एजेंसी, भोपाल। मध्य प्रदेश की सरकार ने किसानों से सीधे जुड़ी संस्थाओं में लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य में सहकारी समितियों और कृषि उपज मंडियों के चुनाव चरणबद्ध तरीके से कराने पर अपनी सैद्धांतिक सहमति दे दी है। गौरतलब है कि प्रदेश में साल 2026 को ‘कृषक कल्याण वर्ष’ के रूप में मनाया जा रहा है और इन चुनावों को इसी कड़ी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
एक दशक से ज्यादा समय से टल रहे थे चुनाव
प्रदेश में चुनावी सूखे का आलम यह है कि कृषि मंडियों के चुनाव साल 2012 और सहकारी समितियों के चुनाव 2013 के बाद से नहीं हुए हैं। कभी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की व्यस्तता, तो कभी कर्जमाफी और कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के चलते ये चुनाव लगातार टलते रहे। नियमानुसार कार्यकाल खत्म होने से छह महीने पहले चुनाव होने चाहिए, लेकिन पिछले कई सालों से इन संस्थाओं की कमान सरकारी प्रशासकों के हाथों में है। अब सरकार ने हाई कोर्ट को भी सूचित किया है कि समितियों के पुनर्गठन और लगभग 700 नई समितियों के निर्माण का काम पूरा होते ही चुनावी प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।
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ग्रामीण राजनीति और मैदानी पकड़ का होगा लिटमस टेस्ट
सहकारी और मंडी समितियों से प्रदेश के करीब एक करोड़ से अधिक किसान सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। हालांकि ये चुनाव तकनीकी रूप से गैर-दलीय आधार पर होते हैं, लेकिन उम्मीदवारों के चयन और प्रचार में भाजपा और कांग्रेस का पूरा दखल रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि साल 2027 में होने वाले नगर निगम, नगर पालिका और पंचायत चुनाव से पहले ये चुनाव दोनों प्रमुख दलों के लिए जनता की नब्ज टटोलने का सबसे अच्छा जरिया साबित होंगे। इसके जरिए ग्रामीण इलाकों में राजनीतिक रुझान का सटीक अंदाजा मिल सकेगा।
कृषक कल्याण वर्ष के जरिए माहौल बनाने की तैयारी
मुख्यमंत्री ने मंत्रियों और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कृषक कल्याण वर्ष के दौरान फसल चक्र में बदलाव, पशुपालन को बढ़ावा और किसानों की आय बढ़ाने वाली योजनाओं को प्राथमिकता दी जाए। सरकार की रणनीति है कि साल भर चलने वाली इन योजनाओं और विकास कार्यों के जरिए किसानों के बीच एक सकारात्मक माहौल बनाया जाए, जिसका सीधा लाभ उसे आगामी मंडी और सहकारी चुनावों में मिल सके।


