
राजनीति में एक मान्यता है। वह यह कि विरोधी विचारधारा के लोग जो मांगें वह मत करो, फिर भले ही उनकी मांगें जायज हों अथवा ना जायज। यह बात और है कि तत्कालीन सरकारें संबंधित लोगों का भला बुरा जानकर धीरे-धीरे उनके हक में फैसला लेने की अंदरूनी या फिर यूं कहें कि अप्रत्यक्ष शुरुआत कर देती हैं। यह इसलिए होता है, ताकि संबंधित वर्ग का भला भी हो जाए और विरोधी विचारधारा का संगठन विशेष यह दावा ना कर सके कु उसकी मांग पर या फिर उसके आंदोलन के दबाव के चलते सरकार जनहित में निर्णय लेने के लिए मजबूरी हुई है तथा उसी के चलते संबंधित वर्ग का भला हो रहा है। जहां तक मध्य प्रदेश की बात है तो यह क्षेत्र एक से अधिक बार कृषि कर्मण्य अवार्ड जीतता रहा है। इसका कारण यह है कि मध्य प्रदेश की कृषि नीति पहले से ही किसानों का हित ध्यान में रखकर बनाई गई है। आवश्यकता अनुसार समय-समय पर नीतियों में बदलाव किया जाता रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि मध्य प्रदेश कि भाजपा सरकार सदैव ही किसानों के हित में संवेदनशील बनी हुई है। यही कारण है कि जब दिल्ली में कुछ किसान संगठनों ने मिलकर केंद्र सरकार के सामने परेशानियां खड़ा करने का उद्यम किया। साथ में देश की राजधानी को बंधक बनाए जाने के विधि विरुद्ध प्रयास किए गए। तब उस आंदोलन को मध्य प्रदेश के किसानों का बहुत ज्यादा साथ नहीं मिला। इसका कारण यही रहा, क्योंकि यहां पर पहले से ही भाजपा की प्रदेश सरकार किसानों का ध्यान रख रही थी और उसने इस वर्ग को सदैव ही संतुष्ट बनाए रखा था। अब एक बार फिर किसानों के हित में बड़ा निर्णय आया है तो यह वर्ग सरकार के प्रति पहले की अपेक्षा और अधिक अनुकूल होगा, ऐसी संभावनाएं व्यक्त की जाने लगी हैं। जैसा कि सभी को मालूम है, केंद्र सरकार ने गेहूं पर पहले से ही न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है । अब जब केंद्र की ओर से गेहूं का न्यूनतम समर्थन 2425 रुपए कर दिया गया है। तब प्रदेश की डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने भी बोनस के नाम पर इसमें 175 रुपए मिलाने का ऐलान कर दिया है। यानि कि अब मध्य प्रदेश के सरकारी खरीदी केंद्रों पर किसानों का गेहूं न्यूनतम 2600 रुपया प्रति कुंतल के हिसाब से बिकने जा रहा है। हालांकि कांग्रेस की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य में अभी और कसर बताई जा रही है। इस पार्टी का कहना है कि किसानों को कम से कम₹2700 प्रति कुंटल के हिसाब से गेहूं का मूल्य मिलना चाहिए। यह बात अपनी जगह उचित है कि सरकार में बैठे दल जनता के हित में अधिक से अधिक प्रयास करते रहें। वहीं विपक्ष का धर्म होता है कि वह सरकारी नीतियों में कमियां तलाशे और उन्हें जाहिर करके सरकार को अपनी गलतियां ठीक करने के लिए मजबूर करे। यह बात और है कि मध्य प्रदेश में ऐसी सूरत नहीं बन रही। क्योंकि भयंकर गुटबाजी के चलते मध्य प्रदेश में कांग्रेस बड़े पैमाने पर अपना अस्तित्व खो चुकी है। अब उसके सामने पहले संगठन मजबूत करने की प्राथमिकता है । उसी के बाद संभव हो पाएगा कि वह किसानों तथा आम आदमी के हित में कितनी आवाज बुलंद कर पाती है। फिलहाल मध्य प्रदेश और केंद्र की भाजपा सरकारों ने किसानों के हित में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹2600 कर दिया है, तब मंडियों में व्यापारियों और आड़तियों के माध्यम से नए गेहूं की बिकवाली 2900 रुपए तक देखने को मिल रही है। अच्छी बात यह है कि किसानों को बाहर फसल बेचने का विकल्प भी खुला हुआ है। जिसके चलते किसान सरकारी खरीदी केंद्रों पर फसल का पंजीयन करने के साथ-साथ व्यापारियों के संपर्क में भी बना हुआ है। वर्तमान परिदृश्य को देखें तो यह स्पष्ट है कि सरकारी खरीदी केंद्रों और व्यापारियों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनी रही तो फिर सामान्य स्तर का गेहूं भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से 200 या फिर ₹300 प्रति कुंटल अतिरिक्त मूल्य पर बिकने की संभावनाएं बनने लगी हैं । इस वर्तमान माहौल में अधिकतम किसान प्रदेश सरकार की नीतियों से प्रसन्न दिखाई दे रहा है। इसे सरकार की बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है। यहां किसानों का सरकार के अनुकूल होना इसीलिए भी अवश्यंभावी हो जाता है, क्योंकि एक ओर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार किसानों के पक्ष में लगातार न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाती जा रही है। तो वहीं प्रदेश की डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने अपनी ओर से किसानों को बोनस दिए जाने का क्रम बनाए रखा है। उस पर फिर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी मध्य प्रदेश से ही आते हैं। तो फिर इस क्षेत्र के किसानों को अपने हितों को लेकर कम से कम केंद्र और प्रदेश की सरकारों की ओर से तो बेफिक्र ही रहना चाहिए।


