एजेंसी, नई दिल्ली। सबरीमाला मामला : देश के सर्वोच्च न्यायालय में गुरुवार को सबरीमाला मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान मंदिरों की परंपराओं और सामाजिक एकता को लेकर गंभीर चर्चा हुई। जस्टिस नागरत्ना ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि मंदिरों में केवल किसी विशेष समुदाय को प्रवेश दिया जाता है और दूसरों को रोका जाता है, तो इससे समाज में विभाजन पैदा होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस तरह की पाबंदियां अंततः हिंदू धर्म की मजबूती के लिए नुकसानदेह साबित होंगी।
STORY | Sabarimala judgement proceeds on assumption that men are superior: Centre to SC
The Centre on Thursday backed the restriction on the entry of women of menstruating age into Kerala’s Sabarimala temple, saying that the top court’s 2018 judgement proceeds on the assumption… pic.twitter.com/maTPeo353k
— Press Trust of India (@PTI_News) April 9, 2026
सुप्रीम कोर्ट के तर्क: समावेशी परंपरा से मजबूत होगा धर्म
नौ जजों की संविधान बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अलग-अलग मठों और संप्रदायों के बीच भेदभाव ठीक नहीं है। उदाहरण देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि कांची मठ या शृंगेरी मठ के लोग एक-दूसरे के यहां आने-जाने पर रोक लगाएंगे, तो यह धर्म के हित में नहीं होगा। इसके बजाय, जितने अधिक लोग विभिन्न मंदिरों और मठों में जाएंगे, धर्म उतना ही अधिक सशक्त बनेगा। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 17 (छुआछूत का अंत) का भी हवाला दिया और इसे एक शक्तिशाली संवैधानिक प्रावधान बताया जो किसी भी प्रकार के भेदभाव को अपराध मानता है।
केंद्र सरकार का रुख: धार्मिक संवेदनशीलता और अदालती दायरा
दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि धार्मिक विवादों का इतिहास काफी संवेदनशील रहा है और ऐसे मामलों में अदालतों को हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। केंद्र ने दलील दी कि अनुच्छेद 26(b) के तहत धार्मिक संस्थाओं को यह तय करने का अधिकार है कि उनके परिसर में कौन प्रवेश करेगा और पूजा की विधि क्या होगी। यदि कोई संस्था अपने निजी नियमों और समुदाय के लिए मंदिर चलाना चाहती है, तो यह उसका धार्मिक अधिकार है, बशर्ते वह सरकार या आम जनता से कोई दान या फंड न ले रही हो।
सामाजिक सुधार और धार्मिक संस्थाओं के अधिकार
अदालत ने इस पहलू पर भी विचार किया कि यदि सरकार सामाजिक सुधार के लिए कोई कानून बनाती है, तो उसका असर धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों पर पड़ना स्वाभाविक है। जजों ने कहा कि यह केवल एक सैद्धांतिक सवाल नहीं है, बल्कि हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर यह तय किया जाएगा कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सुनवाई के दौरान शाकाहारी और मांसाहारी भोजन जैसे उदाहरणों के जरिए भी धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों को स्पष्ट करने की कोशिश की गई।
50 से अधिक याचिकाओं पर जारी है सुनवाई
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव से जुड़ा यह कानूनी विवाद पिछले 26 वर्षों से चल रहा है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने बहुमत से महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था, जिसके बाद 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। अब नौ जजों की बेंच 7 से 22 अप्रैल तक इन सभी याचिकाओं पर विस्तार से सुनवाई कर रही है। आने वाले दिनों में इस मामले के विरोधियों और समर्थकों की दलीलें सुनी जाएंगी, जिसके बाद देश के धार्मिक और संवैधानिक इतिहास पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।
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