मोहन सरकार की खरी खरी- अवकाश से आपत्ति नहीं, परिणाम मूलक कार्य चाहिए
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारे में इन दिनों एक नई ऊर्जा और अनुशासन की सुगबुगाहट स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार ने सुशासन की परिभाषा को केवल फाइलों और घोषणाओं तक सीमित न रखकर उसे धरातल पर उतारने का जो बीड़ा उठाया है, वह स्वागत योग्य है। शासकीय कार्यालयों में समयपालन और उपस्थिति को लेकर बढ़ती सख्ती इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि प्रशासन अब ‘चलता है’ वाली मानसिकता से ऊपर उठकर ‘परिणामोन्मुखी’ कार्यसंस्कृति की ओर बढ़ रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की सफलता की पहली सीढ़ी वह लोक सेवक होता है, जो सीधे जनता से जुड़ा है। यदि वह लोक सेवक समय पर अपने कार्यालय में उपस्थित है और जनसमस्याओं के समाधान के लिए तत्पर है, तो शासन की आधी चुनौतियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। मुख्यमंत्री के ताजा निर्देश और मुख्य सचिव कार्यालय की सक्रियता इसी दिशा में एक बड़ा और प्रभावी कदम है।
प्रशासनिक मशीनरी में सुधार की यह प्रक्रिया केवल उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जवाबदेही और पारदर्शिता के एक नए युग की शुरुआत है। जब सुबह 10 से 10:30 बजे के बीच सीधे उच्च अधिकारियों से उनके अधीनस्थ स्टाफ की स्थिति पूछी जाती है, तो यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाती, बल्कि यह अनुशासन का एक मनोवैज्ञानिक संदेश होता है जो पूरे तंत्र में संचारित होता है। वल्लभ भवन से लेकर विंध्याचल और सतपुड़ा भवन तक की जा रही यह सघन निगरानी स्पष्ट करती है कि अब पद और गरिमा के साथ-साथ समय की पाबंदी को भी अनिवार्य योग्यता माना जाएगा। सरकार का यह रुख कि सुबह से शाम तक अधिकारी और कर्मचारी अपनी सीटों पर मौजूद रहें, जनता के उस भरोसे को बहाल करने के लिए आवश्यक है जो अक्सर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते डगमगाने लगता है।
समय की पाबंदी का सीधा संबंध जनकल्याणकारी योजनाओं की सफलता से है। यदि एक फाइल अपनी मेज पर समय से आगे बढ़ती है, तो इसका अर्थ है कि किसी जरूरतमंद को समय पर इलाज मिल रहा है, किसी छात्र की छात्रवृत्ति स्वीकृत हो रही है या किसी किसान को उसकी फसल का मुआवजा समय पर मिल रहा है। विलंब केवल प्रशासनिक देरी नहीं है, बल्कि यह विकास की गति को अवरुद्ध करने वाला कारक है। राज्य सरकार ने इस बात को गहराई से समझा है कि अगर मध्य प्रदेश को विकास के पैमानों पर देश के अग्रणी राज्यों की पंक्ति में खड़ा करना है, तो सबसे पहले अपने कार्यबल को अनुशासित करना होगा। मुख्य सचिव कार्यालय द्वारा डेटा संकलन और शाम तक रिपोर्ट तैयार करने की व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि निगरानी केवल रस्म अदायगी नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक ठोस उद्देश्य और परिणाम की इच्छा है।
इस पूरी कवायद में जो सबसे महत्वपूर्ण पहलू उभरकर सामने आया है, वह है कार्यसंस्कृति में सुधार न होने पर ‘सिक्स डे वर्किंग सिस्टम’ यानी छह दिवसीय कार्यप्रणाली को पुनः लागू करने की चेतावनी। वर्तमान में पांच दिवसीय कार्य सप्ताह की व्यवस्था इसलिए दी गई थी ताकि कर्मचारी कार्य और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बना सकें और अधिक ऊर्जा के साथ काम कर सकें। लेकिन यदि इस सुविधा का लाभ अनुशासनहीनता के रूप में लिया जाने लगे, तो व्यवस्था में परिवर्तन अपरिहार्य हो जाता है। दूसरे और चौथे शनिवार की छुट्टी समाप्त करने का संकेत एक कड़ा लेकिन आवश्यक संदेश है कि अधिकार कर्तव्यों के साथ आते हैं। सरकार की मंशा स्पष्ट है कि जनता के कार्यों की कीमत पर दी जाने वाली कोई भी सुविधा तर्कसंगत नहीं हो सकती। यह चेतावनी कर्मचारियों के लिए एक अवसर भी है कि वे अपनी कार्यशैली को आधुनिक, त्वरित और जनहितैषी बनाकर इस सुविधा को बरकरार रखें।
मध्य प्रदेश में इस समय जिस तरह की ‘परफॉरमेंस बेस्ड’ प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखी जा रही है, वह भविष्य के लिए एक आदर्श मॉडल साबित हो सकती है। लंच के बाद भी उपस्थिति पर नजर रखना और शाम छह बजे तक की रिपोर्ट तैयार करना इस बात को रेखांकित करता है कि दफ्तर केवल आने-जाने की जगह नहीं, बल्कि सेवा के केंद्र होने चाहिए। अक्सर यह देखा गया है कि लंच ब्रेक के नाम पर लंबी अनुपस्थिति जनता के लिए भारी परेशानी का सबब बनती है। सरकार की इस पैनी नजर से न केवल समय की बर्बादी रुकेगी, बल्कि कार्यक्षमता में भी गुणात्मक वृद्धि होगी। जब एक क्लर्क से लेकर एडिशनल सेक्रेटरी तक को यह ज्ञात होगा कि उनकी मौजूदगी की समीक्षा सीधे शीर्ष स्तर पर हो रही है, तो कार्यप्रणाली में स्वाभाविक रूप से गंभीरता आएगी।
सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इस सख्ती को दंडात्मक दृष्टि से देखने के बजाय ‘सुधारात्मक’ दृष्टि से देखा जाना चाहिए। एक अनुशासित कार्यालय वह होता है जहां आने वाले नागरिक को सम्मान और समाधान दोनों मिलते हैं। मध्य प्रदेश सरकार का यह कदम अंततः कर्मचारियों की छवि को भी जनता के बीच सुधारने का काम करेगा। जब काम समय पर होंगे और दफ्तरों में सन्नाटे के बजाय सक्रियता दिखेगी, तो सरकारी तंत्र के प्रति लोगों का नजरिया बदलेगा। पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन का जो लक्ष्य मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने निर्धारित किया है, उसकी पूर्ति के लिए यह सख्ती अनिवार्य औषधि के समान है। यह लोकहित में उठाया गया एक साहसिक कदम है जो राज्य की प्रगति के पहियों को और अधिक गति प्रदान करेगा।
अंततः, किसी भी राज्य की उन्नति उसके प्रशासन की ईमानदारी और तत्परता पर निर्भर करती है। मध्य प्रदेश सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह विकास की दौड़ में किसी भी प्रकार की शिथिलता को स्वीकार नहीं करेगी। अधिकारियों और कर्मचारियों को भी इस पहल को एक सकारात्मक चुनौती के रूप में लेना चाहिए। यह समय केवल ड्यूटी निभाने का नहीं, बल्कि प्रदेश की सेवा के लिए खुद को समर्पित करने का है। यदि प्रशासन का हर अंग समय की मर्यादा का पालन करते हुए पूरी निष्ठा से काम करे, तो मध्य प्रदेश को ‘स्वर्णिम प्रदेश’ बनाने का संकल्प सिद्ध होने में देर नहीं लगेगी। सरकार का यह संकल्प अनुशासन की नई इबारत लिखने की ओर अग्रसर है, जिसका लाभ आने वाले समय में प्रदेश के हर नागरिक को सेवा और सुविधा के रूप में निश्चित ही प्राप्त होगा।
ये भी पढ़ें : मध्य प्रदेश सरकार को किसान के साथ खेत की बेहतरी की भी चिंता
ताज़ा अपडेट और ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें और STPV.live के साथ अपडेट रहें


