अक्सर देखने में आता है कि कुछ क्षेत्रों और विभागों में ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं, जिनके चलते सरकारी कारिंदों पर और उनकी नीयत पर सवाल उठने लाजिमी हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मानो कुछ शासकीय कर्मचारियों अधिकारियों ने सरकार को बदनाम करने का ठेका ले रखा है। इस प्रकार की कार्य प्रणाली से पता चलता है कि प्रदेश में सरकार भले ही किसी दल की हो, कुछ लोग इस प्रकार के काम करते रहते हैं, जिसके चलते शासन की बदनामी होती है। अनेक राज्यों में इस तरह की हरकतों को देखकर यह स्पष्ट होता है कि सरकारी विभागों में कार्यरत अनेक लोग जन सेवा में रहते हुए भी सियासी संगठन विशेष के अघोषित सदस्य बने रहते हैं। जब कभी राज्य में किसी ऐसे राजनीतिक दल की सरकार बन जाती है, जिससे उनके विचार नहीं मिलते। यह लोग वहां पर कुछ उस प्रकार के कृत्य क्रियान्वित कर देते हैं, जिससे लोगों में शासन के प्रति असंतोष पैदा होने लगता है और मीडिया में सत्ता पक्ष की फजीहत होने लगती है सो अलग। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के घटनाक्रमों पर गौर किया जा सकता है। यहां पर विभिन्न विभागों में जाति विशेष और वर्ग विशेष की बहुतायत में ऐसे लोग हैं जिनका रुझान बरसों से समाजवादी पार्टी में बना हुआ है। लेकिन वर्तमान में उत्तर प्रदेश की सत्ता भारतीय जनता पार्टी के हाथ में है। नतीजतन हो यह रहा है कि सपा परस्त शासकीय कर्मचारी अधिकारी अपने विभागों में रहकर कुछ ना कुछ ऐसा करते रहते हैं, जिससे सरकार को नित नई परेशानियों का सामना करना पड़े और विपक्षियों को शासन के खिलाफ घर बैठे बिठाए नए-नए मुद्दे हासिल होते रहें। ऐसा होता भी है और हो भी रहा है, जिसके चलते समय समय पर शासन को सामान्य माहौल बनाने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। इसके साथ-साथ प्रतिकूल हालातों का सामना भी करना पड़ता है। ऐसा ही एक मामला मध्य प्रदेश के सीहोर जिला अंतर्गत उस क्षेत्र में देखने को मिला जहां राजनीतिक लिहाज से मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यहां के और आसपास के जिलों के वन विभाग पर आरोप लग रहे हैं कि बारिश के मौसम में आदिवासियों के घरों को अतिक्रमण बताकर तोड़ा जा रहा है। पीड़ित लोगों का कहना है कि उन्हें ना तो किसी प्रकार का नोटिस दिया गया और ना ही संभलने का मौका मिला। फल स्वरुप जो लोग इस कार्रवाई के शिकार हुए हैं, उन लोगों ने अब आंदोलन करना शुरू कर दिया है। सरकार को परेशानी पैदा करने वाला ऐसा ही एक दृश्य बीते दिनों राजधानी में देखने को मिला। यहां पर डिंडोरी सीहोर बैतूल और देवास जिलों के आदिवासी इकट्ठे हुए। इन्होंने दावा किया कि वन विभाग अभी तक 100 से ज्यादा आदिवासियों के मकान तोड़ चुका है। जिसके चलते उन लोगों को जंगलों में मोटे पेड़ों के नीचे शरण लेनी पड़ रही है या फिर यह लोग अपने शुभचिंतकों के घरों पर आश्रय लिए हुए हैं । इधर विपक्ष को लंबे समय से किसी ऐसे मुद्दे की तलाश थी जिससे वह एससी एसटी वर्ग को सरकार के खिलाफ भड़का सके। सो वन विभाग की आपत्तिजनक करतूतों के चलते उसे यह मुद्दा प्राप्त हो गया है। फिलहाल विपक्ष ने पर्दे के पीछे रहकर सरकार के लिए परेशानी पैदा करने की रणनीति अपनाई है, ताकि उस पर आदिवासियों को उकसाने का आरोप न लगे । इंतजार किया जा रहा है कि जब मामला और ज्यादा भड़केगा तब विपक्षी नेता इनके मसीहा बनकर सामने आएंगे और फिर यह साबित करने की कोशिश करेंगे मध्य प्रदेश सरकार आदिवासी विरोधी है, अनुसूचित जाति के लोगों का अहित करती है। जाहिर है इससे सरकार के सामने राजनीतिक रूप से परेशानी पैदा हो सकती है। लेकिन बीते 24 घंटे में सरकारी मशीनरी जिस तरह से हरकत में आई है, उससे स्पष्ट हो गया है कि मध्य प्रदेश की डॉक्टर मोहन यादव सरकार आदिवासियों के पीछे कमर कसकर खड़ी हुई है। सब जानते हैं कि मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने उपरोक्त मामले में संज्ञान लेते हुए वरिष्ठ अधिकारियों को ताकीद किया है कि किसी भी सूरत में आदिवासियों और अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों पर अत्याचार सहन नहीं किया जाएगा। उन्होंने इस आशय के निर्देश भी दिए हैं कि जिन अधिकारियों कर्मचारियों की नाजायज करतूतों के चलते लोगों को परेशानी हुई है, उनके खिलाफ विभागीय स्तर पर कड़े निर्णय लिए जाएं और कानूनी कार्रवाई की जाए। वहीं पीड़ित आदिवासियों को राहत पहुंचा जाने के प्रयास भी सामने आने लगे हैं। खबरें मिल रही हैं कि आदिवासियों के घर तोड़ने में जिन अधिकारियों कर्मचारियों ने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई है, उनके खिलाफ सख्त एक्शन लिया जा रहा है। उधर बेहद सुनियोजित रणनीति के तहत मध्य प्रदेश शासन और खासकर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव द्वारा केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को आगे किए जाने से मामला काफी हद तक सहज हो चला है। इससे विपक्षी लोग हतप्रभ हैं । उन्हें लग रहा था कि इस मामले को बवंडर में तब्दील करके सरकार के सामने परेशानियां खड़ी करने में आसानी रहेगी। लेकिन ऐन वक्त पर डॉ मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान की युगल जोड़ी के एक्शन में आ जाने से विपक्षी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। इससे एक बात तो साफ हो गई है कि मध्य प्रदेश की सरकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हुई है।


