ओछी राजनीति, गंदी राजनीतिजीवन मरण के सवाल पर भी राजनीति!

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हमने भारतीय राजनीति का वह स्वर्ण काल भी देखा है जब नेता प्रतिपक्ष श्री अटल बिहारी वाजपेई जैसे लोग सत्ता में बैठे कांग्रेसी नेताओं के सही काम की मुक्त कंठ से सराहना कर दिया करते थे। यहां तक कि वे अपने विरोधियों के अच्छे कार्यों की सराहना मीडिया के सामने करने से भी नहीं चूकते थे। एक समय अब आया है जब सत्ता पक्ष चाहे कितना भी अच्छा काम कर ले, विपक्ष ने कसम खा रखी है वह केवल और केवल निंदा ही करता रहेगा। सत्ता के हर काम की भर्त्सना ही करेगा। सरकार के कामकाज में कमियां तो निकलेगा, लेकिन समस्या के समाधान का कोई रास्ता प्रस्तुत नहीं करेगा। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब राजनीति में नैतिक मूल्यों को भी ताक पर रख दिया जाएगा। आज मैं बात कर रहा हूं यूनियन कार्बाइड के उस कचरे की, जिसे भारी चिंतन मनन के बाद पीथमपुर में जलाया जाना तय हुआ था । अभी उसकी प्रक्रिया शुरू हो ही रही थी। कचरे को कैसे जलाया जाए, ताकि जनमानस, जीव जंतु और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे, इस बाबत विचार विमर्श चल ही रहा था। तभी विपक्ष ने हाय तौबा मचाना शुरू कर दिया। विपक्ष का कहना है कि मध्य प्रदेश की सरकार पीथमपुर में कचरा जलाकर इंदौर की जनता का अनिष्ट करना चाहती है। तो फिर विपक्ष के सामने यह सवाल स्वत: उठ जाता है कि यदि पीथमपुर में कचरा जलाए जाने से इंदौर के लोगों का अहित हो रहा है तो फिर विपक्ष अपनी कार्य योजना सामने क्यों नहीं रखता? वह क्यों नहीं बताता कि यदि हम सरकार में होते तो हम इस घातक कचरे का अमुक तरीके से निपटान करते। मीडिया के विभिन्न माध्यमों से हमने एक तथा कथित आंदोलन के फोटो भी देखे और विपक्षी नेताओं की राजनीतिक बयान बाजी भी सुनी। इनका एक ही सियासी गाना है कि भोपाल की आफत इंदौर के माथे मढ़ी जा रही है। ऐसा कहते वक्त क्या विपक्ष को यह जवाब नहीं देना चाहिए कि भोपाल वासियों के प्रति क्या विपक्ष का कोई दायित्व नहीं बनता? विपक्ष स्पष्ट क्यों नहीं कहता कि भोपाल का कचरा भोपाल में ही जलाया जाना चाहिए। यदि उसमें हिम्मत है तो यह बात विपक्ष भोपाल की जमीन पर खड़ा होकर क्यों नहीं बोलता? विपक्ष इतना संकुचित कैसे सोच सकता है कि आफत भोपाल की है तो भोपाल ही भुगते! इसके बाद उसका भगवान मालिक, जिए तो ठीक मरे तो ठीक! लिखने का आशय केवल इतना सा है कि इस तरह की ओछी और गंदी राजनीति विपक्ष कब तक करता रहेगा? सब जानते हैं यूनियन कार्बाइड का कचरा बेहद घातक है, यह जानलेवा है। इसको अब तक नष्ट हो जाना चाहिए था। लिखने में कोई समस्या नहीं कि मध्य प्रदेश में लगभग 20 साल भाजपा के शासन को भी हो गए हैं । लेकिन सवाल यह भी उठता है कि 1984 से लेकर 2003 तक कांग्रेस की सरकार क्या करती रही? उसने इस कचरे को ठिकाने क्यों नहीं लगाया? क्यों अब तक उसका जहर भोपाल की जमीन, वहां की हवा और पानी में घुलता रहा? क्या इस बात पर संतोष व्यक्त नहीं किया जाना चाहिए कि अपनी बारी आने पर भाजपा सरकार इस कचरे के निपटान का एक ऐसा तरीका निकालने की ओर बढ़ चली है, जिसके तहत यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि इसके निपटान से जीव जंतु, पर्यावरण, जल, जमीन आदि को कोई नुकसान न पहुंचे। पीथमपुर में इस कचरे को नष्ट करने का इरादा भी इसी आधार पर लिया गया। क्योंकि वहां वह सारे संसाधन और वातावरण उपलब्ध हैं, जिन्हें अपना कर इस जानलेवा जहर को बगैर किसी नुकसान के खत्म किया जा सकता है। अब एक विपक्षी नेता का बयान आया है कि मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव इस कचरे को अपने शहर उज्जैन में क्यों नहीं ठिकाने लगाते? क्या ऐसे गैर जिम्मेदाराना बयान की निंदा नहीं होनी चाहिए? क्या इन पूर्व मंत्री से नहीं पूछा जाना चाहिए कि उज्जैन को क्या केवल इसलिए निशाने पर रखा जाना उचित है, क्योंकि वह प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का गृह जिला है? क्या उज्जैन के लोग मध्य प्रदेश अथवा भारत के निवासी नहीं हैं? क्या विपक्षी नेताओं की संवेदनाएं उनके साथ नहीं होना चाहिए? या फिर भोपाल, उज्जैन और इंदौर, यह तीनों महानगर क्या मध्यप्रदेश के अभिन्न अंग नहीं है? अच्छा तो यह होता की देर से ही सही, यूनियन कार्बाइड के कचरे को ठिकाने लगाने के प्रयासों की सरकार की मंशा को सराहा जाता। विपक्ष इस बीच अपनाई जाने वाली सारी प्रक्रिया को सरकार से जानता परखता। यदि इस कार्य योजना में कोई त्रुटि नजर आती तो सरकार के सामने अपनी मंशा अनुसार उसका समाधान प्रस्तुत करता। लेकिन नहीं! विपक्ष का आचरण देखकर ऐसा लगता ही नहीं है कि समस्याओं के निराकरण में उसकी रुचि शेष रह गई है। उसे तो बस हर मुद्दे पर राजनीति करनी है। फिर भले ही वह राजनीति ओछी राजनीति हो! गंदी राजनीति हो! विपक्ष को अपनी इस घातक सोच को शीघ्र अति शीघ्र अंकुश लगाने की आवश्यकता है। खासकर तब जबकि मामला लोगों के जीवन मरण से जुड़ा हुआ हो। तब तो उसे कतई राजनीति नहीं करना चाहिए। सरकार सभी पहलुओं पर विचार करके, केवल मनुष्य ही नहीं वरन अन्य जीव जंतुओं, पर्यावरण, जमीन, जंगल, जल, हवा जैसे सभी पहलुओं पर विचार करके ही यूनियन कार्बाइड के कचरे को ठिकाने लगाने का उद्यम करने जा रही है। विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए सरकार को अपना सकारात्मक सहयोग उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।

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