
माध्यमिक शिक्षा के दौरान गिरधर की कुंडलिया पढ़ने को मिलीं। उनमें एक दोहा था –
बिना बेचारे जो करें सो पाछे से पछताय।
काम बिगाड़े आपनो जग में होत हंसाय।।
यह पंक्तियां मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह पर भली भांति लागू होती हैं। वह इसलिए क्योंकि अक्सर देखने में आता है, दिग्विजय सिंह जो कुछ भी बोलते हैं वह अंततः एक परेशानी के रूप में उनके गले पड़ जाता है। उनके द्वारा बगैर सोच विचार के बोलने के इससे बड़े परिणाम और क्या होंगे कि उन्हें कांग्रेस में जो राष्ट्रीय स्तर के पद मिल चुके हैं, अब उन्हीं की पार्टी द्वारा उन्हें उन ऊंचाइयों से लगातार महरूम रखा जा रहा है। एक जमाने में वे निर्वाचित लोकसभा सदस्य हुआ करते थे, फिर ऐसा समय भी आया जब मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री भी बने और फिर 10 साल तक इसी प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। लेकिन अब हालत यह है कि पहले भोपाल से चुनाव हारे। फल स्वरुप कांग्रेस को इन्हें पिछले दरवाजे से राज्यसभा होकर संसद में भेजना पड़ गया। बीते लोकसभा चुनाव के दौरान राजगढ़ से एक बार फिर जनता के बीच जाकर जीतने का मौका मिला, तो वहां पर भी उन्हें भाजपा के एक ऐसे प्रत्याशी के हाथों पर पराजय झेलनी पड़ गई जो मध्य प्रदेश के पूरे 29 लोकसभा क्षेत्र में भाजपा का सर्वाधिक कमजोर उम्मीदवार माना जा रहा था। यह केवल इसलिए नहीं हुआ है कि दिग्विजय सिंह ने सांसद विधायक मंत्री और मुख्यमंत्री रहते अपने प्रभाव क्षेत्र में पर्याप्त विकास कार्य नहीं कराए। बल्कि उन्हें लगातार हार का मुख इसलिए भी देखना पड़ रहा है क्योंकि उनके द्वारा सदैव ही ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है, जिसका आशय केवल और केवल हिंदुओं मुसलमानों को दुश्मनों के रूप में मजबूती के साथ स्थापित बनाए रखने का प्रयास होता है। अब हाल ही का बयान ले लें, उन्होंने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा को लक्ष्य बनाकर कह दिया कि वह मुझे आतंकवादियों का हिमायती कहते हैं तब मुझे उनकी नपुंसकता पर निराशा होती है। हालांकि उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर मुसलमान को लक्ष्य बनाकर अत्याचार करने के आरोप लगाए । छतरपुर पथराव कांड में एक तरफा कार्रवाई की तोहमत लगा दी। लेकिन जब उन्होंने एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को नपुंसक करार दिया तो फिर बवाल खड़ा तो होना ही था। इसी को कहते हैं बिना बेचारे जो कहे सो पीछे से पछताय । अब दिग्विजय सिंह के मन में अपने द्वारा कह गए आपत्तिजनक शब्दों को लेकर आत्मग्लानि होगी, यह उम्मीद बुद्धिजीवी लोग तो कम से कम उनसे नहीं करते। लेकिन हां यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि अब उनकी जग में हंसाई खूब जोरों से हो रही है। जग हंसाई भी इसलिए हो रही है, क्योंकि उन्होंने भाजपा के ऐसे प्रदेश अध्यक्ष को नपुंसक कह दिया जिनके कार्यकाल में उनकी पार्टी एक से अधिक बार सत्ता में आती रही। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करती रही। जैसे तैसे कांग्रेस सत्ता में आ भी गई तो भारतीय जनता पार्टी का वह अध्यक्षीय कार्यकाल भी विष्णु दत्त शर्मा का ही था, जब कांग्रेस की कमलनाथ सरकार अपने कुकर्मों के चलते औंधे मुंह गिरी और भाजपा ने एक बार फिर मध्य प्रदेश में अपना जलवा कायम करके दिखा दिया। दिग्विजय सिंह का विरोध इसलिए भी हो रहा है और होना भी चाहिए, क्योंकि वह एक कर्मवीर अध्यक्ष को नपुंसक कह रहे हैं। जबकि स्वयं दिग्विजय सिंह अपने ही कर्म क्षेत्र राजगढ़ में बुरी तरह चुनाव हार चुके हैं। भोपाल में भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी। आलम यह है कि जो कांग्रेस के मैंडेट पर चुनाव लड़ते हैं, उनमें से अधिकांश पार्टी प्रत्याशी अपने यहां प्रचार के लिए दिग्विजय सिंह को बुलाना भी नहीं चाहते। क्योंकि उन्हें लगता है यदि दिग्विजय सिंह आए तो बहुत सारे हिंदू मतदाता जो कांग्रेस को वोट देते आए हैं, वह दिग्विजय सिंह का मुख देखकर अन्यत्र पलायन कर जाएंगे। अब ऐसे में अन्य भाजपा नेता केवल उनकी हंसी ही उड़ा रहे हैं। क्योंकि इस पार्टी का अधिकांश नेतृत्व वर्ग यह मान चुका है की दिग्विजय सिंह की बातों का जवाब भी क्यों देना और क्या देना? क्योंकि वह जब भी बोलते हैं एक इंटेंशन बनाकर ऐसा कुछ कह देते हैं जो लोगों के दिमाग के ऊपर से निकल जाता है। यह बात अलग है कि समाचार माध्यमों को सुर्खियां और सनसनी खेज हेडिंग मिल जाती है। जैसे कभी लालू प्रसाद यादव के बयानों पर मिल जाया करती थी। यही वजह है कि अब दिग्विजय सिंह हंसी का पात्र बन रहे हैं। शर्म की बात तो यह है कि भाजपा के संवाद प्रमुख आशीष अग्रवाल ने तो यहां तक लिख दिया है कि दिग्विजय सिंह को उनके बहू बेटे भी अपने कक्ष में नहीं घुसने देते। उनकी इस कथित अवस्था को लेकर आशीष अग्रवाल ने दिग्विजय सिंह के नैतिक चरित्र और उनके आचरण पर सवाल खड़े किए हैं। अब यह सवाल कौन से हैं इस बारे में विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि यह प्रकरण हर वह व्यक्ति जानता है जिसे दिग्विजय सिंह के आचार व्यवहार की जानकारी है। संभव है भाजपा नेता उनके उस दूसरे विवाह को लेकर सवाल उठा रहे हैं, जो उनके द्वारा अपने बेटे बेटियों की उम्र की लड़की के साथ की गई है। हालांकि संविधान उन्हें इसकी भली भांति अनुमति प्रदान करता है। लेकिन अनुमान लगाया जा रहे हैं कि उनका नैतिक आचरण और व्यवहार इसलिए लक्ष्य बनाया जा रहा है, क्योंकि उनका विवाहेत्तर प्रेम प्रसंग तब जारी था जब दिग्विजय सिंह की पहली पत्नी श्रीमती आशा देवी अस्तित्व में बनी हुई थीं और बेहद गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। कुल मिलाकर दिग्विजय सिंह द्वारा 60 साल से अधिक उम्र की अवस्था में बगैर सोचे समझे कुछ ऐसे बयान दिए जा रहे हैं जो उन्हें सार्वजनिक स्तर पर हंसी का पात्र बनाते जा रहे हैं।


