बड़ी देर भाई नंदलाला…! तेरी राह ताके हर बाला…!!

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बड़ा ही पुण्य दिवस है, जब यह लेख लिखा जा रहा था और तब भी, जबकि आप इसे पढ़ रहे हैं। पूरे देश ने बीती रात श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया। आज इसे गोकुल अष्टमी के रूप में मनाया जा रहा है। सर्व विदित है, यह इसलिए क्योंकि भगवान कृष्ण का जन्म भले ही रात के दूसरे पहर में हो गया था। किंतु तत्समय उक्त घटना को कोई भी जान नहीं पाया था। क्योंकि जब भगवान कृष्ण का अवतार हुआ तब उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव मथुरा के कारागार में कैद थे। कृष्ण जन्म के समय सारे पहरेदार निद्रामग्न हो चुके थे। इसी दौरान भगवान कृष्ण को उनके पिता वासुदेव द्वारा नंद बाबा और यशोदा माता के घर गोकुल पहुंचा दिया गया। दूसरे दिन प्रातः काल यशोदा जी और नंद बाबा को ज्ञात हुआ कि उनके यहां लल्ला ने जन्म लिया है। जबकि यशोदा माता द्वारा जन्मी गई बालिका को वासुदेव जी द्वारा रात को ही गोकुल से मथुरा ले जाया जा चुका था। जिसे बाद में कंस ने मारने का प्रयास किया तो इसी बालिका ने आकाश में स्थापित होकर यह उद्घोष किया था कि कंस का काल जन्म ले चुका है। यह प्रसंग केवल इसलिए लिखना पड़ा क्योंकि जन्माष्टमी को लेकर अक्सर लोगों में यह भेद बना रहता है कि श्री कृष्ण जन्मोत्सव कब मनाया जाए? क्योंकि उनका जन्म तो रात्रि के दूसरे पहर में हुआ था। इसलिए पूजा अर्चना भी अधिकांशतः रात को 12 बजे के बाद ही की जाती है। वहीं उनके प्रकट होने का घटनाक्रम दूसरे दिन गोकुल में हुआ। इसलिए दिन में उत्सव मनाया जाता है। अब आगे बढ़ते हैं कि आज के लेख का मुख्य विषय क्या है। तो आज मुख्य विषय की ओर गमन करते हैं। भगवान कृष्ण की लीला का बड़ा महत्वपूर्ण प्रसंग है। जब रुक्मणी जी की शादी उनके भाई रुक्मी द्वारा जबरदस्ती शिशुपाल के साथ की जा रही थी। किंतु रुक्मणी जी श्री कृष्ण को प्रेम करती थी तथा उन्होंने पत्र के माध्यम से श्री कृष्ण को अपनी भावनाओं से अवगत भी करा दिया था। उनकी भावना का सम्मान करते हुए श्री कृष्ण ने शिशुपाल का वध किया और रुक्मणी जी की भावनाओं का सम्मान बनाए रखा। इसी प्रसंग के अलावा एक और घटना यह भी प्रमुख है कि जब शिशुपाल ने भगवान कृष्ण को एक सभा में सौ गालियां दे डालीं तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र चलाकर उसका वध कर दिया। यह ईश्वर की लीला ही है कि सुदर्शन चक्र के तीव्र वेग से श्री कृष्ण की उंगली से रक्त बह निकला। उपस्थित लोग सोच ही नहीं पाए कि श्री कृष्ण की उंगली से बहते हुए रक्त को कैसे रोका जाए? जबकि इस घटनाक्रम के साक्षी भगवान कृष्ण के अनेक भक्त भी थे। तभी वहां उपस्थित द्रोपदी दौड़ी। उसने अपनी चुन्नी का पल्लू फाड़ा और उस पट्टी को श्री कृष्ण की उंगली से बांध दिया। तब कृष्ण ने अपनी इस सखी को वचन दिया कि मैं एक न एक दिन तुम्हारा यह कर्ज अवश्य चुकाऊंगा। जब दुशासन ने हस्तिनापुर की भरी सभा में द्रोपदी का वस्त्र हरण किया, तब भगवान श्री कृष्ण ने आकर उसकी रक्षा की। वस्त्र की एक छोटी सी पट्टी के बदले उन्होंने द्रोपदी पर इतना चीर न्योछावर कर दिया, जिसे खींचते खींचते दुशासन अचेत होकर पृथ्वी पर गिरने को विवश हुआ। यह दो घटनाएं इस सत्य को प्रतिपादित करती हैं कि भगवान कृष्ण के मन में महिलाओं और कन्याओं के प्रति कितना सम्मान था। यूं तो शिशुपाल के वध के अनेक कारण थे, किंतु उन्होंने शिशुपाल का वध इसलिए भी किया, क्योंकि वह रुक्मणी से बलात् विवाह करना चाहता था। लेकिन श्री कृष्ण की वजह से रुक्मणी के साथ अपना विवाह ना हो पाने के चलते वह उनसे बैर पाल चुका था। वहीं श्री कृष्ण की इच्छा के चलते ही कुरु वंश का नाश हुआ। विद्वान उसका कारण यह बताते हैं। चूंकि द्रोपदी के चीर हरण में दुर्योधन सहित उसके 98 भाइयों की सहमति थी। केवल एक विकर्ण ही ऐसा कौरव था, जिसने इस पाप की भरी सभा में भर्त्सना की थी। अनेक ऐसे सज्जन भी महाभारत के दौरान काल को प्राप्त हुए, जो उस सभा में सामर्थ्यवान होने के बावजूद द्रोपदी के निरादर के मूक दर्शक बने रहे। ऐसी अन्य घटनाएं इस बात का उद्घोष करती हैं कि भारतीय सभ्यता में जहां-जहां नारी का अपमान हुआ वहां देर से ही सही अंततः विनाश ने ही पांव पसारे। उन लोगों का अंततः बुरा ही हुआ जिन्होंने स्त्री पर बुरी नजर डाली। जहां तक भगवान कृष्ण की बात है तो उनके आदर्श यही स्थापित करते हैं कि नारी भोग की वस्तु न होकर सम्मान की अधिकारिणी है। जहां उसका आदर होगा वहां देवता निवास करेंगे। साथ में यह आदर्श भी श्री कृष्ण ने ही स्थापित किया है कि जो भी स्त्री का अपमान करेगा उसे असमय ही काल के गाल में समान होगा। हम नरकासुर के प्रसंग को ही लें। उसने 16000 राजकुमारियों को अपनी कारागार में कैद कर रखा था। श्री कृष्णा नरकासुर के अंत का कारण तो बने ही। साथ में उन्होंने उन सभी राजकुमारी को तब अपनी धर्मपत्नियों के रूप में स्वीकार किया, जबकि उनसे कोई भी विवाह करना नहीं चाह रहा था। कलंक यह लगाए जा रहे थे कि वे सभी राजकुमारियां नरकासुर जैसे पापी की कैद में इतने वर्षों तक रहीं । तो फिर नरकासुर ने उन्हें निष्कलंक क्यों रख छोड़ा होगा? तब भगवान कृष्ण ने उन राजकुमारियों को अपनी पत्नियां बनाकर यह संदेश दिया कि कलंकी नरकासुर था राजकुमारियां नहीं।
लिखने का आशय यह कि जिस देश में महिलाओं की रक्षा के लिए स्वयं ईश्वर द्वारा अवतार लेने के एक से अधिक उदाहरण स्थापित हैं, उस देश में नित्य प्रतिदिन महिलाओं और बालिकाओं पर अत्याचार, दुराचार किए जाने की घटनाएं निरंतर प्रकाश में आ रही हैं। ऐसा कोई दिन शेष नहीं जाता जब समाचार पत्रों में और विभिन्न चैनलों पर महिलाओं के प्रति अत्याचार एवं दुराचार के समाचार देखने सुनने को ना मिलते हों। हद तो यह है कि समूचे मानव समाज ने मानो इन प्रतिकूलताओं से अपने नेत्र मूंद लिए हैं। ऐसी घटनाओं को लेकर कहीं से कोई आवाज नहीं आती, जिसे सुनकर यह कहा जा सके कि समाज में जीवंतता बनी हुई है। जितनी भी सरगर्मियां ऐसे मामलों को लेकर देखने पढ़ने को मिलती हैं, वह केवल राजनेताओं के ऐसे बयान हैं जो उनके द्वारा अपने राजनीतिक लाभ और हानि को ध्यान में रखकर दिए जाते हैं। मतलब साफ है, महिलाओं और बालिकाओं के शीलभंग हो रहे हैं। उन्हें नृशंसता के साथ मारा जा रहा है, कुचला जा रहा है। लेकिन समाज गहन निद्रा में मग्न है और जिन नेताओं, जनप्रतिनिधियों को रक्षक होने का दायित्व निभाना चाहिए, वे अपने राजनीतिक फायदे को आगे रखकर स्वयं के दायित्वों का समयानुकूल निर्धारण करते दिखाई दे रहे हैं। तो फिर सवाल यह उठता है कि जिस देश में यत्र नार्यस्तु पूर्जयंते रमंते तत्र देवता, के बोध वाक्य मन मस्तिष्क में रचे बसे हुए थे, वहां अब महिलाएं और बालिकाएं निसहाय निराश्रय क्यों बनी हुई हैं। करण इतना ही समझ में आता है कि हम जितने शिक्षित हो रहे हैं उतने ही संस्कारों से रहित होते चले जा रहे हैं। तब ऐसे समाज से महिलाओं और बालिकाओं को सुरक्षा एवं संरक्षण की आशा क्यों करनी चाहिए। तब हृदय से एक ही हूक उठती है जैसे वह श्री कृष्ण को आवाज दे रही हो-
अब देर भाई नंदलाला।
तेरी राह तके हर बाला।।

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