एजेंसी, जबलपुर। Kanha Tiger Reserve : मध्य प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध कान्हा टाइगर रिजर्व से वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों को झकझोर देने वाली बेहद दुखद खबर सामने आई है। यहाँ महज एक महीने के भीतर आठ राष्ट्रीय पशु बाघों की अचानक हुई मौतों ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को बेहद चिंतित और सख्त कर दिया है। अदालत ने इसे वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बहुत ही गंभीर संकट मानते हुए केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय और राज्य सरकार के वन विभाग को संयुक्त रूप से बेहद कड़े और प्रभावी कदम उठाने के निर्देश जारी किए हैं। इसके साथ ही न्यायालय ने इस खतरनाक वायरस के प्रसार को रोकने के लिए अब तक उठाए गए कदमों का पूरा लेखा-जोखा भी तलब किया है।
जानलेवा बीमारी के कारण हुआ भारी नुकसान, प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल
उच्च न्यायालय के प्रशासनिक न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई करते हुए बहुत कड़े शब्दों में कहा कि देश की इस अमूल्य राष्ट्रीय धरोहर को इस तरह असमय खोया नहीं जा सकता। अदालत ने साफ किया कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और प्रोजेक्ट टाइगर द्वारा निर्धारित सभी कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का बिना किसी लापरवाही के जमीनी स्तर पर कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए। कान्हा में इन बाघों की रहस्यमयी और अचानक हुई मौतों की मुख्य वजह कैनाइन डिस्टेंपर वायरस नाम का एक बेहद घातक और संक्रामक रोग माना जा रहा है।
आवारा कुत्तों को अलग रखने और वायरस के स्रोत की जांच के कड़े निर्देश
खंडपीठ ने विशेष रूप से चिंता जताते हुए सरकारों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि अभयारण्य के आसपास और भीतर रहने वाले आवारा कुत्तों, जो इस जानलेवा वायरस के मुख्य वाहक और स्रोत माने जाते हैं, उनको जंगलों से दूर करने या उन्हें क्वारंटीन करने के लिए प्रशासन द्वारा क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के गांवों में पशुओं की चिकित्सा जांच और रोग निगरानी के लिए कौन से रक्षात्मक उपाय लागू किए गए हैं, इस पर अदालत ने विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। इस बेहद महत्वपूर्ण मामले की अगली कड़क सुनवाई के लिए आगामी नौ जुलाई की तारीख तय की गई है।
जनहित याचिका ने खोली वन्यजीव स्वास्थ्य प्रबंधन तंत्र की पोल
यह पूरा मामला मुंबई के रहने वाले प्रसिद्ध कानूनविद और अधिवक्ता सुब्रत चक्रवर्ती द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका के माध्यम से अदालत के सामने आया। याचिका में यह बेहद सनसनीखेज दावा किया गया है कि अप्रैल और मई दो हजार छब्बीस के महीनों के दौरान कान्हा के जंगलों में कई बाघों की मृत्यु बेहद असामान्य और संदिग्ध परिस्थितियों में हुई। मरने वाले इन बाघों में प्रसिद्ध बाघिन टी-122 जिसे स्थानीय लोग सुनैना कहते थे, बाघिन टी-141 उर्फ अमाही, उसके चार छोटे-छोटे लाडले शावक और एक बेहद फुर्तीला युवा नर बाघ टी-220 जिसे महावीर के नाम से जाना जाता था, शामिल हैं। इसके अलावा वन विभाग को इसी अवधि में दो अन्य वयस्क बाघों के शव भी क्षत-विक्षत हालत में मिले थे।
वन्यजीव संरक्षण कानूनों और वैज्ञानिक निगरानी पर खड़े हुए गंभीर प्रश्न
अदालत में याचिकाकर्ता का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने पुरजोर तरीके से तर्क दिया कि देश में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 जैसे बेहद मजबूत और कड़े कानून मौजूद हैं। इसके बावजूद कान्हा जैसे बड़े और सुरक्षित माने जाने वाले राष्ट्रीय उद्यान के भीतर जैव-सुरक्षा और पशु चिकित्सा प्रबंधन की व्यवस्था इतनी लाचार क्यों साबित हुई। लगातार हो रही इन मौतों ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के उन दावों पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं, जिसमें बाघों की वैज्ञानिक तरीके से चौबीसों घंटे निगरानी करने और उनके आवास प्रबंधन को दुरुस्त रखने की बातें कही जाती हैं। उच्च न्यायालय ने भी माना कि इस राष्ट्रीय धरोहर की सुरक्षा में किसी भी प्रकार की मानवीय या प्रशासनिक चूक को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बालाघाट में वन विभाग की बड़ी कामयाबी, खरीदार बनकर तस्करों को दबोचा
इसी वन क्षेत्र से जुड़ी एक और बड़ी और चौंकाने वाली कामयाबी मध्य प्रदेश के ही बालाघाट जिले से सामने आई है, जहां वन विभाग के सतर्क दस्ते ने बाघों के अंगों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करी करने वाले एक बहुत बड़े गिरोह का पर्दाफाश किया है। वन विभाग की टीम ने वन्यजीवों के अंगों के सौदागरों को पकड़ने के लिए खुद एक छद्म खरीदार का रूप धारण किया और जाल बिछाकर छह बड़े तस्करों को रंगे हाथों दबोच लिया। वन अमले ने इन आरोपियों के गुप्त ठिकानों से दो वयस्क बाघों के पूरे के पूरे कंकाल और उनकी हड्डियां बरामद करने का दावा किया है। प्रथम दृष्टया इन अवशेषों को देखकर आशंका जताई जा रही है कि इन बाघों का शिकार जहर देकर या जाल बिछाकर किया गया था।
मंडला और बालाघाट के छह आरोपी सलाखों के पीछे, बड़े नेटवर्क की तलाश
पकड़े गए इन शातिर शिकारियों और तस्करों की पहचान मंडला जिले के बिछिया निवासी रामलाल टेकाम, दशरथ परते तथा बालाघाट के परसवाड़ा क्षेत्र के रहने वाले भीम सिंह परते, रवींद्र सोनकुसरे, राजकुमार सोनकुसरे और देवीदयाल ढोढरे के रूप में की गई है। शुरुआती पूछताछ में इन आरोपियों ने कुबूल किया है कि वे बरामद हड्डियों में से एक बाघ का कंकाल मंडला जिले के बम्हनी बंजर के घने जंगलों से लेकर आए थे, जबकि दूसरे कंकाल के स्रोत के बारे में वे लगातार अपने बयान बदल रहे हैं। वन विभाग ने इन सभी अवशेषों को सील कर दिया है और उनकी सटीक वैज्ञानिक पुष्टि के लिए उन्हें उच्च स्तरीय फोरेंसिक प्रयोगशाला भेजने की तैयारी कर ली है। फिलहाल प्रशासन इन पकड़े गए आरोपियों के मोबाइल रिकॉर्ड और उनके बाहरी राज्यों में फैले बड़े तस्करी नेटवर्क की जड़ों को खंगालने में जुटा हुआ है।
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