नारी शक्ति वंदन

नारी शक्ति वंदन पर मप्र शासन की चढ़त, शासकीय संकल्प पर चूका विपक्ष

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नारी शक्ति वंदन पर मप्र शासन की चढ़त, शासकीय संकल्प पर चूका विपक्ष

भारतीय ​लोकतंत्र की आत्मा संवाद और विमर्श में बसती है। भारत जैसे विशाल और विविधता वाले लोकतांत्रिक राष्ट्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न केवल एक संवैधानिक अधिकार है, बल्कि वह सेतु भी है जो आम और खास नागरिक को शासन की मुख्यधारा से जोड़ता है। सरकार का कोई भी विधेयक हो या विपक्ष का कोई प्रस्ताव, उनका अंतिम ध्येय जनहित और राष्ट्रहित ही होना चाहिए। भारतीय संसदीय परंपरा की यह सबसे खूबसूरत विशेषता रही है कि यहाँ हर गंभीर मुद्दे का हल गहन बहस और सार्थक बातचीत के माध्यम से निकाला जाता है। इसी परिप्रेक्ष्य में ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ और उसके लिए होने वाले ‘परिसीमन’ की प्रक्रिया केवल विधायी कार्य नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी को उनके वास्तविक राजनीतिक अधिकार सौंपने का एक महान यज्ञ है।
​हाल ही में मध्य प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान जो परिदृश्य देखने को मिला, वह संसदीय लोकतंत्र के प्रति हमारी निष्ठा और उत्तरदायित्वों पर चिंतन करने का अवसर देता है। केंद्र की भाजपा नीत एनडीए सरकार द्वारा पारित नारी शक्ति वंदन विधेयक, जो महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का मार्ग प्रशस्त करता है, देश के राजनीतिक इतिहास में एक युगांतकारी कदम है। इस विधेयक के कार्यान्वयन और परिसीमन की बारीकियों पर चर्चा करने के लिए जब मध्य प्रदेश विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया, तो वह राज्य के भविष्य और महिला नेतृत्व के सशक्तिकरण के लिए एक सुनहरा मौका था। सदन की मेज पर जब कोई महत्वपूर्ण प्रस्ताव आता है, तो वह केवल सत्ता पक्ष का नहीं रह जाता, बल्कि उस पर पूरे सदन की मुहर लगनी अनिवार्य होती है। विपक्ष के पास यह अधिकार होता है कि वह प्रस्तावित विधेयक की कमियों को उजागर करे, सुधार के सुझाव दे और अपनी आपत्तियों को ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनाए। ​लोकतंत्र में ‘सहमति’ जितनी महत्वपूर्ण है, ‘सार्थक असहमति’ का भी उतना ही सम्मान है। यदि विपक्ष को नारी शक्ति वंदन विधेयक या आगामी परिसीमन की प्रक्रिया में कोई तकनीकी या वैधानिक त्रुटि दिखाई देती है, तो सदन का पटल ही वह सर्वोत्तम स्थान है जहाँ इन चिंताओं को रखा जाना चाहिए। संवाद से कन्नी काटना या हंगामे के बीच सदन का बहिष्कार करना न केवल संसदीय गरिमा के प्रतिकूल है, बल्कि यह उस जनता की अपेक्षाओं पर भी आघात है जिसने अपने प्रतिनिधियों को उनकी आवाज उठाने के लिए चुनकर भेजा है। जब विपक्ष किसी महत्वपूर्ण चर्चा से दूरी बनाता है, तो वह अनजाने में जनता के बीच यह संदेश भेजता है कि उसके पास ठोस तर्कों का अभाव है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस का स्वस्थ लोकतंत्र में ऑन-रिकॉर्ड बहस से बचना उसके लिए आत्मघाती हो सकता है, क्योंकि जनता सूक्ष्मता से हर दल के आचरण का अवलोकन कर रही होती है।

​नारी शक्ति वंदन विधेयक और परिसीमन के बीच का जो गहरा संबंध है, उसे समझना आम नागरिक के हित में है। वर्तमान अनुमानों के अनुसार, यदि आगामी जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया सुचारू रूप से संपन्न होती है, तो लोकसभा की सीटों में उल्लेखनीय वृद्धि संभावित है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों की संख्या बढ़कर लगभग 850 तक पहुँच सकती है। मध्य प्रदेश के संदर्भ में देखें तो वर्तमान की 29 लोकसभा सीटों के परिसीमन के बाद 44 या 45 तक होने की संभावना है। गणितीय आधार पर देखें तो यदि वर्तमान सीटों पर आरक्षण लागू होता है तो मध्य प्रदेश से केवल 9 या 10 महिलाएँ संसद पहुँच पाएँगी, लेकिन परिसीमन के उपरांत यह संख्या बढ़कर 15 तक हो सकती है।
​सीटों के इस विस्तार का अर्थ केवल आंकड़ों का बढ़ना नहीं है, बल्कि यह जनता को और अधिक जनप्रतिनिधि उपलब्ध कराने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अधिक सांसद होने का अर्थ है- जनता की समस्याओं का सूक्ष्म स्तर पर समाधान और लोकसभा में उनकी आवाज का अधिक प्रभावशाली ढंग से गूंजना। परिसीमन और महिला आरक्षण का यह समन्वय भारतीय राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात करेगा, जहाँ नीति-निर्धारण में महिलाओं की भागीदारी केवल प्रतीकात्मक न होकर निर्णयात्मक होगी।
​यह अत्यंत विचारणीय विषय है कि जब सत्र का एजेंडा पहले से सार्वजनिक और निर्धारित हो, तब विपक्ष द्वारा मुख्य विषय को छोड़कर अन्य मुद्दों पर समय व्यतीत करना जनभावनाओं का अनादर है। संसद और विधानसभाओं का समय देश की गाढ़ी कमाई और जनता की उम्मीदों से निर्मित होता है। यदि विपक्षी राजनीतिक दल केवल विरोध के लिए विरोध की नीति अपनाएंगे, तो वे जनहित के व्यापक उद्देश्यों से भटक सकते हैं। नारी शक्ति वंदन विधेयक को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की प्रतिबद्धता स्पष्ट है। वर्ष 2023 में इसे संसद से पारित कराना इस संकल्प का प्रमाण था कि अब महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को और अधिक टाला नहीं जा सकता।
​अंततः, राजनीति में हार-जीत तो चलती रहती है, किंतु राष्ट्र के निर्माण और सामाजिक न्याय के महापर्व में अपनी भूमिका सुनिश्चित करना प्रत्येक दल का दायित्व है। यदि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल जनहित के इन बुनियादी मुद्दों पर नकारात्मक रुख अपनाते हैं, तो भविष्य में उन्हें जनता के कोप का सामना करना पड़ सकता है। लोकतंत्र में संवाद का द्वार कभी बंद नहीं होना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही सकारात्मक माहौल बनाकर सदन में बैठें, बहस करें और एक ऐसे निष्कर्ष पर पहुँचें जो देश की नारी शक्ति को वंदनीय बनाने के साथ-साथ लोकतंत्र की जड़ों को भी मजबूती प्रदान करें। परिसीमन और महिला आरक्षण का यह संगम मध्य प्रदेश सहित पूरे भारत के लिए विकास की नई राहें खोलेगा, बशर्ते विपक्ष भी दलीय राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखे।

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