म.प्र के मोहन शासन द्वारा लोकतंत्र सेनानियों के सम्मान की नई इबारत
भारत का लोकतांत्रिक ताना-बाना उन अनगिनत संघर्षों और कुर्बानियों से बुना गया है, जिन्होंने समय-समय पर इसकी रक्षा के लिए अपने प्राणों और अपनी स्वतंत्रता की आहुति दी। हाल ही में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रवींद्र भवन में आयोजित ‘लोकतंत्र सेनानी प्रादेशिक सम्मेलन’ इसी संघर्ष को नमन करने और कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक जीवंत माध्यम बना। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मुख्य डआतिथ्य में संपन्न हुआ यह आयोजन न केवल आपातकाल के काले दौर में लोकतंत्र की अलख जगाए रखने वाले प्रहरियों के प्रति सम्मान का प्रतीक है, बल्कि यह इस बात का भी परिचायक है कि एक संवेदनशील सरकार अपने नायकों के योगदान को किस तरह अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए संकल्पित है। मुख्यमंत्री द्वारा इस मंच से की गईं कल्याणकारी घोषणाएं यह सिद्ध करती हैं कि राज्य सरकार लोकतंत्र सेनानियों के त्याग को स्वाधीनता संग्राम के समकक्ष मानती है और उनके जीवन को सुगम, सुरक्षित तथा सम्मानित बनाने के लिए पूरी तरह तत्पर है।
किसी भी राष्ट्र की जीवंतता इस बात से मापी जाती है कि वह अपने इतिहास के कठिन दौर में खड़े होने वाले नायकों को कितना सम्मान देता है। वर्ष 1975 से 1977 के बीच लगे आपातकाल के दौरान जब नागरिक अधिकार छीन लिए गए थे और असहमति की आवाज़ को सलाखों के पीछे धकेल दिया गया था, तब जिन जांबाज नागरिकों ने बिना डरे तानाशाही का विरोध किया, वे ही आज हमारे लोकतंत्र के सच्चे रक्षक हैं। आज यदि देश में एक आम और गरीब परिवार से निकला व्यक्ति भी सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद पर बैठकर देश का नेतृत्व कर पा रहा है, तो इसके पीछे उन्हीं मीसाबंदियों और लोकतंत्र सेनानियों का मूक एवं मुखर बलिदान है। इस ऐतिहासिक सच को स्वीकार करते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने उनके हित में जो कदम उठाए हैं, वे देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
इस सम्मेलन के माध्यम से सामने आई योजनाएं न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता को दर्शाती हैं, बल्कि समाज में इन सेनानियों की प्रतिष्ठा को भी एक नया आयाम देती हैं। दिवंगत लोकतंत्र सेनानियों की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए गांवों और कस्बों में शिलालेख लगाने का निर्णय आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा देगा। जब नई पीढ़ी स्थानीय पार्कों, सड़कों और खेल मैदानों का नाम इन लोकतंत्र के प्रहरियों के नाम पर देखेगी, तो उनके भीतर अपने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गर्व का भाव जाग्रत होगा। इसके साथ ही, जो सेनानी अभी तक ताम्रपत्र से वंचित रह गए थे, उन्हें शीघ्र यह सम्मान सौंपने का निर्णय उनकी ऐतिहासिक भूमिका पर आधिकारिक मुहर लगाने जैसा है। यह केवल एक धातु का पत्र नहीं, बल्कि राष्ट्र की ओर से दिया गया एक अमूल्य धन्यवाद पत्र है।
सरकार ने सम्मान के साथ-साथ इन बुजुर्ग नायकों की व्यावहारिक और चिकित्सीय जरूरतों का भी पूरा ध्यान रखा है। बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां स्वाभाविक हैं, ऐसे में लोकतंत्र सेनानियों के लिए मुफ्त इलाज और आपात स्थिति के लिए एयर एंबुलेंस जैसी अभूतपूर्व व्यवस्था करना मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की दूरगामी और मानवीय सोच को प्रकट करता है। यह घोषणा यह सुनिश्चित करती है कि संकट के समय देश की रक्षा करने वाले इन नायकों को अपने जीवन के उत्तरार्ध में किसी भी प्रकार की लाचारी का सामना न करना पड़े। इसके अतिरिक्त, प्रदेश के सभी विश्राम गृहों और सर्किट हाउसों में दो दिनों तक मुफ्त ठहरने की सुविधा देकर सरकार ने उन्हें राजकीय अतिथियों जैसा सत्कार दिया है, जो उनके आत्मसम्मान को और संबल प्रदान करता है।
इस पूरे विमर्श का एक और सुंदर पक्ष यह है कि सरकार केवल उन्हें सुविधाएं देकर औपचारिकता पूरी नहीं कर रही, बल्कि प्रदेश के विकास और जन-कल्याणकारी योजनाओं के निर्माण में उनके बहुमूल्य अनुभवों और सुझावों को शामिल करने की बात कह रही है। जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में देश की नब्ज को पहचाना, उनके पास समाज को देने के लिए अनुभवों का एक अनमोल खजाना है। उनके विचारों को नीतियों में ढालना शासन व्यवस्था को और अधिक लोक-कल्याणकारी तथा पारदर्शी बनाएगा। केंद्र सरकार के सहयोग से इन सेनानियों के लिए तीर्थाटन हेतु विशेष ट्रेन चलाने का प्रस्ताव भी उनकी आध्यात्मिक और मानसिक शांति के प्रति सरकार की गहरी चिंता और आदर भाव को रेखांकित करता है।
स्वयं मुख्यमंत्री का एक मीसाबंदी परिवार से होना इस पूरे आयोजन और निर्णयों को एक भावनात्मक धरातल प्रदान करता है। जिन्होंने बचपन से इस संघर्ष के दर्द, अनिश्चितता और पारिवारिक संकट को बेहद करीब से देखा हो, उनसे बेहतर इन सेनानियों के मर्म को कोई और नहीं समझ सकता। आपातकाल के दौरान जब परिवारों को यह भी पता नहीं होता था कि उनके मुखिया कब लौटेंगे और उन पर व्यवस्था का भारी दबाव होता था, उस दौर की पीड़ा को आज सम्मान और सुरक्षा में बदलना ही सच्ची सामाजिक न्याय की अवधारणा है। 96 वर्षीय लक्ष्मी नारायण पाटीदार और 95 वर्षीय शांति लाल संघवी जैसे वयोवृद्ध सेनानियों का मंच पर किया गया अभिनंदन इस बात का साक्ष्य है कि कृतज्ञ राष्ट्र अपने बुजुर्गों की लाठी बनने के लिए सदैव तैयार है।
आज भारत वैश्विक पटल पर सबसे बड़े और सुदृढ़ लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में गर्व से खड़ा है। यह सुदृढ़ता किसी एक दिन या एक प्रशासनिक आदेश से नहीं आई, बल्कि इसके पीछे दशकों का वैचारिक संघर्ष और नागरिकों की अडिग निष्ठा रही है। संकट के हर कालखंड में जब-जब राष्ट्र की चेतना पर प्रहार हुआ, तब-तब हमारे देश के सांस्कृतिक और सामाजिक संगठनों ने आगे बढ़कर देशहित को सर्वोपरि रखा। आज का यह सम्मेलन और सरकार की नीतियां इसी राष्ट्र प्रथम की भावना को पोषित करती हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो, भोपाल का यह प्रादेशिक सम्मेलन मात्र एक आयोजन नहीं, बल्कि इस संकल्प की पुनरावृत्ति है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए किया गया कोई भी त्याग कभी विस्मृत नहीं किया जाएगा। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा लिए गए ये निर्णय न केवल वर्तमान लोकतंत्र सेनानियों के जीवन को गरिमापूर्ण बना रहे हैं, बल्कि भविष्य के नागरिकों को भी यह संदेश दे रहे हैं कि देश के लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना हम सभी का परम कर्तव्य है। इस सकारात्मक और सम्मानजनक पहल के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनकी सरकार बधाई की पात्र है, जिसने इतिहास के पन्नों से निकलकर नायकों को वर्तमान के गौरवशाली मंच पर उचित स्थान दिया है।
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