मध्य प्रदेश में प्रतिदिन औसतन 400 सड़क हादसे घटते हैं। सबसे चिंताजनक और खतरनाक पहलू यह है कि इन सड़क हादसों में सैकड़ो लोग घायल होते हैं। जिनमें से लगभग तीन प्रतिशत लोगों की मौत भी हो जाती है। अधिकांश लोग इसलिए भी मौत का शिकार बनते हैं, क्योंकि इन्हें समय पर इलाज नहीं मिल पाता। ये लोग इलाज के इंतजार में दुर्घटना स्थल पर ही तड़प तड़प कर प्राण त्याग देते हैं। ऐसा क्यों होता है, इसके पीछे की मुख्य वजह आम नागरिकों को पता है। दरअसल अधिकांश लोग सड़क दुर्घटनाओं अथवा अन्य हादसों में गंभीर रूप से घायल हुए लोगों की मदद तो करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह भी पता है कि यदि किसी की जान बचाने के प्रयास में उसे लेकर अस्पताल तक पहुंचे तो वहां मौजूद पुलिस द्वारा सबसे ज्यादा सवाल उस व्यक्ति से ही पूछे जाएंगे जो घायल को उसकी जान बचाने के लिए अस्पताल लेकर पहुंचा होता है। आफत यही पर खत्म नहीं होती। मामले की पूरी जांच के दौरान घायलों की मदद करने वालों को कभी बयान के नाम पर, कभी गवाही के नाम पर, कभी उन पर संदेह जता कर इतना परेशान किया जाता है कि सकारात्मक मंशा रखने वाला व्यक्ति भी अंततः यह ठान लेता है कि अब गलती कारी सो करी, भविष्य में भले ही कोई तड़प तड़प कर मर जाए उसकी मदद नहीं करनी है। यही वह कारण है, जिसके चलते अधिकांश लोग सड़क हादसों में घायल हुए लोगों की मदद करने से बचते हैं । कई बार वीरान सड़कों पर, रात के अंधेरे में हादसे के शिकार लोगों को सहायता की प्रतीक्षा में सड़क पर तड़पते देखा जाता है। लेकिन अनेक वाहन वहां से बचकर गुजरते रहते हैं । कोई भी इनकी मदद करना नहीं चाहता । ऐसा नहीं है कि लोग संवेदन शून्य हो गए हैं। कारण सिर्फ इतना सा है कि कोई भी पुलिस के पचड़े में पढ़ना नहीं चाहता। यही कारण है कि हादसे में शिकार सैकड़ो लोग प्रतिदिन केवल इसलिए मर रहे हैं, क्योंकि उन्हें आम आदमी की मदद समय पर नहीं मिल रही। ऐसे में या तो घायल व्यक्ति अस्पताल पहुंच ही नहीं पता या फिर सरकारी मदद के सहारे अस्पताल पहुंचने में इतनी देर हो जाती है कि प्राणों से हाथ तक धोना पड़ता है। मध्य प्रदेश की डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने इस विसंगति को समझा और एक बड़ा नियम स्थापित किया है। बता दें कि मध्य प्रदेश सरकार ने केंद्र की एक लंबित योजना पर विचार विमर्श करने के बाद इसे अपने यहां लागू करने पर सहमति दे दी है। स्वयं मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने घोषणा की है कि इस निर्णय को मई के अंत तक मध्य प्रदेश में लागू कर दिया जाएगा। इस नए निर्णय के अनुसार मध्य प्रदेश में घायलों की जान बचाने वाले लोगों को पुलिसिया सवालों के घेरे में नहीं लिया जाएगा। बल्कि उन्हें₹25000 का इनाम देकर पुरस्कृत भी किया जाएगा। हां इसमें एक शर्त होगी, वह यह कि घायल व्यक्ति को गोल्डन आवर में अस्पताल पहुंचाना होगा। यह वह समय होता है जिस दौरान व्यक्ति का अधिक खून बह जाने से उसके बचने की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं। लेकिन, यदि इसी गोल्डन आवर में उसे समय पर मदद मिल जाती है तो घायल के बचने की संभावनाएं कई गुना अधिक बढ़ जाती हैं। यह भी स्मरण रहे की सड़क दुर्घटना में घायल होने वाले व्यक्ति का अधिक चोटिल होने की वजह से ऑपरेशन करने की नौबत आ जाए, कम से कम उसे तीन दिन तक अस्पताल में भर्ती बनाए रखने की स्थिति निर्मित हो जाए, सिर या रीड़ की हड्डी में गंभीर रूप से चोट आई हो, घायल के साथ इनमें से कोई भी एक या एक से अधिक परिस्थितियां निर्मित होने की स्थिति में बचाने वाले नागरिक पुरस्कार के हकदार होंगे। एक और अच्छा निर्णय यह है कि कोई व्यक्ति साल में एक से अधिक दुर्घटनाओं में घायलों की जान बचाता है तो उसे प्रत्येक घटनाओं के लिए अलग-अलग 25 000 रूपयों का इनाम दिया जाएगा। यही नहीं, देश भर के ऐसे सहायता करने वालों की सूची बनेगी और उनमें से 10 ऐसे नागरिकों को छांटा जाएगा, जिन्होंने सर्वाधिक लोगों की जान बचाई। इन्हें प्रति वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले एक समारोह में एक एक लाख रुपए का पुरस्कार और प्रशंसा पत्र अलग से दिया जाएगा। मध्य प्रदेश सरकार के उपरोक्त निर्णय की व्यापक पैमाने पर सराहना हो रही है और होनी भी चाहिए। क्योंकि इससे उन लोगों की परेशानियां कम होंगी जो आपात कालीन स्थितियों में घायलों की मदद करना तो चाहते हैं, लेकिन कानूनी पेचीदगियों और पुलिस के अमानवीय व्यवहार के चलते परोपकार नहीं कर पाते। साथ में उन लोगों को सहायता मिलने में आसानी होगी, जो विभिन्न दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं और विषम परिस्थितियों के चलते बेहद आवश्यक प्राण बचाने वाली सहायता मिलने से वंचित रह जाते हैं।


