
दिसंबर का महीना विश्व शांति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता जा रहा है। इससे भी ज्यादा खूबसूरत प्रसंग यह रहा कि विश्व शांति के लिए आवश्यक अवस्थाओं के स्वर मध्य प्रदेश के दो शहरों से ही मुखर हुए। इनमें से पहला महानगर जबलपुर है, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रमुख मौजूद रहे, तो वहीं राजधानी भोपाल में केरल के राज्यपाल ने इस विषय पर अपनी बात रखी। और भी ज्यादा सकारात्मकता की बात करें तो वह यह रही की इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने वाले विद्वानों में से एक हिंदू तो दूसरे मुस्लिम पक्ष से थे। दोनों वह पक्ष, जिन्हें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ खड़े करने के षड्यंत्र वर्षों से प्रचलन में बने हुए हैं।जैसा कि हम सब जानते हैं, भारत जैसे-जैसे प्रगति की राह पर आगे बढ़ रहा शत्रु देश के नेताओं के पेट में मरोड़ उठने लगी है। ये लोग भारत की बराबरी करने से तो रहे, लिहाजा उसकी राह में कांटे बिछाने का काम करते रहते हैं। अफसोस की बात यह है कि भारत के भीतर भी ऐसे राष्ट्र विरोधी कृत्य कभी गंगा जमुनी तहजीब तो कभी धर्म निरपेक्षता के नाम पर अंजाम दिए जाते रहते हैं। तरीका होता है हिंदुओं की एकजुटता को खंडित कर भारत की ताकत को येन केन प्रकारेण कम करना। इन का लक्ष्य एक ही रहता है, वह यह कि किसी भी प्रकार भारत की उस गति को रोके रखना है जो उसने विकास के पथ पर हासिल कर रखी है। यही वजह है कि भारत के प्राण कहे जाने वाले सनातन वर्ग को कहीं ना कहीं प्रताड़ित किया ही जाता रहता है। वह भारत में बहुसंख्यक है तब भी राष्ट्र विरोधी तत्वों के निशाने पर बना रहता है। जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और कनाडा आदि में तो पहले से ही अल्पसंख्यक होने के चलते प्रताड़ित किया जा रहा है। दुख के साथ लिखना पड़ता है कि हर मामले को राजनीतिक लाभ हानि के तराजू में तौलने के आदी भारत के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनेता इस बारे में चुप्पी साथ कर बैठे हुए हैं। इनका काम है हिंदुओं को जातियों में बांटकर उसे कमजोर करना और उनके प्रति अनिष्ट की कामना करने वाले वर्ग को सदैव ताकत मुहैया कराते रहना। लेकिन अब यह बात हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही वर्गों के विद्वानों की समझ में आने लगी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो आजादी के पहले से ही देश को आगाह करता रहा है कि यदि हिंदू एकजुट ना हुआ तो उसे बांटा जाएगा, काटा जाएगा और दुनिया भर में हर कदम पर प्रताड़ित किया जाएगा। इन्हीं अवस्थाओं का प्रतिरोध करने कि गरज से संघ लगभग 100 सालों से हिंदुओं की एकजुटता के काम में लगा हुआ है। बीते रविवार को संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि हिंदू के मूल में जाएंगे तो सनातन शब्द मिलेगा। यह वो ताकत है जिसने दुनिया को शांति और ज्ञान का संदेश दिया। जबकि नकारात्मक गतिविधियों में इसकी कभी रुचि रही ही नहीं। यही वजह है कि दुनिया भर में अब हिंदू अर्थात सनातन को सम्मान प्राप्त हो रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में इस्लामी आक्रमण कत्लेआम मचाने वाले साबित हुए। जबकि इसके उलट हिंदू अर्थात सनातनी जहां भी उपलब्ध रहा, वहां शांति और ज्ञान का संदेश फैलाने में संलग्न बना रहा। आज भी विश्व कल्याण के लिए हिंदुत्व की और उसकी एकजुटता की आवश्यकता बनी हुई है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए केरल के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान ने जो कुछ कहा वह ध्यान देने योग्य है। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय जीवन पद्धति में एकता का भाव तो होना ही चाहिए। लेकिन कुछ लोग भारत और दुनिया के अमन पसंद लोगों को शांति एवं सद्भाव के साथ विकास के पथ पर आगे बढ़ने देना ही नहीं चाहते। यही कारण है कि जहां देखो वहां बस जंग होती नजर आती है। भारत चाहता तो वह भी ऐसे कदम उठा सकता था। लेकिन हमारे सांस्कृतिक मूल्य इसकी अनुमति नहीं देते। यही कारण है कि दुनिया भर के नेता शांति की स्थापना के लिए अब भारत की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। हमें उनकी आशाओं पर खरा साबित होना है तो पहले अपने घर में एकता का बीज बोना होगा। मोहम्मद आरिफ खान ने स्पष्ट किया कि जब तक अपनों को दूसरा समझोगे तब तक संघर्ष की स्थिति बनी रहेगी। अपनी स्पष्टवादिता के लिए विख्यात केरल के राज्यपाल ने यह भी कहा कि बात सामुदायिक स्तर की हो या फिर राष्ट्रीय महत्व की, यह सिद्धांत बेहद पुराना है कि बंटने का परिणाम कटना ही होता है। और काटा हमेशा उसी को जाता है जो पहले से बंटा हुआ है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हमें एक परमपिता की संतान होने के नाते भाईचारे को बनाए रखने की आवश्यकता है। जब हम एकजुट होंगे तभी दूसरों के लिए आदर्श स्थापित कर पाएंगे। दोनों ही विद्वानों की सभा में उनके वक्तव्यों को लेकर श्रोताओं में बेहद एकाग्रता का भाव देखने को मिला। इससे स्पष्ट होता है कि जब बात देश और दुनिया के हित में की जाए तो उसे गंभीरता से सुना जाता है। अतः राज नेताओं को भी यह वास्तविकता समझनी होगी की चर्चाओं में बने रहने के लिए अथवा राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए जरूरी नहीं है की सामाजिक और धार्मिक अलगाववाद की बातें ही की जाएं। यह ख्याति और कामयाबी देश, धर्म और सामुदायिक एकता की बात करके भी हासिल की जा सकती है। इसमें केवल पंथ विशेष या फिर व्यक्ति विशेष का फायदा ना होकर मानव मात्र का कल्याण समाहित है।


