एजेंसी, तमिलनाडु। Tamil Nadu Cow Slaughter Ban : देश की सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय लेते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें प्राधिकारियों को कड़े निर्देश दिए गए थे। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में तमिलनाडु सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि बकरीद अथवा वर्ष के किसी भी अन्य दिन राज्य की भौगोलिक सीमा के भीतर गायों और बछड़ों का वध पूरी तरह प्रतिबंधित रहे। इस विषय पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि उच्च न्यायालय द्वारा पारित किए गए इस फैसले में कानूनी दृष्टिकोण से बड़े सुधार और संशोधन की तत्काल आवश्यकता है।
#BREAKING: The Supreme Court has stayed the Madras High Court’s order imposing a complete ban on cow slaughter in Tamil Nadu. The Tamil Nadu government had challenged the High Court’s ruling, arguing that it was contrary to the provisions of the Tamil Nadu Animal Preservation… pic.twitter.com/svaucKVtKP
— IANS (@ians_india) July 13, 2026
तमिलनाडु सरकार की दलीलों के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जारी किया नोटिस
तमिलनाडु की राज्य सरकार ने मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा 27 मई को दिए गए इस फैसले के विरुद्ध शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था और एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। राज्य सरकार की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष यह ठोस तर्क प्रस्तुत किया कि वर्तमान में लागू कानून के तहत एक निश्चित और निर्धारित श्रेणी के गोवंश के वध की कानूनी रूप से स्पष्ट अनुमति प्राप्त है, बशर्ते वह सरकार द्वारा अधिकृत वधशालाओं में ही किया जाए। याचिका में आगे कहा गया कि जब राज्य का मूल कानून स्वयं कुछ परिस्थितियों में इसकी इजाजत देता है, तब उच्च न्यायालय का ऐसा पूर्ण प्रतिबंधात्मक निर्देश स्थापित कानूनी प्रावधानों के पूरी तरह विपरीत और असंगत है, जिसे किसी भी स्थिति में कायम नहीं रखा जा सकता। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने आज संबंधित पक्षों को आधिकारिक नोटिस जारी करते हुए उच्च न्यायालय के क्रियान्वयन पर तुरंत रोक लगा दी।
मद्रास उच्च न्यायालय ने धार्मिक त्योहार से ठीक पूर्व दिया था आदेश
मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 27 मई को, यानी बकरीद के पवित्र त्योहार से ठीक 1 दिन पहले, राज्य प्रशासन को यह कड़ा निर्देश जारी किया था कि किसी भी धार्मिक त्योहार या सामान्य दिनों में गायों और बछड़ों की कुर्बानी पर पूर्ण लगाम लगाई जाए। इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति वी लक्ष्मीनारायण की पीठ ने भारत के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का विस्तृत उल्लेख किया था। उन्होंने अपने आदेश में रेखांकित किया था कि भारत के संविधान को आकार देने वाली संविधान सभा की ऐतिहासिक बहसों में भी इस बात को प्रमुखता से स्वीकार किया गया था कि गाय संपूर्ण भारतवर्ष में अत्यंत पूजनीय और श्रद्धेय मानी जाती है। न्यायालय ने यह भी कहा था कि गोवंश द्वापर युग में भगवान कृष्ण के समय से ही हमारी समृद्ध सनातन संस्कृति और सभ्यता का एक अभिन्न हिस्सा रहा है, यहाँ तक कि इतिहास के पन्नों में दर्ज कई मुस्लिम शासकों ने भी जनभावनाओं का आदर करते हुए गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी गोवंश के संरक्षण को देश की उन्नति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते थे।
संवैधानिक अनुच्छेदों और राज्य के नियमों का दिया गया था हवाला
अपने पूर्व के फैसले का कानूनी आधार स्पष्ट करते हुए उच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान के भाग 4 में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत आने वाले अनुच्छेद 48 का विशेष रूप से संदर्भ दिया था। यह अनुच्छेद राज्य सरकारों को यह संवैधानिक दायित्व सौंपता है कि वे गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और कृषि कार्य में उपयोगी पशुओं की नस्लों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए उचित एवं प्रभावी कदम उठाएं। इसके साथ ही अदालत ने तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम 1958 की धारा 4 के वैधानिक प्रावधानों की भी याद दिलाई थी, जिसके अनुसार केवल 10 वर्ष से अधिक आयु के और प्रजनन या काम के पूरी तरह अयोग्य हो चुके पशुओं को ही पशु चिकित्सक के आधिकारिक प्रमाण पत्र के बाद काटा जा सकता है। अदालत का यह स्पष्ट मत था कि इस नियम की व्याख्या अत्यंत कड़ाई से की जानी चाहिए ताकि स्वस्थ पशुओं की रक्षा हो सके। इसके अतिरिक्त, अदालत ने जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए यह भी अनिवार्य किया था कि यदि किसी भी पशु की कुर्बानी दी जाती है, तो वह केवल सरकार द्वारा निर्धारित और साफ-सुथरी जगहों पर ही होनी चाहिए, किसी भी खुले सार्वजनिक स्थान, रिहायशी इलाकों या सड़कों पर ऐसा करना पूरी तरह गैर-कानूनी होगा।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी पशु वध नियमावली पर की थी तल्ख टिप्पणी
धार्मिक अवसरों पर होने वाले पशु वध को लेकर देश के एक और बड़े न्यायालय, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी 20 मई को एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी आदेश पारित किया था। उस दौरान न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जारी की गई पशु वध संबंधी आधिकारिक मार्गदर्शिका पर रोक लगाने से पूरी तरह इनकार कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल और न्यायाधीश पार्थ सारथी की खंडपीठ ने अत्यंत कड़े शब्दों में स्पष्ट किया था कि राज्य की सीमा में बिना किसी वैध और प्रमाणित स्वास्थ्य प्रमाण पत्र के किसी भी गाय, भैंस, बैल या बछड़े का वध करना कानूनन अपराध की श्रेणी में आएगा। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी जोड़ा था कि खुले और आम जनता के उपयोग वाले सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार के पशु का वध पूरी तरह से वर्जित है और ईद-उल-जुहा जैसे पवित्र त्योहारों के अवसर पर गाय की ही कुर्बानी दिया जाना इस्लाम मजहब का कोई अनिवार्य या अपरिहार्य हिस्सा नहीं माना जा सकता।
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