रोल मॉडल

मप्र पूरे देश में सुशासन पारदर्शिता और लोक कल्याण का रोल मॉडल

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मप्र पूरे देश में सुशासन पारदर्शिता
और लोक कल्याण का रोल मॉडल

​मध्यप्रदेश के प्रशासनिक और राजनैतिक परिदृश्य में हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी अध्याय जुड़ा है, जिसने राज्य में लोक-कल्याण और प्रशासनिक शुचिता की एक नई बहस को जन्म दिया है। भोपाल के ऐतिहासिक और वैचारिक केंद्र अटल बिहारी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा नवनियुक्त पदाधिकारियों को दिया गया मार्गदर्शन केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह बदलते दौर में जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही और सेवा के संकल्प का एक व्यापक घोषणापत्र था। निगम, मंडल, बोर्ड, आयोग और प्राधिकरणों के नवनियुक्त पदाधिकारियों की यह टीम राज्य के विकास की मुख्यधारा को सीधे जनता से जोड़ने वाली रीढ़ की हड्डी है। ऐसे में राज्य के मुखिया द्वारा उन्हें सुशासन, संवेदनशीलता, वित्तीय अनुशासन और आधुनिकता का पाठ पढ़ाना यह स्पष्ट करता है कि वर्तमान सरकार केवल तात्कालिक लक्ष्यों को हासिल करने में विश्वास नहीं रखती, बल्कि वह एक मजबूत, पारदर्शी और दूरगामी प्रशासनिक ढांचे का निर्माण करना चाहती है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नजीर बन सके।

​किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी शक्ति का उपयोग किस रूप में करते हैं। मुख्यमंत्री ने बेहद सटीक शब्दों में इस बात को रेखांकित किया कि ये नियुक्तियां केवल पद या विशेषाधिकार का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह मध्यप्रदेश की साढ़े आठ करोड़ जनता की सेवा करने का एक अत्यंत अनमोल और सुनहरा अवसर है। राजनीति और प्रशासन का एकमात्र और अंतिम उद्देश्य अंततः जनकल्याण ही होना चाहिए। जब नेतृत्व इस दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ता है, तो सत्ता का अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है और उसकी जगह सेवा की भावना ले लेती है। भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों का स्मरण कराते हुए मुख्यमंत्री ने राजनीतिक जीवन में नैतिकता और शुचिता की जो बात कही, वह आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। साख कभी भी विज्ञापनों या खोखले दावों से नहीं बनती, बल्कि वह जनता के बीच किए गए जमीनी कार्यों और पदाधिकारियों की प्रशासनिक दक्षता से निर्मित होती है। सरकार की असली पहचान मंत्रालयों से नहीं, बल्कि इन मंडलों और प्राधिकरणों के माध्यम से समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को मिलने वाले लाभ से तय होती है।
​प्रशासनिक कुशलता का एक बहुत बड़ा पैमाना भाषा और व्यवहार होता है। मुख्यमंत्री का यह सुझाव कि भाषा में सौम्यता और निर्णय में दृढ़ता होनी चाहिए, एक कुशल प्रशासक के मूल चरित्र को दर्शाता है। अक्सर यह देखा जाता है कि पदों पर बैठने के बाद लोग संवेदनशीलता खो देते हैं या फिर कड़े निर्णय लेने से हिचकिचाते हैं। डॉ. मोहन यादव ने इन दोनों के बीच एक आदर्श संतुलन बनाने की बात कही है। जनता के साथ आपका संवाद जितना विनम्र और आत्मीय होगा, शासन के प्रति उनका विश्वास उतना ही गहरा होगा। लेकिन साथ ही, जब बात जनहित की नीतियों को लागू करने की हो, तो निर्णयों में किसी भी तरह की ढुलमुल नीति या कमजोरी नहीं दिखनी चाहिए। इसके साथ ही, अनावश्यक प्रचार-प्रसार और गैर-जरूरी गतिविधियों से दूरी बनाए रखने की सलाह वर्तमान दौर में बेहद प्रासंगिक है। आज के समय में जब दिखावे की संस्कृति हावी हो रही है, तब मुख्यमंत्री का सादगी और आत्म-अनुशासन पर जोर देना यह साबित करता है कि वे काम की गुणवत्ता को प्रचार के शोर से ऊपर रखते हैं। प्रशासनिक शुचिता इसी बात में निहित है कि आपका काम खुद बोले, न कि आप अपने काम का ढिंढोरा पीटें।
​एक सशक्त राज्य के निर्माण के लिए वित्तीय अनुशासन को सबसे अनिवार्य शर्त माना गया है। मुख्यमंत्री ने इस बात पर विशेष बल दिया कि फिजूलखर्ची पर कड़ाई से नियंत्रण लगाया जाए और सभी संस्थान अपनी आय के नए और आत्मनिर्भर स्रोत विकसित करने की दिशा में तेजी से काम करें। कोई भी संस्थान तब तक पूरी क्षमता से काम नहीं कर सकता जब तक वह वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर और अनुशासित न हो। उपलब्ध संसाधनों का विवेकपूर्ण और बेहतर उपयोग करना ही वास्तविक प्रबंधन है। इसके लिए विभागीय नीतियों और नियमों का गहराई से अध्ययन करना अनिवार्य है। जब पदाधिकारी स्वयं नियमों के ज्ञाता होंगे, तभी वे अपनी टीम से सर्वश्रेष्ठ परिणाम निकलवा सकेंगे। टीम भावना और आपसी समन्वय वह चाबी है जिससे बड़े से बड़े और जटिल से जटिल लक्ष्यों को आसानी से हासिल किया जा सकता है। मुख्यमंत्री की यह सोच राज्य को आत्मनिर्भरता के उस पथ पर ले जाने वाली है जहां सरकारी संस्थान बोझ बनने के बजाय राज्य की प्रगति के मुख्य वाहक बनते हैं।
​इस पूरे विमर्श में सबसे महत्वपूर्ण और कड़ा संदेश भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के रुख को लेकर था। डॉ. मोहन यादव ने बेहद साफ और कड़े शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि सरकार की कदाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति है। किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता या अनुचित आचरण को रत्ती भर भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह चेतावनी उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो सार्वजनिक पदों का दुरुपयोग अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए करते हैं। मुख्यमंत्री ने पदाधिकारियों को बहुत ही व्यावहारिक सलाह दी कि वे अपने सहयोगियों का चयन बेहद सोच-समझकर और जांच-परखकर करें। कई बार गलत संगति या गलत सलाहकारों के कारण संस्थाओं और व्यक्तियों की गरिमा धूमिल हो जाती है। इसलिए, ऐसी तमाम गतिविधियों और संदेहास्पद लोगों से दूरी बनाए रखना ही व्यक्तिगत और संस्थागत गरिमा को सुरक्षित रखने का एकमात्र उपाय है। जब शीर्ष पर पारदर्शिता होगी, तो उसका असर नीचे तक साफ दिखाई देगा और पूरी व्यवस्था में शुचिता का प्रवाह होगा।
​इक्कीसवीं सदी के इस दौर में सुशासन की कल्पना डिजिटल गवर्नेंस के बिना अधूरी है। मुख्यमंत्री ने तकनीक को सुशासन का सबसे मजबूत आधार मानते हुए सभी संस्थानों में तकनीक आधारित निगरानी और डाटा आधारित निर्णय प्रक्रिया को बढ़ावा देने की वकालत की है। जब निर्णय व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के बजाय ठोस आंकड़ों और पारदर्शी तकनीक पर आधारित होते हैं, तो पक्षपात और गड़बड़ी की गुंजाइश पूरी तरह समाप्त हो जाती है। पारदर्शी सेवा वितरण व्यवस्था के माध्यम से आम जनता को समय पर और बिना किसी परेशानी के लाभ पहुँचाया जा सकता है। इसके साथ ही, सोशल मीडिया के सकारात्मक उपयोग पर जोर देना भी समय की मांग है। सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और उपलब्धियों को सीधे जनता तक पहुँचाने और उनसे सीधा फीडबैक प्राप्त करने का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम है। इसके सही उपयोग से सरकार और नागरिकों के बीच की दूरी को न्यूनतम किया जा सकता है।
​संवेदनशीलता और सुलभता को किसी भी कार्यकाल का केंद्र होना चाहिए, और मुख्यमंत्री के संबोधन में यह भाव पूरी गहराई से उभरकर सामने आया। एक आम नागरिक जब किसी सरकारी दफ्तर या प्राधिकरण के दरवाजे पर आता है, तो वह केवल अपने काम के लिए नहीं आता, बल्कि वह इस उम्मीद के साथ आता है कि उसकी बात को सम्मान और सहानुभूति के साथ सुना जाएगा। यदि पदाधिकारियों का व्यवहार सहयोगात्मक और संवेदनशील होगा, तो जनता को व्यवस्था में अपनापन महसूस होगा। यह अपनापन ही लोकतंत्र को मजबूत बनाता है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री ने पदाधिकारियों को केवल दफ्तरी कामकाज तक सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक सरोकारों से जुड़ने का भी आह्वान किया। नशामुक्ति, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, बाल संरक्षण और सामाजिक समरसता जैसे विषय केवल सामाजिक कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते। जब शासकीय और अर्ध-शासकीय संस्थाओं के प्रमुख इन अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाएंगे, तो यह एक जन-आंदोलन का रूप ले लेगा और समाज में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।
​आज भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इस अमृत काल में मध्यप्रदेश के पास भी देश का सबसे अग्रणी और विकसित राज्य बनने का एक ऐतिहासिक और सुनहरा अवसर है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने नवनियुक्त पदाधिकारियों के भीतर इसी वृहद लक्ष्य के प्रति एक तड़प और उत्साह जगाने का प्रयास किया है। नवाचारों, दृढ़ इच्छाशक्ति और अथक परिश्रम के बल पर ही मध्यप्रदेश को देश के मानचित्र पर सर्वश्रेष्ठ राज्य के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से जो वैचारिक ऊर्जा और नीतिगत दिशा निर्देश पदाधिकारियों को मिले हैं, वे निश्चित रूप से राज्य के विकास में मील का पत्थर साबित होंगे। यदि सभी नवनियुक्त पदाधिकारी मुख्यमंत्री के इन सूत्रों को अपने कार्य व्यवहार में पूरी तरह उतार लेते हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब मध्यप्रदेश सुशासन, पारदर्शिता और लोक-कल्याण के मामले में पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल बनकर उभरेगा। यह समय एकजुट होकर, पूरी निष्ठा के साथ राज्य की सेवा में खुद को समर्पित करने का है, ताकि एक खुशहाल और समृद्ध मध्यप्रदेश का सपना साकार हो सके।

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