एमपी के सीएम ने

प्रधानमंत्री की अपील को देश हित में आत्मसात किया एमपी के सीएम ने

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प्रधानमंत्री की अपील को देश हित में आत्मसात किया एमपी के सीएम ने

राजनीति और सत्ता के गलियारों में अक्सर चमक-दमक, वीआईपी संस्कृति और भारी-भरकम प्रोटोकॉल का बोलबाला देखने को मिलता है। जब भी किसी प्रदेश के मुखिया का दौरा होता है, तो अमूमन सड़कों पर सन्नाटा पसरा दिया जाता है, गाड़ियों का लंबा काफिला हूटर बजाते हुए निकलता है और सुरक्षा के ऐसे अभेद्य घेरे तैयार किए जाते हैं जो आम आदमी को व्यवस्था से कोसों दूर कर देते हैं। लेकिन समय-समय पर भारतीय लोकतंत्र में ऐसी अनुकरणीय घटनाएं भी सामने आती हैं, जो यह साबित करती हैं कि सत्ता का वास्तविक अर्थ जनसेवा और सादगी में ही निहित है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा हाल ही में सिंगरौली जिले के प्रवास के दौरान पेश की गई सादगी की मिसाल इसी विमर्श को एक नई और सकारात्मक दिशा देती है। उनका यह कदम न केवल समकालीन राजनीति के लिए एक मार्गदर्शक का काम करता है, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन में शुचिता और मितव्ययिता के महत्व को भी रेखांकित करता है।

​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा से सार्वजनिक जीवन में मितव्ययिता, सादगी और अनुशासन की अपील की है। उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि जनप्रतिनिधियों को जनता से कटना नहीं चाहिए, बल्कि उनके बीच का ही एक हिस्सा बनकर रहना चाहिए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सिंगरौली आगमन पर प्रधानमंत्री की इसी दूरदर्शी अपील को न केवल आत्मसात किया, बल्कि उसे धरातल पर उतारकर भी दिखाया। सिंगरौली पहुंचते ही जब उन्होंने अपने पारंपरिक आलीशान काफिले को पूरी तरह त्याग दिया और अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ एक सामान्य टूरिस्ट बस में बैठकर कार्यक्रम स्थल एनसीएल ग्राउंड की ओर रुख किया, तो उन्होंने एक मूक लेकिन बेहद शक्तिशाली संदेश दिया। यह संदेश था कि किसी भी जनप्रतिनिधि की असली पहचान भव्य प्रोटोकॉल या गाड़ियों की कतारों से नहीं होती, बल्कि जनता के प्रति उसके प्रेम, समर्पण और उसकी निष्काम सेवा से होती है।
​एक ऐसे दौर में जहां छोटे-छोटे पदों पर बैठे लोग भी वीआईपी दर्जे का लाभ उठाने के लिए लालायित रहते हैं, वहां सूबे के मुख्यमंत्री का बस में सफर करना भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की जड़ों को मजबूत करता है। इस यात्रा में मुख्यमंत्री अकेले नहीं थे। उनके साथ बस में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री एवं जिले की प्रभारी मंत्री संपतिया उइके, पंचायत एवं ग्रामीण विकास राज्यमंत्री राधा सिंह, सांसद डॉ. राजेश मिश्रा सहित क्षेत्र के तमाम विधायक रामनिवास शाह, राजेंद्र मेश्राम, कुंवर सिंह टेकाम, विश्वामित्र पाठक और विभिन्न मंडलों व प्राधिकरणों के पदाधिकारी भी शामिल थे। पूरी कैबिनेट और क्षेत्रीय नेतृत्व को एक ही बस में सवार देखकर आम जनता के बीच यह विश्वास गहरा हुआ कि उनकी सरकार वाकई उनके कितनी करीब है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर इस तरह एक साथ चलते हैं, तो इससे प्रशासनिक मशीनरी में भी सादगी और जनता के प्रति जवाबदेही का एक सकारात्मक संदेश जाता है।
​मुख्यमंत्री डॉ. यादव का यह सहज और सरल अंदाज सिंगरौली के नागरिकों को गहराई तक छू गया। जब आम लोगों ने देखा कि उनका नेतृत्व करने वाले जनसेवक किसी अभेद्य किले जैसी सुरक्षा व्यवस्था के बजाय उनके सामने एक सामान्य बस से उतर रहे हैं, तो जनता का उत्साह और उनके प्रति सम्मान और अधिक बढ़ गया। यह वाकया साफ तौर पर दर्शाता है कि लोकतंत्र में जनता और उसके प्रतिनिधियों के बीच कोई दूरी नहीं होनी चाहिए। जब वीआईपी संस्कृति का यह आवरण हटता है, तभी संवाद के नए रास्ते खुलते हैं और जनता को यह महसूस होता है कि सरकार उनकी अपनी है। डॉ. मोहन यादव ने अपने इस व्यवहार से यह सिद्ध कर दिया कि नेतृत्व का बड़प्पन इस बात में नहीं है कि आप जनता से कितने ऊंचे स्थान पर बैठे हैं, बल्कि इस बात में है कि आप उनके कितने करीब आ सकते हैं।
​इस कदम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू मितव्ययिता भी है। वीआईपी दौरों में लगने वाले बड़े काफिलों, सुरक्षा व्यवस्थाओं और यातायात के रूट डायवर्जन के कारण न केवल सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है, बल्कि आम जनता को भी आवाजाही में भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है। कई बार घंटों तक ट्रैफिक रोके जाने के कारण एंबुलेंस और रोजमर्रा के काम पर निकलने वाले लोग परेशान होते हैं। मुख्यमंत्री द्वारा काफिले का परित्याग करने से जहां एक ओर सरकारी संसाधनों की बचत हुई, वहीं दूसरी ओर आम नागरिकों को किसी भी प्रकार की असुविधा से मुक्ति मिली। यह निर्णय दिखाता है कि यदि नेतृत्व में इच्छाशक्ति हो, तो बिना व्यवस्था को प्रभावित किए भी सादगीपूर्ण तरीके से बड़े आयोजनों को संपन्न किया जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी के उस दृष्टिकोण की यह सबसे सुंदर प्रस्तुति है, जिसमें जनप्रतिनिधियों को अनुशासन और जनता के धन की सूझबूझ से रक्षा करने की प्रेरणा दी जाती है।
​यह घटना केवल एक दिन की सुर्खी या कोई प्रतीकात्मक कदम मात्र नहीं है, बल्कि इसे भारतीय राजनीति में आ रहे एक बड़े सांस्कृतिक बदलाव के रूप में देखा जाना चाहिए। यह इस बात का प्रतीक है कि अब राजनीति का मिजाज बदल रहा है और जनता अब दिखावे के बजाय धरातल पर काम करने वाले और सहज सुलभ रहने वाले नेताओं को पसंद करती है। डॉ. मोहन यादव का यह आचरण अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों और जनप्रतिनिधियों के लिए भी एक रोल मॉडल की तरह है। जब प्रदेश का मुखिया खुद को ‘प्रधान सेवक’ की भूमिका में ढाल लेता है, तो नीचे तक की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था में संवेदनशीलता और विनम्रता का संचार होता है। सादगी का यह संदेश सिंगरौली की धरती से निकलकर पूरे देश के राजनीतिक परिदृश्य को यह याद दिलाता है कि सत्ता का वास्तविक वैभव जनता के दिलों में जगह बनाने से मिलता है, न कि लाल बत्ती या हूटर की आवाजों से।
​अंततः, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का यह कदम हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को और अधिक जीवंत और जन-उन्मुख बनाता है। उन्होंने यह साबित किया कि पद और प्रतिष्ठा अस्थाई होते हैं, लेकिन जनता के साथ बनाया गया आत्मीय संबंध स्थाई होता है। सादगी, अनुशासन, मितव्ययिता और जनसेवा के जिन मूल्यों को उन्होंने सिंगरौली के इस प्रवास में प्रदर्शित किया, वे भविष्य की राजनीति के लिए एक नई और प्रेरणादायक लकीर खींचते हैं। इस तरह के प्रयास ही लोकतंत्र में जनता के विश्वास को अटूट बनाए रखते हैं और यह आश्वस्त करते हैं कि देश का नेतृत्व सही हाथों में है, जो जनता की भलाई के लिए अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़ने में तनिक भी संकोच नहीं करता।

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