
राष्ट्रीय राजमार्गों पर बेसहारा गायों का जमघट, भारी वाहनों की टक्कर से उनकी मृत्यु एवं उनकी वजह से बड़े-बड़े सड़क हादसे घट जाना केवल मध्य प्रदेश ही नहीं वरन पूरे भारत की पुरानी तथा बड़ी समस्या है। इससे भी बढ़कर समस्या यह है कि गौ वंश को भारी पैमाने पर कसाई घरों के हवाले किया जा रहा है। फल स्वरुप जब जब इस तरह के प्रयास सामने आते हैं और फिर इस तरह के कृत्यों पर अंकुश लगाने के लिए गौ भक्तों द्वारा अपनी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है, तब कई बार तनावपूर्ण हालात भी निर्मित हो जाते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि जब काटने के लिए ले जाई जा रहीं गाएं ट्रकों सहित अन्य वाहनों में पकड़ी जाती हैं, तब यह देखकर दिल दहल जाता है कि उन्हें किसी निर्जीव सामान की तरह ठूंस ठूंस कर भरा गया होता है। कई बार यह इतनी घायल हो जाती हैं कि उनके शरीर से बहने वाला खून वाहन में एकत्रित होने के साथ-साथ सड़कों पर भी बहता दिखाई देने लगता है। समय-समय पर इस समस्या के निराकरण हेतु अनेक आंदोलन हुए, आए दिन होते भी रहते हैं। बुद्धिजीवियों द्वारा सरकारों को पानी पी पीकर कोसा गया सवाल यह भी उठे कि गौ भक्तों की सरकार के होते हुए गायों की दुर्दशा यथावत है तो फिर केवल अफसोस ही किया जा सकता है। हम यह नहीं कहते कि इस समस्या के निराकरण हेतु पिछली सरकारों द्वारा कुछ भी नहीं किया गया। किंतु यह भी सत्य है कि सुधार की गुंजाइश सदैव बनी रहती है। अतः सरकारों का दायित्व है कि वह और अधिक बेहतर के लिए प्रयासरत रहें तथा परिणाम मूलक कार्यों को पूर्णता प्रदान करती रहें। जैसे मध्य प्रदेश की डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने गायों की बेहतरी के लिए काफी बड़े निर्णय लिए हैं। केवल इतना ही नहीं, इस सरकार द्वारा गौ पालकों की भलाई के लिए भी व्यवस्था की गई है। इससे उम्मीद की जा सकती है की गायों और गोपालों के बीच अपनेपन का जो भाव परिस्थितिवश नाम मात्र के लिए रह गया था, वह फिर पुनर्स्थापित होगा। गौवंश एक बार फिर सड़कों से हटकर गौशालाओं की शोभा बनेगा। इसके साथ-साथ गाय अपने पालक के लिए फायदेमंद भी साबित हो सकेगी। उदाहरण के लिए गायों के रखरखाव हेतु पहले से तयशुदा अनुदान 20 रूपए प्रति गाय को बढ़ाकर 40 रूपए प्रति गाय किया जाना। देखने में यह राशि भले ही छोटा प्रतीत होती हो। लेकिन इससे उन गायों का भला होगा, जिन्हें गौ पलकों ने दूध सूखते ही सड़कों पर बेसहारा छोड़ दिया। कारण साफ है, व्यावसायिक दृष्टि से यह गाएं गौ पालकों के लिए नुकसानदायक साबित हो रही थीं। उन्हें जिंदा बनाए रखने के लिए चारा पानी मुहैया कराना भी मुश्किल साबित हो चला था। किंतु अब मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पंजीकृत गौशालाओं को अब 40 रूपए प्रति गाय के हिसाब से अनुदान दिया जाएगा। भले ही गाय दूध ना दे, अब 40 रूपए की महत्वपूर्ण राशि से उसके लिए चारे पानी की व्यवस्था की जा सकेगी, इसमें संशय शेष नहीं रहा। इस व्यवस्था के चलते यह कहा जा सकता है कि सरकार ने अपने हिस्से के कर्तव्यों के परिपालन में कदम बढ़ा दिया है। अब बारी समाज की है कि वह अपने दायित्वों का सहज निर्वहन कर गायों की रक्षा करे। इसके लिए हमें कोई बहुत बड़ा आंदोलन अथवा अभियान छेड़ने की आवश्यकता नहीं है। बस इतना करना है कि सड़कों और राजमार्गों पर जो बेसहारा गाएं भटक रही हैं, उन्हें शासन द्वारा पंजीकृत गौशालाओं तक पहुंचा दें और उनकी विधि मान्य पावती संग्रहित करना शुरू कर दें। इससे इससे एक ओर गायों को सुरक्षा मिलेगी, वहीं दूसरी ओर गौशाला संचालकों के भीतर अपने दायित्वों के प्रति दृढ़ता का भाव उत्पन्न होगा। शासन की ओर से उन्हें जो अनुदान मिलेगा उससे इन गायों का लालन-पालन सहज हो पाएगा। साथ में उनके द्वारा त्यागा गया गोबर और मूत्र अतिरिक्त आय के साधन बनेंगे। क्योंकि इस बारे में भी सरकार ने महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। जहां गायों की अधिकता होगी वहां गोबर से खाद, बिजली, गैस, गौ काष्ठ सहित अन्य सामग्रियां कैसे बनें, इस बाबत संसाधन जुटाए जा रहे हैं। इसके अलावा किसानों और गाय पालने वालों को भी अपने उदार भाव को थोड़ा और विकसित करने की आवश्यकता है। संभव है गौ वंश को केवल मांस अर्थात गोश्त के रूप में देखने वाले भेड़िए दूध छोड़ चुकी गायों का कुछ ज्यादा मोल चुका रहे हों। संभव है इस कारण भी बेसहारा गायों को कष्टदायक मौत मरने के लिए विवश होना पड़ रहा हो। किंतु यदि हम लोग केवल इतना स्मरण भर कर लें कि आखिर हमने बरसों तक इनका दूध पिया है। अतः इन्हें इस तरह मरने के लिए नहीं छोड़ सकते। यदि यह मानवीय मूल्य हृदय में स्थापित होते हैं तो गायों के अच्छे दिन आ सकते हैं। यह भरोसा इसलिए भी मजबूती पाता है, क्योंकि सरकार ने इस और ठोस इंतजाम कर दिए हैं। अब हमारी ओर से पहल करने की आवश्यकता है।
यह निर्णय तो उन गायों से संबंधित रहे जिन्होंने दूध देना बंद कर दिया है। इसके अलावा सरकार ने दूध से गौ पालकों की आय बढ़ाने के इंतजाम भी सुनिश्चित कर दिए हैं। जिस प्रकार गुजरात में सहकारिता के माध्यम से व्यापक स्तर पर श्वेत क्रांति खड़ी की गई, ठीक उसी प्रकार मध्य प्रदेश में भी वैसा ही ताना-बाना बुना जा रहा है। इससे उन किसानों को भी लाभ होगा, जो अभी तक केवल खेतों से उत्पन्न फसलों पर ही निर्भर बने हुए हैं। अब यह लोग गाय पालकर अपनी आय में चमत्कारिक बढ़ोतरी हासिल कर सकते हैं। क्योंकि सरकार अब यह भी सुनिश्चित कर रही है कि उत्पादित दूध का समय पर हितग्राहियों एकत्रीकरण हो जाए। प्रोसेसिंग के साथ उसकी व्यवस्थित खपत व्यवहार में आ जाए। इसके लिए दुग्ध महासंघ के साथ लगभग आधा दर्जन सहकारी दुग्ध संघ मिलकर रणनीति बना रहे हैं। ऐसी व्यवस्था मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा सुनिश्चित की जा चुकी है। यही नहीं, दुग्ध उत्पादकों को दूध की कीमत के अलावा उन्हें बोनस दिए जाने की योजना भी पूर्णता की ओर अग्रसर है। दुग्ध उत्पादकों को दूध बेचने के लिए यहां वहां नहीं भटकना पड़े, इस समस्या के निराकरण हेतु सरकार स्वयं प्रतिदिन 20 लाख लीटर दूध एकत्रित कर उसे खरीदने, परिवहन करने और प्रोसेसिंग पश्चात उसे उचित मूल्य पर बेचने की व्यवस्था बना रही है। किसानों, से गौ पलकों को इस नई व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए आगे आना चाहिए। अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ शासन के इस स्वप्न को पूर्णता प्रदान करने की आवश्यकता है, जिसमें गौ वंश को सड़कों और राजमार्गों से हटाकर गौशालाओं में सुरक्षित करने का संकल्प लिया जा चुका है।


