जल प्रबंधन का संकल्प

मुख्यमंत्री द्वारा आपदा में अवसर और सुदृढ़ जल प्रबंधन का संकल्प

Blog

मुख्यमंत्री द्वारा आपदा में अवसर और सुदृढ़ जल प्रबंधन का संकल्प

​मध्यप्रदेश में मानसून की देरी और अल्पवर्षा के पूर्वानुमान के बीच राज्य सरकार द्वारा की जा रही अग्रिम तैयारियां प्रशासनिक दूरदर्शिता और जन-कल्याण के प्रति संवेदनशीलता का एक जीवंत उदाहरण पेश करती हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई हालिया उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार चुनौतियों को केवल संकट के रूप में नहीं, बल्कि व्यवस्थागत सुधार, आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और किसान-समृद्धि के एक नए अवसर के रूप में देख रही है। किसी भी आपदा या प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने के लिए समय से पूर्व की गई तैयारी आधी सफलता के बराबर होती है, और मध्यप्रदेश सरकार ने इसी सिद्धांत को आत्मसात करते हुए एक बेहद व्यावहारिक और व्यापक कार्य योजना की नींव रखी है। मुख्यमंत्री का यह आह्वान अत्यंत प्रेरणादायी है कि अल्पवर्षा की स्थिति को एक चुनौती के बजाय बेहतर योजना, वैज्ञानिक कृषि और समयबद्ध तैयारियों के अवसर के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। यह सकारात्मक दृष्टिकोण न केवल प्रशासनिक तंत्र में नई ऊर्जा का संचार करता है, बल्कि प्रदेश के अन्नदाताओं के भीतर भी एक नया आत्मविश्वास जगाता है कि सरकार उनके साथ हर कदम पर मुस्तैदी से खड़ी है।

​इस पूरी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण और सराहनीय पहलू किसानों की आय को सुरक्षित रखना और कृषि उत्पादन पर किसी भी प्रकार के प्रतिकूल प्रभाव को रोकना है। सरकार ने इसके लिए वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और परंपरागत समझ के बेहतरीन तालमेल पर जोर दिया है। कृषि वैज्ञानिकों और विषय विशेषज्ञों के सुझावों को सीधे खेतों तक पहुंचाने की जो योजना बनाई गई है, वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करेगी। किसानों को कम पानी और कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों, जैसे ज्वार, बाजरा, उड़द, मूंग, तुअर और कोदो-कुटकी जैसी मोटे अनाजों और दलहनी फसलों को अपनाने के लिए प्रेरित करना एक युगांतकारी कदम साबित हो सकता है। ‘श्रीअन्न’ या मोटे अनाज न केवल पोषण से भरपूर होते हैं, बल्कि वे विपरीत मौसम में भी न्यूनतम पानी के साथ बेहतर उत्पादन देने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। सरकार द्वारा इन फसलों को प्रोत्साहन देने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर इनके उपार्जन की गारंटी देने से किसानों को आर्थिक सुरक्षा का एक ठोस भरोसा मिलेगा, जिससे वे बिना किसी डर के इन फसलों को अपना सकेंगे। यह दूरगामी सोच प्रदेश में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाए रखने में भी मील का पत्थर साबित होगी।
​प्रशासनिक स्तर पर किसानों को जल्दबाजी में बुआई न करने की सलाह देना और खेतों में पर्याप्त नमी बनने के बाद ही बोनी करने के लिए जागरूक करना यह दर्शाता है कि सरकार केवल कागजी योजनाएं नहीं बना रही, बल्कि धरातल की वास्तविकताओं से गहराई से जुड़ी हुई है। कृषि विस्तार तंत्र को सक्रिय कर आधुनिक कृषि तकनीकों और उन्नत बीजों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने के निर्देश सीधे तौर पर कृषि लागत को कम करने और उत्पादकता बढ़ाने में सहायक होंगे। इसके साथ ही, धान के क्षेत्रों में सीधी बुवाई (डीएसआर) और वैकल्पिक गीला-सूखा पद्धति जैसी तकनीकों का समावेश पानी की एक-एक बूंद के विवेकपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करेगा। हर जिले के लिए विशिष्ट ‘कंटिन्जेंसी क्रॉप प्लान’ यानी आकस्मिक फसल योजना तैयार करना इस बात का प्रमाण है कि हर क्षेत्र की स्थानीय भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के अनुरूप रणनीतियां बनाई जा रही हैं, जिससे विफलता की गुंजाइश न्यूनतम हो जाती है।
​जल प्रबंधन के क्षेत्र में सरकार ने न केवल तात्कालिक संकट से निपटने के इंतजाम किए हैं, बल्कि अगले दो वर्षों की एक सुदृढ़ और दीर्घकालिक कार्य योजना भी प्रस्तुत की है। शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। नगरीय निकायों में वैकल्पिक जल स्रोतों की पहचान और अमृत 2.0 के तहत जलप्रदाय योजनाओं को समय पर पूरा करने का संकल्प शहरी आबादी को जल संकट से पूरी तरह सुरक्षित रखेगा। वहीं दूसरी ओर, ग्रामीण अंचलों में जल जीवन मिशन की ग्रामवार समीक्षा और बंद पड़ी या अपूर्ण नल-जल योजनाओं की मरम्मत के लिए 90 दिवसीय विशेष अभियान ग्रामीण जीवन को सुगम बनाने की दिशा में एक बड़ा क्रांतिकारी कदम है। पानी की कमी के समय ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति को सुचारू रखना एक बड़ी चुनौती होती है, लेकिन समय रहते शुरू किया जा रहा यह अभियान संकट की हर आशंका को समाप्त कर देता है।
​लंबे समय के जल संरक्षण के लिए ‘जलाभिषेक 2.0’ अभियान के अंतर्गत पुराने तालाबों, बावड़ियों, कुओं और अन्य पारंपरिक जल संरचनाओं का सर्वे और जीर्णोद्धार करने का निर्णय हमारी समृद्ध जल विरासत को पुनर्जीवित करने जैसा है। मनरेगा के अभिसरण से प्रत्येक विकासखंड में न्यूनतम 100 जल संरचनाओं का पुनर्जीवन दो वर्षों के भीतर करने का लक्ष्य जल स्वावलंबन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध होगा। इसके समांतर, भूजल पुनर्भरण अभियान के तहत रिचार्ज शाफ्ट, चेक डैम, स्टॉप डैम और खेत-तालाब निर्माण को मिशन मोड पर लागू करना भूमिगत जल स्तर को सुधारने में व्यापक भूमिका निभाएगा। ‘खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में’ का यह अनुपम सिद्धांत न केवल एक नारा है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता का वह मूलमंत्र है जो ग्रामीण भारत को हमेशा से समृद्ध बनाए हुए था और आज इसे आधुनिक तकनीक के साथ पुनः लागू किया जा रहा है। रबी सीजन से पहले ही नहरों की सफाई और मरम्मत कार्य को पूरा करने तथा टेल-एंड यानी अंतिम छोर के किसान तक पानी पहुंचाने की जवाबदेही तय करना प्रशासनिक पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की एक अनूठी मिसाल पेश करता है।
​जलाशयों और जलविद्युत के बेहतर प्रबंधन के लिए इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, बाणसागर और गांधीसागर जैसे बड़े बांधों के लिए ‘रूल कर्व’ का कड़ाई से पालन करने का निर्णय पानी के वैज्ञानिक और अनुशासित उपयोग को रेखांकित करता है। सरकार ने जल उपयोग की प्राथमिकताओं को जिस स्पष्टता के साथ तय किया है—जिसमें सबसे पहले पेयजल, फिर सिंचाई और उसके बाद विद्युत उत्पादन का प्रोटोकॉल शामिल है—वह जनहित को सर्वोपरि रखने की नीति की पुष्टि करता है। संकट के समय प्राथमिकताओं का यह निर्धारण किसी भी प्रकार के भ्रम या अव्यवस्था को रोकने में बेहद कारगर साबित होगा। आधुनिक तकनीक का लाभ उठाते हुए रियल-टाइम मॉनिटरिंग और पूर्व चेतावनी प्रणाली के लिए राज्य स्तरीय जल डैशबोर्ड का निर्माण शासन व्यवस्था में तकनीकी दक्षता और तत्परता का संचार करेगा। इससे पानी की उपलब्धता और मांग पर हर पल नजर रखी जा सकेगी और जरूरत के मुताबिक तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जा सकेंगे।
​इस पूरी महायोजना की सबसे बड़ी ताकत जनभागीदारी को माना गया है। ‘जल गंगा संवर्धन’ की तर्ज पर जनभागीदारी आधारित सतत अभियान चलाने की घोषणा यह स्पष्ट करती है कि जल संरक्षण केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि इसे एक जन आंदोलन का रूप दिया जा रहा है। जब समाज स्वयं अपनी जल संरचनाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए आगे आता है, तो वे प्रयास न केवल सफल होते हैं बल्कि स्थायी भी बन जाते हैं। प्रत्येक जिले में कलेक्टर की अध्यक्षता में जल संकट आकस्मिक योजना का निर्माण स्थानीय प्रशासन को स्वायत्तता और तात्कालिक निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करेगा, जिससे किसी भी आपात स्थिति में प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सरकार की यह चौतरफा और बहुआयामी तैयारी इस बात का जीवंत साक्ष्य है कि यदि इच्छाशक्ति दृढ़ हो और योजना वैज्ञानिक व समयबद्ध हो, तो प्रकृति की अनिश्चितताओं को भी समृद्धि के नए मार्ग में बदला जा सकता है। यह सकारात्मक और पूर्व-नियोजित प्रयास निश्चित रूप से प्रदेश के कृषि परिदृश्य को एक नई दिशा देगा और किसानों के हितों की रक्षा करते हुए राज्य की प्रगति को निर्बाध गति प्रदान करेगा।

ये भी पढ़ें : मुख्यमंत्री द्वारा सिवनी में आर्थिक और सामाजिक उन्नति की इबारत

ताज़ा अपडेट और ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें और STPV.live के साथ अपडेट रहें

Leave a Reply