एजेंसी, अमरेली। Gir National Park : गुजरात के विश्व प्रसिद्ध गिर वन्यजीव अभ्यारण्य से पशु प्रेमियों को परेशान करने वाली एक दुखद खबर सामने आई है। गिर के घने जंगलों में पिछले कुछ समय के भीतर पांच छोटे शावकों सहित कुल आठ एशियाई शेरों की जान चली गई है। वन्यजीव विशेषज्ञों द्वारा इस अचानक हुई मौतों के पीछे बेहद खतरनाक और संक्रामक बाबेसिया वायरस का अंदेशा जताया जा रहा है। इतनी बड़ी संख्या में शेरों की मौत के बाद पूरे प्रदेश के वन विभाग में खलबली मच गई है। हालांकि, मामले को बढ़ता देख राज्य के वन मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने मंगलवार को एक प्रेस वार्ता में स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया। उन्होंने जनता और पर्यावरणविदों को भरोसा दिलाते हुए कहा कि गिर राष्ट्रीय उद्यान में फिलहाल किसी भी तरह की महामारी या बड़े पैमाने पर फैलने वाले संक्रमण जैसी भयावह स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है। वन मंत्री के आधिकारिक बयान के अनुसार, गहन जांच में केवल दो शावकों की संदिग्ध मौत ही इस विशेष परजीवी संक्रमण की वजह से होना सामने आया है, जबकि शेष अन्य शेरों की मौत अलग-अलग क्षेत्रों में सामान्य प्राकृतिक कारणों और आपसी खूनी संघर्ष की वजह से हुई है।
ગુજરાતના ગૌરવ સમાન એશિયાટિક સિંહોના આરોગ્યને લઈને રાજ્ય સરકાર અને વન વિભાગ સંપૂર્ણ સજાગ અને પ્રતિબદ્ધ છે. બેબીસીયા વાયરસ સંબંધિત સામે આવેલ માહિતીની ગંભીરતાપૂર્વક તપાસ હાથ ધરવામાં આવી છે, જેમાં બે સિંહોના મોત અંગે વાયરસની આશંકા સામે આવી રહી છે.
વન વિભાગ અને નિષ્ણાત વેટરનરી… pic.twitter.com/Own9Uxy5lc
— Arjun Modhwadia (@arjunmodhwadia) May 26, 2026
जानिए क्या है यह जानलेवा बाबेसिया परजीवी और इसके लक्षण
चिकित्सीय विज्ञान और वन्यजीव डॉक्टरों के मुताबिक बाबेसिया एक अत्यंत घातक और संक्रामक बीमारी है जो न केवल पशुओं और जंगली जानवरों को बल्कि इंसानों को भी अपनी चपेट में ले सकती है। यह बीमारी मुख्य रूप से बाबेसिया नाम के एक अति सूक्ष्म परजीवी के कारण फैलती है। जंगलों में रहने वाले छोटे जीवों, जैसे किलनी और पिस्सुओं के जरिए यह परजीवी एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरित होता है। जब यह खतरनाक वायरस शेरों के रक्त प्रवाह में प्रवेश करता है, तो यह इंसानी मलेरिया की तरह ही सीधे उनकी लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला बोल देता है। इसके प्रभाव से वन्यजीवों के शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट होने लगती हैं, जिससे वे गंभीर रूप से एनीमिया यानी खून की भारी कमी का शिकार हो जाते हैं। इस घातक संक्रमण की चपेट में आने के बाद शेरों में भयंकर शारीरिक कमजोरी, लगातार खांसी का आना और नाक से स्राव बहने जैसी गंभीर परेशानियां उत्पन्न होने लगती हैं। उचित समय पर सही इलाज न मिल पाने के कारण जानवर बेहद असहाय होकर दम तोड़ देता है। इतिहास पर नजर डालें तो इससे पहले साल 2018 में भी इसी जानलेवा बेबेसिया वायरस के भयंकर प्रकोप के चलते गिर के जंगलों में मात्र एक महीने की छोटी अवधि के भीतर 11 शेरों की दर्दनाक मौत हो गई थी, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था।
अलग-अलग वन क्षेत्रों में दर्ज की गई मौतें, नियंत्रण में है स्थिति
वन विभाग के सर्वोच्च अधिकारी और मुख्य वन्यजीव संरक्षक जयपाल सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मृत पाए गए तीनों शावकों की मौत की घटनाएं गिर जंगल के बिल्कुल अलग-अलग परिक्षेत्रों में दर्ज की गई हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि यह कोई सामूहिक संक्रमण नहीं है। उनके अनुसार, लिलिया रेंज में एक शावक, सावरकुंडला रेंज में एक और सरसिया रेंज में एक शावक मृत अवस्था में पाया गया। इनमें से जिन दो शावकों की मौत संक्रमण से होने की आशंका है, वे उम्र में बेहद छोटे और कमजोर थे। इसके अलावा, अन्य दो वयस्क शेरों की मौत पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से आयु पूर्ण होने के कारण हुई है, जबकि एक शक्तिशाली शेर की जान अपनी सीमा की रक्षा के लिए हुए आपसी हिंसक टकराव में चली गई है। इन अन्य मौतों का इस वायरस से कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं हुआ है। मुख्य संरक्षक ने यह भी बताया कि घने जंगलों में प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाले शावकों के जीवित रहने की सामान्य दर महज 50 प्रतिशत के आसपास ही होती है। इसके बावजूद, गिर के जंगलों में तैनात आधुनिक ट्रैकर्स, चौबीसों घंटे की जा रही डिजिटल निगरानी और अंतरराष्ट्रीय स्तर की पशु चिकित्सा सुविधाओं के कारण शेरों की असमय मृत्यु दर को काफी हद तक नियंत्रित रखा गया है। वर्तमान में डॉक्टरों की कई विशेष टीमें पूरे क्षेत्र में सक्रिय हैं जो लगातार संदिग्ध जानवरों के रक्त के नमूने लेकर उनकी जांच और उपचार कर रही हैं।
गुजरात के जंगलों में शान से बढ़ रहा है एशियाई शेरों का कुनबा
इन तमाम दुखद घटनाओं के बीच एक सुखद और राहत देने वाला पहलू यह भी है कि गुजरात में एशियाई शेरों की आबादी में पिछले कुछ वर्षों में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है। राज्य के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल द्वारा विधानसभा के पटल पर रखे गए नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार, गुजरात के विभिन्न वन क्षेत्रों में एशियाई शेरों की कुल संख्या अब बढ़कर 891 के जादुई आंकड़े तक पहुंच चुकी है। अगर हम साल 2020 की गणना से इसकी तुलना करें तो उस समय कुल शेरों की संख्या केवल 674 थी, जिसमें अब एक शानदार उछाल देखने को मिला है। वर्तमान में मौजूद 891 शेरों के इस विशाल परिवार में 196 पूर्ण रूप से वयस्क शेर, 330 वयस्क शेरनियां और लगभग 225 नन्हे शावक शामिल हैं जो गुजरात के गौरव को बढ़ा रहे हैं।
इस वन्यजीव गणना को पूरी तरह सटीक और त्रुटिहीन बनाने के लिए वन विभाग ने पिछले दिनों 10 से 13 मई के बीच बेहद आधुनिक और उन्नत तकनीकों का सहारा लिया था, जिसके आधार पर यह नया डेटा जारी किया गया है। आज के समय में गुजरात के 11 प्रमुख जिलों की लगभग 58 तहसीलों में इन शेरों की दहाड़ गूंज रही है। राज्य के सात बड़े जिलों, जिनमें जूनागढ़, गिर सोमनाथ, अमरेली, भावनगर, देवभूमि द्वारका, पोरबंदर और राजकोट शामिल हैं, वहां के जंगलों को इन शेरों ने अपना मुख्य और स्थाई निवास स्थान बना लिया है। सरकार और वन प्रशासन इन सभी क्षेत्रों में शेरों के संरक्षण और उनकी सुरक्षा को और अधिक पुख्ता करने के लिए कई नए वैज्ञानिक कदम उठा रहा है।
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