DRDO Missile Test

भारत ने रचा नया सैन्य इतिहास : 5000 किलोमीटर दूर से आने वाली दुश्मन की मिसाइलों को पलक झपकते ही हवा में नष्ट करेगा स्वदेशी सुरक्षा कवच

ओडिशा राष्ट्रीय

एजेंसी, बालासोर। DRDO Missile Test : भारत ने रक्षा और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में एक अत्यंत विशाल और ऐतिहासिक कामयाबी हासिल करते हुए अपने रक्षा तंत्र को पूरी तरह अभेद्य बना लिया है। देश की सुरक्षा को शीर्ष स्तर पर ले जाते हुए रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ ने लगातार दो दिनों तक तीन बेहद महत्वपूर्ण और सफल सैन्य परीक्षण किए हैं। इन सफल परीक्षणों के जरिए भारत ने अपनी बहुस्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली की ताकत का पूरी दुनिया के सामने लोहा मनवाया है। इस आधुनिक और स्वदेशी तकनीक के सफल होने के बाद अब भारतीय सेना पांच हजार किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी से आने वाली किसी भी दुश्मन देश की अत्यंत खतरनाक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों को रास्ते में ही रोककर पूरी तरह से बेअसर और तबाह करने में सक्षम हो गई है। देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शनिवार को इस बेजोड़ तकनीकी कामयाबी की बेहद शानदार तस्वीरें अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर जारी करते हुए पूरे देश को बधाई दी और वैज्ञानिकों की पीठ थपथपाई। इस बड़ी सफलता के साथ ही भारत दुनिया के उन बेहद चुनिंदा और शक्तिशाली देशों की कतार में आकर खड़ा हो गया है जिनके पास युद्ध के मैदान में पूरी तरह से काम करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली मौजूद है। भारत से पहले यह अद्वितीय सैन्य क्षमता केवल अमेरिका, रूस, इजराइल और चीन जैसे महाशक्तिशाली देशों के पास ही उपलब्ध थी और अब भारत इस विशिष्ट क्लब में शामिल होने वाला दुनिया का पांचवां गौरवशाली देश बन चुका है।

क्या होती है अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल और क्यों है यह खतरनाक

इस ऐतिहासिक परीक्षण की अहमियत को समझने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल आखिर क्या होती है। बेहद सरल और आम बोलचाल की भाषा में कहें तो यह बहुत ही लंबी दूरी तक अचूक मार करने वाला एक आक्रामक सैन्य हथियार है। इस मिसाइल की मारक क्षमता इतनी भयावह होती है कि यह एक महाद्वीप से उड़ान भरकर दूसरे महाद्वीप में स्थित किसी भी शहर को पूरी तरह से तबाह कर सकती है। आमतौर पर पांच हजार पांच सौ किलोमीटर से भी ज्यादा की दूरी तक मार करने वाली इन मिसाइलों का इस्तेमाल परमाणु हथियारों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाता है। इसकी मारक प्रक्रिया अंतरिक्ष रॉकेट की तरह होती है, जो पहले बेहद तीव्र गति से आसमान को चीरते हुए अंतरिक्ष की तरफ ऊपर जाती है और फिर वहां से गुरुत्वाकर्षण की मदद से पृथ्वी के वातावरण में वापस लौटकर अविश्वसनीय गति से अपने तय लक्ष्य पर काल बनकर टूटती है। इसी अत्यधिक रफ्तार और ऊँचाई के कारण इसे दुनिया के सबसे जानलेवा और अचूक रणनीतिक हथियारों में गिना जाता है, जिसका मुकाबला करना बेहद कठिन माना जाता है।

कैसे अभेद्य दीवार की तरह काम करता है यह बहुस्तरीय सुरक्षा तंत्र

इस आधुनिक स्वदेशी मिसाइल रक्षा प्रणाली की कार्यप्रणाली बेहद अनूठी और अचूक है। इसका मुख्य और एकमात्र उद्देश्य दुश्मन देश की तरफ से दागी गई किसी भी मिसाइल को भारतीय सीमा या उसके तय लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही आसमान के ऊंचे घेरे में मार गिराना है। यह सुरक्षा तंत्र मुख्य रूप से कई अलग-अलग चरणों में एक साथ काम करता है। सबसे पहले देश की सीमाओं पर तैनात बेहद शक्तिशाली और आधुनिक रडार आसमान में किसी भी संदिग्ध मिसाइल की हलचल का तुरंत पता लगा लेते हैं। इसके बाद सेना का मुख्य कमान केंद्र उस आने वाले खतरे की गति और दिशा का सटीक आकलन करता है। जैसे ही खतरे की पुष्टि होती है, भारत की तरफ से एक अत्यंत तेज गति वाली बचावकारी इंटरसेप्टर मिसाइल को हवा में छोड़ दिया जाता है। यह इंटरसेप्टर मिसाइल पलक झपकते ही हवा में जाकर दुश्मन की मिसाइल से टकराती है और उसे लक्ष्य से सैकड़ों किलोमीटर दूर ही नष्ट कर देती है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसका बहुस्तरीय होना है, जिसका मतलब यह है कि अगर किसी वजह से पहली बचावकारी मिसाइल अपने लक्ष्य को भेदने में चूक भी जाती है, तो सुरक्षा की दूसरी परत तुरंत सक्रिय हो जाती है और दुश्मन की मिसाइल का बचना नामुमकिन हो जाता है।

समुद्र में भी बढ़ी भारत की प्रहार क्षमता

ओडिशा के चांदीपुर तट पर स्थित सैन्य रेंज में आयोजित किए गए इन महत्वपूर्ण परीक्षणों के दौरान वैज्ञानिकों ने न केवल मिसाइल रोधी प्रणाली को जांचा, बल्कि इसके साथ ही नौसेना के इस्तेमाल में आने वाली मध्यम दूरी की एंटी-शिप मिसाइल का भी एक और बेहद कामयाब परीक्षण पूरा किया। समुद्र से जहाजों को नष्ट करने वाली इस आधुनिक मिसाइल के सफल परीक्षण को भारत की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और समंदर में दुश्मन पर हमला करने की सैन्य क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक बहुत बड़ी और युगांतरकारी उपलब्धि माना जा रहा है। डीआरडीओ के वैज्ञानिकों के अनुसार इससे पहले भारत ने अपनी मिसाइल रक्षा प्रणाली के दूसरे चरण का भी सफल परीक्षण किया था, जिसके तहत धामरा के पास स्थित लॉन्चिंग कॉम्प्लेक्स से एक नकली दुश्मन मिसाइल छोड़ी गई थी जिसे जमीन और समंदर पर तैनात रडार प्रणालियों ने तुरंत पकड़कर नष्ट कर दिया था।

परीक्षण को सुरक्षित बनाने के लिए खाली कराए गए ग्यारह गांव

इस बेहद विशाल और संवेदनशील सैन्य परीक्षण को पूरी तरह से सुरक्षित माहौल में संपन्न कराने के लिए प्रशासन और रक्षा विभाग को बेहद कड़े कदम उठाने पड़े थे। ओडिशा के बालासोर जिले के चांदीपुर में स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज के मुख्य लॉन्च पैड संख्या तीन के आसपास के साढ़े तीन किलोमीटर के पूरे दायरे को सुरक्षा के लिहाज से पूरी तरह खाली करा लिया गया था। वैज्ञानिकों और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर दो दिनों के भीतर आस-पास के कुल ग्यारह गांवों के ग्यारह हजार चार सौ बयालीस निवासियों को अस्थाई रूप से हटाकर सुरक्षित स्थानों और सरकारी चक्रवात आश्रय केंद्रों में ठहराया था। इस दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे और मिसाइल परीक्षण की प्रक्रिया पूरी तरह सफल होने के बाद ही शाम के वक्त सभी ग्रामीणों को ससम्मान उनके घरों में वापस लौटने की इजाजत दी गई। इस सफल परीक्षण के बाद भारतीय वैज्ञानिकों और सेना के शौर्य की पूरे देश में जमकर तारीफ हो रही है।

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