Dhar Bhojshala

धार भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला को माना वाग्देवी मंदिर

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एजेंसी, धार। Dhar Bhojshala : मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद पर एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने हिंदू पक्ष की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए भोजशाला को ‘वाग्देवी मंदिर’ स्वीकार किया है। वर्षों से चले आ रहे इस संवेदनशील विवाद में पांच मुख्य याचिकाओं और तीन हस्तक्षेप आवेदनों पर विचार करने के बाद दो सदस्यीय खंडपीठ ने यह आदेश जारी किया। फैसले की संवेदनशीलता को देखते हुए धार और इंदौर प्रशासन को पूरी तरह सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम और प्रशासन की अपील

शुक्रवार का दिन होने के कारण, जब परिसर में जुमे की नमाज भी अदा की जाती है, सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक पुख्ता किया गया है। धार के कलेक्टर राजीव रंजन मीना और पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा ने स्वयं मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। जिले भर से करीब 1200 अतिरिक्त पुलिसकर्मियों को सुरक्षा में तैनात किया गया है, जबकि रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) और रिजर्व पुलिस बल को भी अलर्ट पर रखा गया है। पुलिस ने शहर के मुख्य इलाकों में फ्लैग मार्च निकालकर शांति बनाए रखने का संदेश दिया है।

कानूनी लड़ाई और एएसआई सर्वे का आधार

यह विवाद साल 2022 में उस समय न्यायालय की दहलीज पर पहुंचा था जब ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ ने एक याचिका दायर कर भोजशाला का वास्तविक धार्मिक स्वरूप निर्धारित करने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि हिंदुओं को वहां नियमित पूजा का अधिकार दिया जाए, नमाज पर रोक लगाई जाए और एक विशेष ट्रस्ट का गठन किया जाए। इसके साथ ही लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को वापस लाने की भी अपील की गई थी। इस मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने 2024 में 98 दिनों तक विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे किया था, जिसकी रिपोर्ट फैसले का महत्वपूर्ण आधार बनी।

दोनों पक्षों के तर्क और वर्तमान व्यवस्था

हिंदू पक्ष का निरंतर यह दावा रहा है कि भोजशाला प्राचीन काल से ही मां सरस्वती का भव्य मंदिर और विद्या का प्रमुख केंद्र रही है। उन्होंने अपने पक्ष में एएसआई सर्वे की रिपोर्ट, वहां मिले प्राचीन शिलालेखों, स्थापत्य कला के अवशेषों और सदियों पुरानी पूजा परंपराओं का हवाला दिया। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष इसे ‘कमाल मौला मस्जिद’ का हिस्सा बताता रहा है और उनका तर्क था कि धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार केवल सिविल न्यायालय के पास है। वर्ष 2003 से लागू व्यवस्था के अनुसार, यहां हर मंगलवार और वसंत पंचमी पर हिंदू समाज पूजा करता था, जबकि शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज की अनुमति दी जाती थी।

ऐतिहासिक निर्णय के मायने

हाईकोर्ट के इस फैसले को हिंदू पक्ष के लिए एक बड़ी कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है। जनवरी 2026 में वसंत पंचमी के अवसर पर उच्चतम न्यायालय ने भी वहां निर्बाध पूजा की अनुमति दी थी, जिससे हिंदू पक्ष के दावों को बल मिला था। अब उच्च न्यायालय द्वारा इसे मंदिर माने जाने के बाद, परिसर के भविष्य के प्रबंधन और वहां की पूजा पद्धतियों में बड़े बदलाव आने की संभावना है। प्रशासन ने आम जनता से सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार की भ्रामक जानकारी साझा न करने और कानून व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग देने की अपील की है।

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