ पूरी मजबूती से खड़ा रहेगा।

फासीवादी विचारधारा से भारतीय संस्कृति की तुलना गलत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित एक विशेष बौद्धिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने इतिहास के क्रूर तानाशाहों का संदर्भ देते हुए भारत की मूल विचारधारा को दुनिया के सामने रखा। उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि भारतीय समाज या संस्कृति की सोच कभी भी एडॉल्फ हिटलर जैसी विनाशकारी और दमनकारी नहीं रही है। दूसरों पर पूरी तरह से अत्याचार करना, संवाद को पूरी तरह से नकार देना या किसी का अस्तित्व ही समाप्त कर देना हमारा चरित्र या काम करने का तरीका कभी नहीं रहा है। भारतीय संस्कृति हमेशा से समन्वय और सुधार की भावना पर आधारित रही है। हमारा मुख्य उद्देश्य समाज से अन्याय, हिंसा और क्रूरता का पूरी तरह से खात्मा करना है, लेकिन इसके साथ ही जो भी तत्व मानवता के हित में अच्छे हैं, उन्हें संभाल कर रखना और उन्हें आगे बढ़ाना भी हमारी मूल जिम्मेदारी है।

पड़ोसी देश के भीतर विभाजन के खिलाफ उठती आवाजें

विभाजन के दर्द और वर्तमान हालातों पर चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि आज के समय में भी पाकिस्तान के भीतर रहने वाले बहुत से प्रबुद्ध नागरिक, बुद्धिजीवी और पत्रकार आंतरिक रूप से यह गहराई से महसूस करते हैं कि वर्ष 1947 में भारत का जो मजहबी विभाजन हुआ था, वह पूरी तरह से गलत और आत्मघाती कदम था। वहां के कई प्रमुख पत्रकार और विचारक आज भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक कार्यों और उसकी विचारधारा की खुलकर सराहना करते हैं। पड़ोसी मुल्क में आज ऐसे लोगों की एक बहुत बड़ी तादाद मौजूद है जो वहां के हुक्मरानों की गलत नीतियों के खिलाफ हैं और दो-राष्ट्र के सिद्धांत को पूरी तरह से खारिज करते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि साझा संस्कृति के साथ मिलकर रहना ही सभी के विकास के लिए सबसे बेहतर रास्ता था।

भविष्य की कूटनीति और संवाद की अनिवार्यता

भविष्य की रणनीतियों और संभावित परिस्थितियों का आकलन करते हुए मोहन भागवत ने दूरगामी सोच का प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में कभी सुरक्षा कारणों से या युद्ध की स्थिति में भारत को अपने पड़ोसी देश को परास्त करना पड़ता है, तो उसके बाद दो ही रास्ते बचेंगे। या तो वहां के नागरिकों को भारत की मुख्यधारा में शामिल करना होगा या फिर उन्हें अपने ही देश के भीतर पूरी तरह से शांति और सौहार्द के साथ जीवन यापन करने के योग्य बनाना होगा। इन दोनों ही परिस्थितियों को धरातल पर उतारने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि संवाद और आपसी बातचीत के कूटनीतिक रास्ते कभी भी पूरी तरह से बंद न किए जाएं। उन्होंने इस बात को बार-बार दोहराया कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपनी कोई अलग से विदेश नीति नहीं है और देश की सुरक्षा के हित में जो भी रुख भारत सरकार अपनाएगी, संघ उसका अक्षरशः पालन करेगा।

वरिष्ठ पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबोले का मूल वक्तव्य

इस पूरे वैचारिक विवाद की शुरुआत संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबोले के उस बयान से हुई थी, जिसमें उनसे सीमा पार से लगातार प्रायोजित होने वाले आतंकवाद और भारत की जवाबी कार्रवाई को लेकर सवाल पूछा गया था। उस समय होसबोले ने बेहद स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और देश के आत्मसम्मान की रक्षा करना सबसे पहला और सर्वोपरि धर्म है। वर्तमान केंद्र सरकार इन सभी सुरक्षा मानकों का पूरी तरह से ध्यान रख रही है और आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दे रही है। परंतु, इस सैन्य और कूटनीतिक कड़ाई के साथ-साथ हमें एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में बातचीत की संभावनाओं को कभी भी पूरी तरह से समाप्त नहीं करना चाहिए। हमें भविष्य में शांति की स्थापना के लिए संवाद की मेज पर बैठने के लिए हमेशा मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए, क्योंकि बातचीत ही किसी भी स्थायी समाधान का अंतिम जरिया बनती है।

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