HP HC

आउटसोर्सिंग मामले पर सरकार के ढुलमुल रवैये से हाई कोर्ट नाराज : हलफनामा पेश न करने पर 50 हजार रुपये के जुर्माने की चेतावनी

देश/प्रदेश हिमाचल प्रदेश

एजेंसी, शिमला। HP HC Outsourcing Order : हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य के विभिन्न सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग सेवाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर अत्यंत कड़ा असंतोष व्यक्त किया है। मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया तथा न्यायाधीश बिपिन सी नेगी की संयुक्त खंडपीठ ने कहा कि प्रदेश की सुक्खू सरकार ऐसे गंभीर सार्वजनिक मुद्दों पर किसी निजी याचिकाकर्ता की भांति उदासीन व्यवहार कर रही है और केवल समय बिताने का प्रयास कर रही है। अदालत ने राज्य प्रशासन को अंतिम अवसर प्रदान करते हुए निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई की तिथि तक सभी आवश्यक आंकड़ों एवं जानकारियों के साथ एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जाए। यदि सरकार ऐसा करने में असमर्थ रहती है, तो उस पर 50,000 रुपये का भारी जुर्माना लगाया जाएगा, जिसे शिमला स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज के गरीब मरीज कोष में जमा कराना अनिवार्य होगा।

सरकारी आंकड़ों में पाई गईं गंभीर विसंगतियां और विरोधाभास

उच्च न्यायालय की खंडपीठ में पिछले 3 वर्षों के दौरान विभिन्न प्रशासनिक विभागों में हुई आउटसोर्सिंग नियुक्तियों के पूर्ण ब्योरे की मांग करने वाली कुल 6 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई चल रही है। सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार की ओर से विभागवार आंकड़ों का ब्योरा प्रस्तुत किया गया, तो न्यायालय ने उसमें व्यापक कमियां और विरोधाभासी विवरण पाए। अदालत ने अपने अवलोकन में नोट किया कि कई प्रमुख विभागों की सूची में स्वीकृत पदों तथा रिक्त स्थानों की संख्या को शून्य दर्शाया गया था, जो कि प्रशासनिक रिकॉर्ड के वास्तविक आंकड़ों से बिल्कुल मेल नहीं खाता था। इस प्रकार की त्रुटिपूर्ण जानकारी से अदालत ने अत्यधिक नाराजगी जताई।

स्वास्थ्य विभाग के पदों के विवरण पर खड़े हुए बड़े सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे प्रतिनिधियों ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि अकेले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में स्वीकृत पदों की कुल संख्या 24,188 है। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत की गई अद्यतन रिपोर्ट में प्रदेश के सभी 46 विभागों को मिलाकर स्वीकृत पदों का कुल आंकड़ा केवल 30,805 ही दिखाया गया है। अदालत ने इन दोनों आंकड़ों के बीच के व्यापक अंतर पर कड़ा संज्ञान लेते हुए स्पष्ट कहा कि सरकार द्वारा प्रस्तुत यह ब्योरा जमीनी सच्चाई और आधिकारिक दस्तावेजों से काफी दूर प्रतीत होता है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद देरी पर अदालती सवाल

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व उच्च न्यायालय द्वारा 18 मई और 16 जून 2026 को जारी अंतरिम आदेशों के विरुद्ध राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 27 जुलाई को मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को 5 कार्य दिवस के भीतर उच्च न्यायालय के समक्ष अपना विस्तृत उत्तर एवं शपथ पत्र दाखिल करने का स्पष्ट आदेश दिया था। इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने स्वास्थ्य विभाग की 6 नवंबर 2025 की अधिसूचना के अंतर्गत जारी चयन एवं नियुक्ति प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति तो दी थी, परंतु यह शर्त भी जोड़ी थी कि सभी अंतिम नियुक्तियां उच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी। उच्च न्यायालय ने कहा कि शीर्ष अदालत की समय सीमा तय होने के बाद भी सरकार पूरा ब्योरा पेश करने में नाकाम रही है।

आगामी सुनवाई की समय सीमा और प्रशासनिक जवाबदेही तय

सर्वोच्च न्यायालय की स्पष्ट समय सीमा के बावजूद निर्धारित अवधि में पूर्ण विवरण प्रस्तुत न करने पर उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक तंत्र की ढिलाई पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस महत्वपूर्ण याचिका की अगली सुनवाई के लिए 13 अगस्त की तिथि निर्धारित की है और राज्य सरकार को स्पष्ट ताकीद की है कि तब तक हर विभाग का पूर्ण एवं सटीक विवरण शपथ पत्र के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च न्यायालय के इस सख्त रुख से न केवल आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की पारदर्शी व्यवस्था का रास्ता साफ होगा, बल्कि सरकारी तंत्र को भी अपने रिकॉर्ड और नियुक्तियों के प्रति अधिक जिम्मेदार होना पड़ेगा।

इस पूरे मामले और मुख्य बिंदुओं को समझने के लिए नीचे दिए गए प्रमुख प्रश्नों और उनके उत्तरों को पढ़ें :

प्रश्न 1: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाने की चेतावनी क्यों दी?

उत्तर: अदालत द्वारा बार-बार अवसर दिए जाने और सुप्रीम कोर्ट की समय सीमा बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा आउटसोर्सिंग कर्मचारियों और पदों का सटीक विवरण हलफनामे के माध्यम से प्रस्तुत न करने के कारण यह चेतावनी दी गई।

प्रश्न 2: सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग के आंकड़ों में हाई कोर्ट को किस प्रकार की विसंगतियां मिलीं?

उत्तर: हाई कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत सूची में कई महत्वपूर्ण विभागों में स्वीकृत और रिक्त पदों की संख्या को ‘शून्य’ दर्शाया गया था, जो कि प्रशासनिक रिकॉर्ड से पूरी तरह मेल नहीं खा रहा था।

प्रश्न 3: स्वास्थ्य विभाग के स्वीकृत पदों के आंकड़ों को लेकर कोर्ट में क्या विरोधाभास सामने आया?

उत्तर: याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि अकेले स्वास्थ्य विभाग में 24,188 स्वीकृत पद हैं, जबकि सरकार की समग्र रिपोर्ट में प्रदेश के सभी 46 विभागों को मिलाकर कुल 30,805 स्वीकृत पद ही दिखाए गए थे।

प्रश्न 4: इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को पूर्व में क्या निर्देश प्रदान किए थे?

उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को 5 कार्य दिवसों के भीतर हाई कोर्ट में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था और स्वास्थ्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति देते हुए इसे हाई कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन रखा था।

प्रश्न 5: यदि सरकार पर जुर्माना लगाया जाता है तो उस राशि का उपयोग किस कार्य के लिए किया जाएगा?

उत्तर: हाई कोर्ट के आदेशानुसार जुर्माने की 50,000 रुपये की राशि को शिमला स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) के पुअर पेशेंट्स फंड (गरीब मरीज कल्याण कोष) में जमा कराया जाएगा।

ये भी पढ़े : शेख हसीना के ऑनलाइन भाषण पर भारत का बड़ा बयान : बांग्लादेश की आपत्ति को किया दरकिनार, कहा- मीडिया संस्था के निजी कार्यक्रम से हमारा संबंध नहीं

ताज़ा अपडेट और ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें और STPV.live के साथ अपडेट रहें

Leave a Reply