एजेंसी, नई दिल्ली। जस्टिस यशवंत वर्मा इस्तीफा : दिल्ली स्थित अपने सरकारी निवास से भारी मात्रा में नकद बरामदगी के मामले में विवादों का सामना कर रहे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेज दिया है। इस कदम के साथ ही न्यायमूर्ति वर्मा संसद में उनके विरुद्ध शुरू होने वाली महाभियोग की संभावित प्रक्रिया से बचने में सफल रहे हैं।
संसदीय जांच और सुप्रीम कोर्ट का रुख
जस्टिस वर्मा के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव पहले ही स्वीकार कर लिया था। इसके बाद न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 के तहत एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था ताकि आरोपों की गहराई से जांच की जा सके। न्यायमूर्ति वर्मा ने इस संसदीय कार्यवाही को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया और संसद को अपनी प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दे दी थी।
मार्च 2025 में हुआ था मामले का खुलासा
यह पूरा विवाद मार्च 2025 में उस समय शुरू हुआ था जब दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास पर छापेमारी के दौरान बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी मिलने की बात सामने आई थी। उस दौरान वे दिल्ली हाई कोर्ट में जज के तौर पर कार्यरत थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने 22 मार्च 2025 को एक आंतरिक जांच समिति बनाई थी।
इलाहाबाद ट्रांसफर के बाद अब इस्तीफा
शुरुआती जांच और विवाद बढ़ने के बाद न्यायमूर्ति वर्मा का स्थानांतरण दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था। लंबे समय से चल रही कानूनी और संसदीय खींचतान के बीच अब उनके इस्तीफे ने इस पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। इस्तीफे के कारण अब उन पर चलने वाली महाभियोग की कार्यवाही पर विराम लग सकता है।
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