गठबंधन की सरकार के अस्तित्व को बचाए रखने वाला बजट

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जैसी कि पहले से ही उम्मीद थी, केंद्र सरकार द्वारा पारित किए गए बजट में उसकी बेबसी स्पष्ट दिखाई दे रही है। देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अभी तक तो गुजरात प्रदेश से लेकर केंद्र की पूर्ण बहुमत वाली सरकारों को चलाने के अनुभवी ही रहे हैं। लेकिन यह पहली बार हुआ है कि जब उन्हें गठबंधन की सरकार को लेकर चलना पड़ रहा है। ऐसे में प्रस्तुत बजट स्पष्ट प्रदर्शित कर रहा है कि केंद्र की एनडीए सरकार अपनी कार्य प्रणाली में समय अनुकूल बदलाव करती दिखाई दे रही है।
उल्लेखनीय है कि यह बजट आम चुनाव के बाद का बजट है। अतः संभावना व्यक्त की जा रही थी कि इस बजट में सरकार द्वारा आर्थिक सुधार के कड़े निर्णय स्पष्ट देखने को मिलेंगे। जैसे कि अभी तक देखने को मिलते रहे हैं। लेकिन ऐसा कुछ भी बजट में देखने को नहीं मिला। केंद्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने इस बजट में जनता के प्रति अकल्पनीय दरिया दिली का प्रदर्शन किया है। युवाओं, महिलाओं, किसानों, व्यापारियों, उद्योगपतियों, लघु एवं सूक्ष्म उद्योगों, आदिवासियों, छात्रों, बेघरों, मजदूरों, बेरोजगारों, कर्मचारियों, सभी के लिए कुछ ना कुछ राहत की घोषणा ही की गई है। लोग नए धंधे रोजगार खोल पाएं, इसके लिए आसानी से ऋण उपलब्ध हो पाए, कृषि क्षेत्र में आय और अधिक मजबूत हो, उसमें प्रयुक्त होने वाले संसाधन सहज और सस्ते हों, व्यापार के बीच आड़े आने वाली सुविधाएं और अवरोध खत्म हों, छोटे-छोटे उद्योगों और खासकर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिले, अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों की हालत में निरंतर सुधार हो, शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़े तथा अभिभावकों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम हो, गरीबों को लगातार कम मिलता रहे, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकानों की नई श्रृंखला खड़ी की जाए, महिलाओं का सशक्तिकरण और तेजी से आगे बढ़े, इस प्रकार के अनेक जनहितैषी कार्यों को आगे बढ़ने का इरादा केंद्र सरकार के बजट से आम हो रहा है। कुल मिलाकर यह बजट देखकर ऐसा लगता है कि जैसे देश में आम चुनाव होने जा रहे हों। क्योंकि सरकारों द्वारा जिस तरह की रियायत आम आदमी के प्रति बजट में बरती जाती है, वह केवल आम चुनाव से ऐन पहले वाले बजट में ही देखने को मिलती है। लेकिन क्या अर्थशास्त्री और क्या आम आदमी, सभी केंद्रीय बजट में दिखने वाली सरकार की दरिया दिली को देखकर अपनी अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। अधिकांश लोगों का मत है कि अभी तक नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व वाली केंद्र सरकार 10 सालों से पूर्ण बहुमत के साथ चल रही थी। फल स्वरुप नरेंद्र मोदी के दो कार्यकाल आर्थिक सुधारो को लेकर महत्वपूर्ण साबित हुए। पूरे 10 साल तक मोदी सरकार कई ऐसे फैसले लेने में कामयाब रही, जिससे कई बार आम आदमी प्रभावित से ज्यादा आहत होता भी दिखा। लेकिन इसकी परवाह न करते हुए मोदी सरकार एक के बाद एक सुधार के कड़े निर्णय लेती गई और उन्हें सफलता के साथ लागू भी किया। लेकिन अब जब मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल है, तब प्रधानमंत्री को पहले जैसा निर्णायक बहुमत नहीं मिल पाया है। फल स्वरुप सरकार के पहले जैसे तीखे तेवर पहले की अपेक्षा काफी हद तक नरम पड़े हैं। अब भाजपा को अपने साथी दलों की भावनाओं का भी गंभीरता के साथ सम्मान करना वक्त की मांग हो चली है। यही वजह है कि जिन जिन राज्यों के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का एनडीए सरकार को सरकार को भीतर अथवा बाहर रहकर समर्थन मिल रहा है, उक्त राज्यों को लेकर केंद्र सरकार को नरम रवैया अपनाया जाना व्यवहारिक जरूरत स्वाभाविक है। लेकिन चुनिंदा राज्यों के प्रति केंद्र सरकार का समर्पण विशेष रूप से प्रदर्शित हो, इससे बचने के लिए केंद्र सरकार की मजबूरी हो जाती है कि वह देश के अन्य राज्यों को लेकर भी नरम रवैया ही अपनाए। ताकि उस पर कोई भी राज्य भेदभाव के आरोप ना लगा सके। यही वजह है कि यह बजट न तो नए टैक्स बढ़ाने वाला है और ना ही इसकी विषय वस्तु महंगाई को बढ़ाने वाली दिखाई देती है। लिखने का आशय यह कि भाजपा सरकार की अपेक्षा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का केंद्रीय बजट आम आदमी को आर्थिक राहत और लाभ देने वाला प्रमाणित होने जा रहा है। अनेक राजनीतिक पंडित इस बजट को गठबंधन की सरकार के अस्तित्व को बचाए रखने वाला बजट भी बता रहे हैं। उदाहरण स्वरूप यह उल्लेख करना पर्याप्त है कि केंद्र सरकार के बजट में आंध्र प्रदेश और बिहार पर पूरी दरिया दिली के साथ आर्थिक मेहरबानी बरती गई है। जैसे की बिहार को सड़क परियोजनाओं के लिए 26000 करोड रुपए उपलब्ध कराए गए हैं। जबकि इस राज्य में पावर प्लांट स्थापित करने के लिए 21000 करोड रुपए अलग से देने का प्रावधान रखा गया है। वही इस राज्य में एक्सप्रेस वे के निर्माण हेतु केंद्र सरकार की ओर से फंड उपलब्ध कराने का ऐलान भी हुआ है। यही नहीं, एक हाईवे का नया निर्माण केंद्र सरकार अपने खर्चे से बिहार को देने जा रही है। यह सब केंद्र सरकार का बिहार के प्रति विशेष प्रेम न होकर, उसकी मजबूरी के रूप में देखा जा रहा है। सर्व विदित है कि देश की वर्तमान सरकार में सांसदों की संख्या के लिहाज से जो महत्व बिहार के जनता दल यूनाइटेड का है, वह अपने में इतनी क्षमता तो रखता ही है की उसके खुशी अथवा गम यूं ही अनदेखे नहीं किये जा सकते। सब जानते हैं कि वर्तमान केंद्र सरकार के अस्तित्व में आने के बाद से ही जदयू के नेता बिहार के लिए विशेष दर्जा देने की मांग निरंतर दोहरा रहे थे। इस मांग को जानकारों द्वारा सौदेबाजी के रूप में देखा जा रहा है और दावा किया जा रहा है कि राजनीतिक स्तर पर लेनदेन के मामले में नीतीश कुमार उस हद तक जा सकते हैं जहां उन्हें अपनी छवि को लेकर भी कोई चिंता शेष नहीं रह जाती है। यानि मांग पूरी न होने पर वे बिहार की तरह केंद्र सरकार के सामने भी राजनीतिक अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं। इसलिए यह शुरू से ही माना जा रहा था कि केंद्र सरकार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा भले ना दे, लेकिन उसे नीतीश कुमार द्वारा तोप मांगे जाने पर तमंचा तो देना ही पड़ेगा और केंद्रीय बजट ने इस धारणा को पुष्ट कर दिया है।
यही बात आंध्र प्रदेश को लेकर भी समझ में आती है। बजट पर गौर करें तो पता चलता है कि विभाजन के बाद आंध्र प्रदेश को पिछले 10 सालों से जिस केंद्रीय पैकेज का इंतजार था, उसे अब इस बजट से हासिल हो गया है। तेलुगु देशम पार्टी द्वारा शासित आंध्र प्रदेश को कई परियोजनाओं में आर्थिक रूप से केंद्रीय मदद की घोषणा की गई है। इसी के साथ 15000 करोड रुपए तो इसी साल उपलब्ध कराए जाने का ऐलान हो गया है। आंध्र प्रदेश के लिए सबसे बड़ी सौगात केंद्र सरकार की ओर से यह है कि उसे अमरावती में अपनी नई राजधानी बनाने के लिए भारी भारतम् आर्थिक सहायता मिलने जा रही है। बेहद स्पष्ट है कि ऐसा करके केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने तेलुगु देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू को भी खुश करने में फिलहाल तो सफलता प्राप्त कर ही ली है। क्योंकि इस ओर से भी बिहार की तर्ज पर ही आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई जाने लगी थी। संभवत चंद्रबाबू नायडू यह जानते थे कि इस सरकार से आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा भले ना मिले, किंतु इस बड़ी मांग को सामने रखने पर आंध्र प्रदेश को आर्थिक स्तर पर बड़े फंड की उपलब्धि तो हो ही जाएगी और वह हो गई है। अब यह बताना आवश्यक नहीं रह जाता कि केंद्र की मोदी सरकार में सांसदों की संख्या के लिहाज से जनता दल यूनाइटेड के बाद यदि किसी का दमखम प्रमुख है तो वह तेलुगु देशम पार्टी का ही है। बस इसी क्षमता का चुकारा करने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने आंध्र प्रदेश का भी भला करने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई है। कुल मिलाकर इस बजट को गठबंधन की सरकार के अस्तित्व को बचाने का बजट कहना गलत नहीं होगा।

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